सखुआ
संताल समाज के पवित्र स्थान जाहेर थान में सखुआ का पेड़ आवश्यक है लेकिन अपने महत्व के बाद भी यह पेड़ पहाड़ी इलाकों में अपने अस्तित्व बचाने में लगा है। लगातार वनों का हो रहा दोहन ने इसके अस्तित्व को संकट में डाल दिया है। ऐसे में इसे बचाने की पहल राजधानी रांची के बाद गोड्डा वन विभाग ने शुरू किया है।

शाल या साखू (Shorea robusta) एक  बहुवर्षीय वृक्ष है। इसकी लकड़ी इमारती कामों में प्रयोग की जाती है। इसकी लकड़ी बहुत ही कठोर, भारी, मजबूत तथा भूरे रंग की होती है।

इसे  अग्निवल्लभा, अश्वकर्ण या अश्वकर्णिका कहते हैं।

साल या साखू (Sal) एक वृंदवृत्ति एवं अर्धपर्णपाती वृक्ष है जो हिमालय की तलहटी से लेकर ३,०००-४,००० फुट की ऊँचाई तक और उत्तर प्रदेश, बंगाल, बिहार तथा असम के जंगलों में उगता है। इस वृक्ष का मुख्य लक्षण है अपने आपको विभिन्न प्राकृतिक वासकारकों के अनुकूल बना लेना, जैसे ९ सेंमी से लेकर ५०८ सेंमी वार्षिक वर्षा वाले स्थानों से लेकर अत्यंत उष्ण तथा ठंढे स्थानों तक में यह आसानी से उगता है। भारत,  देश में इसकी कुल मिलाकर ९ जातियाँ हैं जिनमें शोरिया रोबस्टा (Shorea robusta Gaertn f.) मुख्य हैं।

इस वृक्ष से निकाला हुआ रेज़िन कुछ अम्लीय होता है और धूप तथा औषधि के रूप में प्रयोग होता है। तरुण वृक्षों की छाल में प्रास लाल और काले रंग का पदार्थ रंजक के काम आता है। बीज, जो वर्षा के आरंभ काल के पकते हैं, विशेषकर अकाल के समय अनेक जगहों पर भोजन में काम आते हैं।

इस वृक्ष की उपयोगिता मुख्यत: इसकी लकड़ी में है जो अपनी मजबूती तथा  के लिए प्रख्यात है। सभी जातियों की लकड़ी लगभग एक ही भाँति की होती है। इसका प्रयोग धरन, दरवाजे, खिड़की के पल्ले, गाड़ी और छोटी-छोटी नाव बनाने में होता है। केवल रेलवे लाइन के स्लीपर बनाने में ही कई लाख घन फुट लकड़ी काम में आती है। लकड़ी भारी होने के कारण नदियों द्वारा बहाई नहीं जा सकती।  में इस लकड़ी से जहाज बनाए जाते हैं।

साल का वृक्ष एवं पुष्प सरना धर्म के लिए पवित्र और पूज्यनीय है।

सागौन को इमारती लकड़ी का राजा कहा जाता है जो वर्बेनेसी परिवार से संबंध रखता है। इसका वैज्ञानिक नाम टैक्टोना ग्रांडिस है। इसका पेड़ बहुत लंबा होता है और अच्छी किस्म की लकड़ी पैदा करता है। यही वजह है कि इसकी देश और विदेश के बाजार में अच्छी डिमांड है।May 31, 2018

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 सागौन या टीकवुड  पौधा है। यह  यानि वर्ष भर हरा-भरा रहने वाला पौधा है। सागौन का वृक्ष प्रायः 80 से 100 फुट लम्बा होता है। इसका वृक्ष काष्ठीय होता है। इसकी लकड़ी हल्कीमजबूत और काफी समय तक चलनेवाली होती है। इसके  काफी बड़े होते हैं।  उभयलिंगी और सम्पूर्ण होते हैं। सागौन का वानस्पतिक नाम टेक्टोना ग्रैंडिस (Tectona grandis) यह बहुमूल्य इमारती लकड़ी है।

विवरण

लगभग दो सहस्र वर्षों से भारत में यह ज्ञात है और अधिकता से व्यवहृत होती आ रही है। वर्बीनैसी (Verbenaceae) कुल का यह वृहत्‌पर्णपाती वृक्ष है। यह शाखा और शिखर पर ताज ऐसा चारों तरफ फैला हुआ होता है। भारतबरमा और थाइलैंड का यह देशज हैपर फिलिपाइन द्वीपजावा और मलाया प्रायद्वीप में भी पाया जाता है। भारत में अरावली पहाड़ में पश्चिम में २४° ५०¢ से २५° ३०¢ पूर्वी देशांतर अर्थात्‌ झाँसी तक में पाया जाता है। असम और पंजाब में यह सफलता से उगाया गया है। साल में ५० इंच से अधिक वर्षा वाले और २५° से २७° सें. ताप वाले स्थानों में यह अच्छा उपजता है। इसके लिए ३००० फुट की ऊँचाई के जंगल अधिक उपयुक्त हैं। सब प्रकार की मिट्टी में यह उपज सकता है पर पानी का निकास रहना अथवा अधोभूमि का सूखा रहना आवश्यक है। गरमी में इसकी पत्तियाँ झड़ जाती हैं। गरम स्थानों में जनवरी में ही पत्तियाँ गिरने लगती हैं पर अधिकांश स्थानों में मार्च तक पत्तियाँ हरी रहती हैं। पत्तियाँ एक से दो फुट लंबी और ६ से १२ इंच चौड़ी होती है। इसका लच्छेदार फूल सफेद या कुछ नीलापन लिए सफेद होता है। बीज गोलाकार होते हैं और पक जाने पर गिर पड़ते हैं। बीज में तेल रहता है। बीज बहुत धीरे-धीरे अँकुरते हैं। पेड़ साधारणतया १०० से १५० फुट ऊँचे और धड़ ३ से ८ फुट व्यास के होते हैं।

धड़ की छाल आधा इंच मोटीधूसर या भूरे रंग की होती है। इनका रसकाष्ठ सफेद और अंत:काष्ठ हरे रंग का होता है। अंत:काष्ठ की गंध सुहावनी और प्रबल सौरभ वाली होती है। गंध बहुत दिनों तक कायम रहती है।

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सागौन की दो कुर्सियाँ

सागौन की लकड़ी बहुत अल्प सिकुड़ती और बहुत मजबूत होती है। इस पर पॉलिश जल्द चढ़ जाती है जिससे यह बहुत आकर्षक हो जाती है। कई सौ वर्ष पुरानी इमारतों में यह ज्यों की त्यों पाई गई है। दो सहस्र वर्षों के पश्चात्‌ भी सागौन की लकड़ी अच्छी अवस्था में पाई गई है। सागौन के अंत:काष्ठ को दीमक आक्रांत नहीं करती यद्यपि रसकाष्ठ को खा जाती है।

सागौन उत्कृष्ट कोटि के जहाजोंनावोंबोंगियों इत्यादि भवनों की खिड़कियों और चौखटोंरेल के डिब्बों और उत्कृष्ट कोटि के फर्नीचर के निर्माण में प्रधानतया प्रयुक्त होता है।

अच्छी भूमि पर दो वर्ष पुराने पौद (sudling), जो ५ से १० फुट ऊँचे होते हैंलगाए जाते हैं और लगभग ६० वर्षों में यह औसत ६० फुट का हो जाता है और इसके धड़ का व्यास डेढ़ से दो फुट का हो सकता है। बरमा में ८० वर्ष की उम्र के पेड़ का घेरा २ फुट व्यास का हो जाता हैयद्यपि भारत में इतना मोटा होने में २०० वर्ष लग सकते हैं। भारत के ट्रावनकोरकोचीनमद्रासकुर्गमैसूरमहाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के जंगलों के सागौन की उत्कृष्ट लकड़ियाँ अधिकांश बाहर चली जाती हैं। बरमा का सागौन पहले पर्याप्त मात्रा में भारत आता था पर अब वहाँ से ही बाहर चला जाता है। थाईलैंड की लकड़ी भी पाश्चात्य देशों को चली जाती है।

शीशम (Shisham या Dalbergia sissoo) भारतीय उपमहाद्वीप का वृक्ष है। इसकी लकड़ी फर्नीचर एवं इमारती लकड़ी के लिये बहुत उपयुक्त होती है।

शीशम बहुपयोगी वृक्ष है। इसकी लकड़ी, पत्तियाँ, जड़ें सभी काम में आती हैं। लकड़ियों से फर्नीचर बनता है। पत्तियाँ पशुओं के लिए प्रोटीनयुक्त चारा होती हैं। जड़ें भूमि को अधिक उपजाऊ बनाती हैं। पत्तियाँ व शाखाएँ वर्षा-जल की बूँदों को धीरे-धीरे जमीन पर गिराकर भू-जल भंडार बढ़ाती हैं।

शीशम की लकड़ी भारी, मजबूत व बादामी रंग की होती है। इसके अंतःकाष्ठ की अपेक्षा बाह्य काष्ठ का रंग हल्का बादामी या भूरा सफेद होता है। लकड़ी के इस भाग में कीड़े लगने की आशंका रहती है। इसलिए इसे नीला थोथा, जिंक क्लोराइड या अन्य कीटरक्षक रसायनों से उपचारित करना जरूरी है।

शीशम के 10-12 वर्ष के पेड़ के तने की गोलाई 70-75 व 25-30 वर्ष के पेड़ के तने की गोलाई 135 सेमी तक हो जाती है। इसके एक घनफीट लकड़ी का वजन 22.5 से 24.5 किलोग्राम तक होता है। आसाम से प्राप्त लकड़ी कुछ हल्की 19-20 किलोग्राम प्रति घनफुट वजन की होती है।

 

नीलगिरी उच्चारित मर्टल परिवारमर्टसिया प्रजाति के पुष्पित पेड़ों (और कुछ झाडि़यां) की एक भिन्न प्रजाति है। इस प्रजाति के सदस्य ऑस्ट्रेलिया के फूलदार वृक्षों में प्रमुख हैं। नीलगिरी की 700 से अधिक प्रजातियों में से ज्यादातर ऑस्ट्रेलिया मूल की हैं और इनमें से कुछ बहुत ही अल्प संख्या में न्यू गिनी और इंडोनेशिया के संलग्न हिस्से और सुदूर उत्तर में फिलपिंस द्वीप-समूहों में पाये जाते हैं। इसकी केवल 15 प्रजातियां ऑस्ट्रेलिया के बाहर पायी जाती हैं और केवल 9 प्रजातियां ऑस्ट्रेलिया में नहीं होतीं. नीलगिरी की प्रजातियां अमेरिकायूरोपअफ्रीकाभूमध्यसागरीय बेसिनमध्य-पूर्वचीन और भारतीय उपमहाद्वीप समेत पूरे उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्र में उगायी जाती हैं।

नीलगिरी तीन सजातीय प्रजातियों में से एक हैजिन्हें आमतौर पर "युकलिप्ट्स" कहा जाता हैअन्य हैं कोरिंबिया और एंगोफोरा . इनमें से कुछलेकिन सभी नहींगोंद के पेड़ के रूप में भी जाने जाते हैंक्योंकि बहुत सारी प्रजातियों में छाल के कहीं से छील जाने पर ये प्रचुर मात्रा में राल (जैसे किअपरिष्कृत गोंद) निकालते हैं। इसका प्रजातिगत नाम यूनानी शब्द ευ (eu) से आया हैजिसका अर्थ "अच्छा" और καλυπτος (kalyptos)जिसका अर्थ "आच्छादित" हैजो बाह्यदलपुंज का ऊपरी स्तर होता है जो प्रारंभिक तौर पर फूल को ढंक कर रखता है।[3]

नीलगिरी ने वैश्विक विकास शोधकर्ताओं और पर्यावरणविदों का ध्यान आकर्षित किया है। यह तेजी से बढ़नेवाली लकड़ी का स्रोत हैइसके तेल का इस्तेमाल सफाई के लिए और प्राकृतिक कीटनाशक की तरह होता है और कभी-कभी इसका इस्तेमाल दलदल की निकासी और मलेरिया के खतरे को कम करने के लिए होता है। इसके प्राकृतिक परिक्षेत्र से बाहरगरीब आबादी पर लाभप्रद आर्थिक प्रभाव के कारण नीलगिरी का गुणगान किया जाता है, और जबरदस्त रूप से पानी सोखने के लिए इसे कोसा भी जाता है,इससे इसका कुल प्रभाव विवादास्पद है।

विवरण

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नीलगिरी रेग्नंसएक जंगल का पेड़शिखर आयाम का चित्रतस्मानियाऑस्ट्रेलिया

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नीलगिरी कमलड्यूलेनसिसअपरिपक्व वुडलैंड पेड़सामूहिक शिखर प्रकृति का चित्रमूर्रे नदीटोकुमवलन्यू साउथ वेल्सऑस्ट्रेलिया

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नीलगिरी क्रेटाटायौवन संबंधीझुकी शाखाओं की 'मल्लीरूप का चित्रमेलबोर्नविक्टोरियाऑस्ट्रेलिया

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नीलगिरी अंगौस्टसीमाझाड़ी रूप का चित्रमेलबोर्नविक्टोरियाऑस्ट्रेलिया

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नीलगिरी प्लाटिपस, 'मर्लोकरूप का चित्रमेलबोर्न

आकार और प्राकृतिक वास

एक परिपक्व नीलगिरी कम ऊंचाई वाली झाड़ी या बहुत बड़े वृक्ष का रूप ले सकता है। इसकी प्रजातियों को तीन प्रमुख प्राकृतिक वास और चार आकार श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है।

"वन वृक्ष" के रूप में सामान्यीकरण किया जाए तो यह एकल तनेवाला और इसका शिखर पूरे वृक्ष की ऊंचाई के छोटे-से अनुपात में हुआ करता है। "वनस्थली वृक्ष" एकल तनेवाले होते हैंहालांकि भू-स्तर से ऊपर कुछ दूरी पर इसकी शाखाएं भी हो सकती हैं।

"मल्ली" भू-स्तर से बहु-तनायुक्त होते हैंआमतौर पर ऊंचाई में 10 मी॰ (33 फीट) से कमप्रायः टहनियों के अंत में मुख्यतः इसके शीर्ष होते हैं और अकेले पौधे एक खुले या संवृत बनावट का सम्मिश्रण हो सकते हैं। कई मल्ली पेड़ इतने छोटे हो सकते हैं कि उन्हें झाड़ी कहा जा सकता है।

पेड़ के दो अन्य प्रकार पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में उल्लेखनीय हैं और देशी नाम "माल्लेट" और "मर्लोक्क" से उनका वर्णन होता है। "माल्लेट" एक छोटे से मध्यम आकार का पेड़ है जो लिग्नोट्यूबर पैदा नहीं करता है और जिसका तना अपेक्षाकृत लंबा होता हैजिसकी डालियां नीचे की ओर झुकी होतो हैं और प्रायः इसका सीमावर्ती शीर्ष सुस्पष्ट रूप से घना होता है। यह युक्लिप्टस ऑक्सीडेंटलिसई. एस्ट्रिंजेंसई. स्पाथुलताई. गार्डनरीई.डिएलसिलई.फॉरेस्टियानाई. सैल्यूब्रिसई. क्लिविकोला और ई. ऑर्नाटा के परिपक्व स्वस्थ नमूनों की सामान्य आदत है। माल्लेट की चिकनी छाल में अक्सर एक साटन जैसी चिकनी चमक होती है और जो सफेदमक्खनीधूसर या तांबई हो सकती है।

शब्द मर्लोक्क का उपयोग विविध रूप में किया जाता हैफ़ॉरेस्ट ट्री ऑफ़ ऑस्ट्रेलिया में इसका वर्णन लिग्नोट्यूबर के बिना एक ऐसे छोटे वृक्ष के रूप में किया गया है जिसका तना छोटा होता हैमाल्लेट की तुलना में झुकी डालियां होती हैं। वे आमतौर पर कमोबेश शुद्ध स्थानों में पनपते हैं। ई. प्लेटिपसई. वेसिक्युलोसा और असंबंधित ई. स्टोटेई के स्थान स्पष्ट रूप से पहचानने योग्य उदाहरण हैं।

"मोर्रेल" शब्द की उत्पत्ति कुछ हद तक अस्पष्ट है और पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के गेहूं क्षेत्र और स्वर्ण क्षेत्रों के पेड़ों के लिए इसका प्रयोग किया जाता हैजिसका तना लंबासीधापूरी तरह से खुरदुरी छाल होती है। अब इसका प्रयोग मुख्य रूप से ई. लौंगीकोर्निस (लाल मोर्रेल) और ई. मेलानोक्सिलोन (काला मेर्रोल) के लिए किया जाता है।

पेड़ के आकार की परिपाटी निम्न हैं:

  • लघु — ऊंचाई में 10 मी॰ (33 फीट) तक
  • मध्यम आकार — 1030 मी॰ (3398 फीट)
  • लंबा — 3060 मी॰ (98197 फीट)
  • बहुत अधिक लंबा — 60 मी॰ (200 फीट)

पत्तियां[संपादित करें]

लगभग सभी नीलगिरी सदाबहार होते हैं लेकिन कुछ उष्णकटिबंधीय प्रजातियों के पत्ते शुष्क मौसम के अंत में झर जाते हैं। मर्टल परिवार के दूसरे सदस्यों के साथ जैसा होता हैनीलगिरी के पत्तों में तैल ग्रंथियां भर जाती हैं। प्रचुर तेल का उत्पादन करना इस प्रजाति की एक महत्वपूर्ण विशेषता है। हालांकि परिपक्व नीलगिरी के पेड़ आमतौर पर बहुत ऊंचे और पत्तियों से आच्छादित होते हैंइनका रंग खासतौर पर चकतीदार होता है क्योंकि पत्तियां आमतौर पर नीचे की ओर झुकी होती हैं।

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नीलगिरी एंगोफोराइड्स के पत्ती और फूलों की कलियों का गुच्छा

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नीलगिरी टेट्रागोनाहलके नीले रंग के पत्तों और टनों का चित्र

परिपक्व नीलगिरी वृक्ष के पत्ते आमतौर पर बरछी के नोक के आकार केपत्ती के डंठल की तरह और स्पष्टतया वैकल्पिक और मोमयुक्त और चटकदार हरे होते हैं। इसके उलटअंकुरित बीज के पत्ते अक्सर इसके विपरीतडंठल रहित और हल्के नीले रंग के होते हैं। लेकिन इस प्रतिरूप के बहुत सारे अपवाद हैं। कई प्रजातियां जैसे कि प्रजनन लायक परिपक्व हो जाने पर भी ई. मेलनोफ्लोइया और ई. सेटोसा की पत्तियों की कोमलता बनी रहती है। कुछ प्रजातियां जैसे ई. मैक्रोकरपाई. रोडैनथा और ई. क्रुसिस की पत्तियां आजीवन कोमल होने के कारण सजावट के लिए इनका उपयोग होता है। कुछ प्रजातियां जैसे कि ई. पेट्रियाई. डुनडासी और ई. लैंसडाउनियना की पत्तियां पूरे जीवन क्रम में चटकदार हरी होती हैं। ई. कैसिया अंकुरण के चरण में चटकदार हरी और परिपूर्ण परिपक्व अवस्था में हल्के नीले रंग की पत्तियों के साथ ज्यादातर नीलगिरी की पत्तियों के विकास के विपरीत नमूना दिखाती हैं। कोमल और परिपक्व पत्तियों के चरण का निरूपण क्षेत्र की पहचान में महत्वपूर्ण है।

नीलगिरी वृक्ष के विकास की पहचान पत्तियों के चार चरणों में होती है: 'अंकुरण', 'तारूणिक', 'मध्यवर्तीऔर 'परिपक्वचरण. हालांकि चरणों के बीच कोई निश्चित संक्रमणकालीन बिंदु नहीं होता है। मध्यवर्ती चरणप्रायः जब पत्तियां सबसे बड़ी ‍होती हैंतारुणिक और परिपक्व चरण के बीच की कड़ी होती है।[8]

कुछ प्रजातियों को छोड़कर बाकी सभी मेंएक वर्ग तना के विपरीत दिशा में पत्तियां जोड़े में बनती हैंक्रमागत जोड़ी एक-दूसरे के समकोण (चतुष्क) में होती हैं। कुछ संकरी पत्तियोंवाली प्रजातियोंउदाहरण के लिए ई. ऑलेओसामें पुरानी पत्तों की जोड़ी के बाद की अंकुरण पत्तियां अक्सर पांच तरफ से निकले तने के करीब से साफतौर पर घुमावदार प्रक्रिया में गुच्छा बनाती हैं। घुमावदार चरण के बादजिसमें कुछ से लेकर बहुत सारे गुल्म रह जाते हैंतने से निकली हुई कुछ पत्तियों द्वारा समावेशित होने से यह व्यवस्था पलट कर चतुष्क हो जाती है। उन प्रजातियों में परिपक्व पत्तियों की जोड़ी के गुच्छे के विपरीतजो डंठल के शीर्ष के विपरीत बन सकती हैंडंठल के असमान वृद्धि के कारण वै‍कल्पिक परिपक्व पत्तियों के निर्माण के लिए ये अपने आधार से अलग हो जाती हैं।

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नीलगिरी लयूकोक्सीलों वर.'रोसियाओपर्कुलम उपस्थित के साथ फूलों और कलियों का चित्र

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नीलगिरी मेलिओडोराफूलों और फलों के बीजकोष का चित्र

फूल[संपादित करें]

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इ. इरेथ्रोकोर्य्स के फूल की कलियां और ओपेरकुला

नीलगिरी की प्रजातियों को आसानी से पहचानने लायक विशेषताएं विशिष्ट फूल और फल (संपुटिका या "गमनट्स") हैं। फूलों के असंख्य रोएंदार पुंकेसर होते हैं जो सफेदमक्खनीपीले या गुलाबी हो सकते हैंकली मेंपुंकेसर ऑपरक्युलम नामक एक बाह्य आवरण से ढंके होते हैंयह आवरण सेपलों या पंखुड़ियों या दोनों से बना होता है। इस प्रकार फूलों में पंखुड़ियां नहीं होती हैंलेकिन वे खुद को कई दिखावटी पुंकेसरों से सजाते हैं। पुंकेसरों का जैसे-जैसे विस्तार होता जाता हैऑपरक्युलम खुलता जाता हैफूल के कप की तरह के आधार से वो विभाजित हो जाता हैयह एक विशेषता है जो कि वंश को एकजुट रखती है। युक्लिप्टस शब्द यूनानी शब्दों से बना है; eu- (ईयु-)अर्थात् सुरक्षित या भली-भांति और kaluptos (कलुप्टोस)अर्थात् आवरणओपरक्युलम का अर्थ हुआ "सुरक्षित आवरण". काठ फल या कैप्सूल मोटे तौर पर शंकु के आकार के होते हैं और जिनके अंत में वाल्व हुआ करते हैं जिन्हें खोलकर बीज निकाले जाते हैं। वयस्क पत्तियों के आने शुरू होने से पहले अधिकांश प्रजातियों में फूल नहीं खिलते;नीलगिरी सिनेरिया और नीलगिरी पेर्रीनियाना इसके उल्लेखनीय अपवाद हैं।

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द डार्कयूकलिप्टस साइद्रोक्सिलन के फिशर्ड 'आयरनबर्क'

छाल

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बार्क डिटेल ऑफ़नीलगिरी एंगोफ़ोरोइड्सएप्पल बॉक्स

पेड़ की उम्रछाल के शेड के किस्मछाल के रेशे की लंबाईशिकनों की दशामोटाईकड़ापन और रंग के साथ नीलगिरी छाल का रूप-रंग आदि बदलता रहता है। सभी परिपक्व नीलगिरी छाल की एक वार्षिक परत डाला करते हैंजो तने के व्यास को बढ़ाने में योगदान देता है। कुछ प्रजातियों मेंसबसे बाहरी परत मर जाया करती है और सालाना झड़ जाती हैया तो लंबे-लंबे टुकड़ों में (जैसे कि नीलगिरी शीथियाना में) या अलग-अलग आकार के टुकड़ों में (ई. डायवरसीकलरई. कोस्मोफिल्ला या [[ई. क्लाडोकैलिक्स|ई. क्लाडोकैलिक्स ]]). ये गोंद या चिकनी-छाल की प्रजातियां हैं। गोंद छाल फीकीचमकीली या साटनदार (जैसे कि ई. ऑर्नाटा में) या चमकरहित (ई. कॉस्मोफिल्ला) हो सकती हैं। कई प्रजातियों में मृत छाल पेड़ से झड़ती नहीं। तने की अनिवार्य रूप से खुरदुरी-छाल की प्रकृति में कोई फेरबदल किये बिना इसकी सबसे बाहरी परत धीरे - धीरे समय और शेड के साथ विखंडित होती है - उदाहरण के लिए ई. मार्जिनाटाई. जैकसनीई. ऑब्लीकुआ और ई. पोरोसा .

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दक्षिण पूर्व एशिया के लिए असाधारण नीलगिरी डेगलुपता देशी छाल का रंग

कई प्रजातियां "हाफ बार्क" या "ब्लैकबट्ट" होती हैंउनमें मृत छाल तने के निचले आधे हिस्से में बनी रहती है - उदाहरण के लिए ई. ब्राचीकैलिक्सई. ऑकरोफ्लोईया और ई. ऑक्सीडेंटलिस - या फिर एकदम नीचे आधार में सिर्फ मोटेकाले रूप में संचयित होती हैंजैसे कि ई. क्लेलैंडी में. ई. यंगीयाना और ई. विमीनलिस जैसी कुछ प्रजातियां इस श्रेणी में आती हैंजिनकी खुरदुरी आधारीय छाल शीर्ष में बहुत ही फीतानुमा होती हैंजिससे ऊपरी तने को निर्विघ्न रास्ता मिलता है। हाफ-बार्क की चिकनी ऊपरी छाल और पूरी तरह से चिकनी-छाल वाले पेड़ और मल्ली वृक्ष उत्कृष्ट रंग और दिलचस्पी पैदा कर सकते हैंउदहारणस्वरूप ई. डेगलुप्त .[8]

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नीलगिरी क्वाद्रणगुलताया सफेद बॉक्स के छाल बॉक्स

छाल की विशेषताएं

  • रेशेदार छाल — इनमें लंबे रेशे होते हैं और इन्हें लंबे टुकड़ों में खींचा जा सकता हैं। आमतौर पर स्पंजी संरचना के साथ ये मोटी होती हैं।
  • लौहछाल — सख्तखुरदुरी और गहरे शिकनदार होती हैं। यह सूखी किनो (पेड़ से निकलनेवाले रस) से भरी-पूरी होती हैजो इसे गहरा लाल या फिर काला रंग देती है।
  • छोटे चौखानों वाली — छाल कई अलग टुकड़ों में टूट जाती है। यह कॉर्कनुमा होती है और चूर की जा सकती है।
  • बॉक्स — ये छोटे रेशे होते हैं। कुछ चौकोर-सी दिखती हैं।
  • रिबन — इसकी छाल पतले-लंबे टुकड़ों में निकलती हैलेकिन फिर भी यह कुछ जगहों में ढीली-ढाली जुड़ी रहती हैं। ये लंबे फीतेनुमामजबूत धारीदार या घुंघराली हो सकती हैं।

प्रजातियां और वर्णसंकरत्व

नीलगिरी की 700 से अधिक प्रजातियां होती हैंप्रजातियों की व्यापक सूची के लिए नीलगिरी वृक्ष की प्रजातियों की सूची देखें. कुछ प्रजातियां अपने वंश की मुख्यधारा से इस हद तक भिन्न हो गयी हैं कि वे आनुवंशिक रूप से एकदम अलग-थलग पड़ गयी हैं और उन्हें कुछ अपरिवर्तनीय विशेषताओं के जरिये ही पहचाना जा सकता है। तथापिअधिकांश को संबंधित प्रजातियों के बड़े या छोटे समूहों के सदस्य के रूप में माना जा सकता हैजो अक्सर ही एक-दूसरे के साथ भौगोलिक संपर्क में रहते हैं और जिनके बीच जीन का आदान-प्रदान अब भी होता रहता है। इन स्थितियों में कई प्रजातियां एक-दूसरे में श्रेणीबद्ध होती दिखाई देती हैं और मध्यवर्ती रूप आम हैं। दूसरे शब्दों मेंकुछ प्रजातियां अपने आकृति विज्ञान के कारण अपेक्षाकृत निश्चित आनुवंशिकी की होती हैंजबकि अन्य अपने नजदीकी रिश्तेदारों से पूरी तरह से भिन्न नहीं होतीं.

संकर प्रजाति के सभी पेड़ को हमेशा पहली प्रजाति के रूप में मान्यता नहीं दी जाती और कुछ का नई प्रजातियों के तौर पर नामकरण किया गया हैजैसे कि ई. क्राईसंथा (ई. प्रिसियाना x ई. सेप्युक्रैलिस) और ई. "रायवलिस" (ई. मार्जिनाटा x ई. मेगाकर्पा). संकर संयोजन इस क्षेत्र में विशेष रूप से आम नहीं हैंलेकिन कुछ अन्य प्रकाशित प्रजातियां ऑस्ट्रेलिया में अक्सर देखी जाती हैं जो संकर प्रजाति की समझी जाती हैं। उदाहरण के लिएई. एरीथरानड्रा को ई. अंगुलोसा × ई. टेरापटेरा माना जाता है और क्योंकि पुस्तकों में इसके व्यापक वितरण का प्रायः उल्लेख किया जाता है।[8]

संबंधित वंश[संपादित करें]

इसी तरह के वृक्षों का एक छोटा-सा वंशअंगोफोरा18वीं सदी से जाना जाता है। 1995 में नए साक्ष्यमुख्यतः आनुवंशिकसे संकेत मिला कि कुछ प्रमुख नीलगिरी प्रजातियां वास्तव में अन्य नीलगिरी के बजाय अंगोफोरा के कहीं अधिक करीबी हैंऔर वे विभाजित होकर नए कोरिंबिया वंश में शामिल हो गयी हैं। हालांकिअलग होने के बावजूद तीनों समूह संबद्ध हैं और ये सभी तीनों वंशज अंगोफोराकोरिंबिया और नीलगिरी (Eucalyptus), "युक्लिप्टस" ("eucalypts") के रूप में स्वीकार्य किये जाते हैं।

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तस्मानिया के एक क्षेत्र में80 मीटर से अधिक नीलगिरी रेग्नंस

लंबी लकड़ी

कुछ नीलगिरी की गिनती दुनिया के सबसे लंबे पेड़ों में होती है। ऑस्ट्रेलियाई पर्वतीय ऐशवृक्ष नीलगिरी रेग्नांस सभी पुष्पित पेड़ों (आवृतबीजी) में सबसे लंबा हैआज की तारीख मेंसेंचुरियन नामक सबसे लंबे नमूने की ऊंचाई 99.6 मी॰ (327 फीट) मापी गयी है।[9] केवल कोस्ट रेडवुड ही इससे अधिक लंबा होता है और कोस्ट डगलस-फर लगभग एक सामान होता हैवे शंकुवृक्ष (जिम्नोस्पर्म) हैं। छह अन्य प्रजातियों के नीलगिरी 80 मीटर से अधिक ऊंचाई के होते हैं: नीलगिरी ऑब्लिक्वानीलगिरी डेलीगेटेंसिसनीलगिरी डायवर्सीकलरनीलगिरी निटेंसनीलगिरी ग्लोब्युल्स और नीलगिरी विमिनैलिस .

सहनशीलता

अधिकांश नीलगिरी शीत बर्दाश्त नहीं करतेया सिर्फ -3 डिग्री सेल्सियस से -5 डिग्री सेल्सियस तक की हलकी ठंड ही सह पाते हैं[[नीलगिरी पॉसीफ्लोरा|नीलगिरी पॉसीफ्लोरा ]] जैसे तथाकथित स्नो गम्स पेड़ ही सबसे अधिक सहिष्णु होते हैं जो ठंढ सहने की क्षमता रखते हैं और -20 डिग्री सेल्सियस तक की ठंड सह लेते हैं। विशेषकर ई. पॉसीफ्लोरा उप-प्रजाति निफोफिला और ई. पौसीफ्लोरा उप-प्रजाति डेब्यूज़ेविल्लेई नामक दो प्रजातियां इससे भी अधिक सहिष्णु होती हैंजो इससे भी ज्यादा ठंड बर्दाश्त करती हैं। अन्य अनेक प्रजातियांविशेषकर मध्य तस्मानिया के ऊंचे पठार और पहाड़ों की [[नीलगिरी कोक्सीफेरा|नीलगिरी कोक्सीफेरा ]][[नीलगिरी सबक्रेनुलता|नीलगिरी सबक्रेनुलता ]] और [[नीलगिरी गुन्नी|नीलगिरी गुन्नी ]] की प्रजातियां बहुत ही शीत-सहिष्णु बीजों का उत्पादन करती हैं और आनुवंशिक रूप से बहुत ही मजबूत नस्ल के इन बीजों को विश्व के शीत प्रदेशों में सजावट के लिए ले जाया जाता है।

पशु से नाता

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फास्कोलार्कटोस सिनेरियस कोआला नीलगिरी की पत्तियों को खाते हुए

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सॉफ़्लाई का लार्वा नीलगिरी की पत्तियों को खाते हुए

नीलगिरी के पत्तों से एक आवश्यक तेल निकाला जाता हैजिसमें ऐसे यौगिक होते हैं जो शक्तिशाली प्राकृतिक कीटनाशक का काम करते हैं और बड़ी मात्रा में यह विषैला भी हो सकता है। कई धानी शाकाहारीविशेष रूप से कोआला और कुछ पोसमअपेक्षाकृत इसे सह लेते हैं। इन तेलों के साथ फोर्मीलेटेड फ्लोरोग्लुसिनोल यौगिकों जैसे अन्य अधिक शक्तिशाली विषैले तत्वों का घनिष्ठ सहसंबंध कोआला तथा अन्य धानी प्रजातियों को पत्तों की गंध के आधार पर अपना भोजन चुनने की अनुमति देता है। कोआला के लिए ये यौगिक पत्तों के चयन में सबसे महत्वपूर्ण कारक हैं।

नीलगिरी फूल काफी मात्रा में रस पैदा करते हैंजो कीटपक्षीचमगादड़ और पॉसम सहित अनेक सेचन करनेवालों के भोजन के काम आता है। बहरहालनीलगिरी के पेड़ों में तेल और फेनिलक यौगिकों के कारण शाकाहारी जीवों से बचाव में सक्षम मालूम होता हैइनमें कीटों को मारनेवाले विष होते हैं। इनमें युक्लिप्टस के लंबी सूंडवाले छिद्रक सेमीपंकटेटा फोराकेंथा और ऐफिड जैसे साइलिड जो बेल लेर्पस नाम से जाने जाते हैंशामिल हैंदुनिया भर में जहां कहीं भी नीलगिरी की खेती होती है ये दोनों ही कीटनाशक के रूप में स्थापित हैं।

अधिक जानकारी के लिए देखें: list of Lepidoptera that feed on Eucalyptus

आग

गर्मी के दिनों में ऑस्ट्रेलियाई भूभाग पर नीलगिरी के तेल वाष्पीकृत होकर झाड़ी से ऊपर उठकर विचित्र किस्म की नीली धुंध की रचना करते है। नीलगिरी तेल अत्यंत ज्वलनशील होते हैं (ये वृक्ष विस्फोट के लिए जाने जाते हैं[7][10]) और झाड़ी की आग आसानी से तेल से भरपूर हवा के जरिए पेड़ों के शिखर तक पहुंच जाते हैं। मृत छाल और गिरती हुई शाखाएं भी ज्वलनशील होती हैं। छाल के नीचे लिगनोट्यूबर्स और एपिर्कोमिक कपोल के जरिए नीलगिरी के पेड़ नियतकालिक आग के लिए बहुत ही अनुकूल हैं।

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उत्थान की स्थिति में नीलगिरी का वन

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अक्टूबर 2007 की कैलिफोर्निया वाइल्डफायर्स की तेज हवाओं और गर्मी के कारण झुके हुए नीलगिरी के पेड़वे सैन डिएगो काउंटी के सैन डिएगुइटो रिवर पार्क में स्थित है और पश्चिम की तरफ झुकी हुई है

नीलगिरी 35 और 50 मिलियन साल पहले उत्पन्न हुआ हैलेकिन गोंडवाना से ऑस्ट्रेलिया-न्यू गिनी के अलग होने के बहुत बाद नहींचारकोल (काठ कोयला) में जीवाश्म के भंडार में वृद्धि (कहते हैं उन दिनों भी आग एक कारक थी) होने के साथ इनका उगना संयोग हैंलेकिन लगभग 20 मिलियन साल पहले तक तीसरे युग के वर्षावन में ये क्षुद्र अवयव थेजब महाद्वीप का पानी धीरे-धीरे सूखने लगा और मिट्टी के पोषक तत्वों की कमी आने से कैजुआरिना और बबूल की प्रजातियों के खुले जंगल जैसी स्थिति का विस्तार होने लगा। लगभग पचास हजार साल पहले मानव जाति के प्रथम आगमन के साथ आग बहुधा लगने लगी और आग से खासा लगाव रखनेवाले नीलगिरी के पेड़ों ने मोटे तौर पर ऑस्ट्रेलियाई जंगल के 70% को अपने चपेटे में ले लिया।

दो बहुमूल्य पेड़एल्पाइन ऐश ई. डेलेगाटेंसिस और ऑस्ट्रेलियाई पर्वतीय ऐश ई. रेगनैंस आग से खाक हो गए हैं और अकेले ये बीज से फिर से उत्पन्न हुए. 2003 में ऐसे ही झाड़ी में आग लगी जिसका कैनबेरा के आसपास के जंगलों में इसका थोड़ा असर हुआइसके परिणामस्वरूप हजारों हेक्टेयर भूमि पर मृत ऐशवृक्ष के जंगल का विस्तार हुआ। बहरहालकुछ ऐश वृक्ष रह गए और इसी के साथ नए ऐश वृक्ष भी उग आये। यह बहस का मुद्दा है कि इन्हें ऐसे ही छोड़ दिया जाए या अक्षतिग्रस्त लकड़ी की कटाई का प्रयास किया जाएजिसे एक नुकसानदेह काम समझा जा रहा है।

खेतीउपयोग और पर्यावरण संबंधी संपत्ति

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नमडगी नैशनल पार्क में यूकलिप्टस निफोफिलिया

नीलगिरी के बहुत सारे उपयोग हैंजिसने आर्थिक रूप से इसे विशिष्ट बना दिया है और दक्षिण अफ्रीका के कुछ देशों में इस पेड़ के तेजी से बढ़ने के कारण चिंता का विषय होने के बावजूद अफ्रीका के टिंबकटू[5]:22 और पेरू के एंडीज[4] जैसे गरीब क्षेत्र में यह नकदी फसल बन गया है।[6] सबसे अधिक ख्यातिप्राप्त किस्म संभवतया कारी और एलो बॉक्स हैं। तेजी से वृद्धि को प्राप्त करने के कारणइन पेड़ों का सबसे अधिक लाभदायक चीज इनकी लकड़ियां हैं। इन्हें जड़ से काटा जा सकता है और फिर से उग जाते हैं। इनकी कई अभीष्ट विशषेताओं के कारण सजावटलकड़ीजलावन और कोमल लकड़ी के रूप में ये हमारे लिए उपयोगी है। इसमें अत्यधिक मात्रा में रेशे होने के कारण नीलगिरी को दुनिया भर में सबसे उत्तम किस्म का लुगदी देनेवाली प्राजति माना जाता है। बहुत सारे उद्योगों में बाड़ लगाने और काठ कोयला से लेकर जैविक ईंधन के लिए सैलुलोज निष्कर्षण तक इसका उपयोग होता है। तेजी से बढ़ने के कारण नीलगिरी वायुरोधक के रूप में और मिट्टी के क्षरण को कम करने में भी उपयुक्त है।

वाष्पोत्सर्जन प्रक्रिया के जरिए नीलगिरी मिट्टी से बहुत बड़ी मात्रा में पानी सोखता है। कहीं-कहीं जलस्तर और मिट्टी में लवण की मात्रा को कम करने के लिए इन्हें लगाया (या बार-बार लगाया) जाता है। अल्जीरियालेबनॉनसिसली,[11]यूरोप और कैलिफोर्निया में कहीं-कहींमिट्टी की निकासी द्वारा मलेरिया कम करने के लिए भी नीलगिरी के पेड़ का इस्तेमाल होता है।[12] निकासी से दलदल जहां मच्छरों के लार्वा पैदा होते हैंसूख जाता हैलेकिन ये पारिस्थितिक रूप से उपजाऊ क्षेत्र को भी नष्ट करते हैं। यह निकासी मिट्टी के ऊपरी स्तर तक ही सीमित होता हैक्योंकि नीलगिरी के जड़ ऊपर-ऊपर ही होते हैंअधोभौम क्षेत्र तक नहीं पहुंचताइस कारण बारिश और सिंचाई मिट्टी को फिर से गीला कर देते हैं।

नीलगिरी का तेल पत्तों से आसानी से पिघल कर टपक जाता हैं और इनका उपयोग सफाईदुर्गंधनाशक और बहुत ही कम मात्रा में खाद्य पूरकखासतौर पर मिठाईखांसी की दवा और विसंकुलक के रूप में किया जा सकता है इसमें कीट प्रतिकारक गुण भी होते हैं (जान 1991 एबी1992) और वाणिज्यिक तौर पर कुछ मच्छर प्रतिकारकों में सक्रिय संघटक होते हैं।[13]

कुछ नीलगिरी के रस से उच्चकोटि का एक-पुष्पीय शहद बनता है। नीलगिरी की लकडि़यां आमतौर पर डेगरिडू बनाने के काम आती हैयह एक ऑस्ट्रेलियाई एबोरिजिना आदिवासियों का पारंपरिक सुषिर वाद्य है। पेड़ का तना दीमकों द्वारा खोखला कर दिया जाता है और अगर इसका माप और आकार उपयुक्त है तो काट लिया जाता है।

नीलगिरी का हरेक हिस्से का इस्तेमाल जो कि प्रोटीन रेशे जैसे (सिल्क और ऊन) का मूल होता हैपेड़ को महज पानी के साथ प्रसंस्करण द्वारा रंग बनाने में होता है इससे हरापीला-भूराचॉकलेटी और गहरे मंडुर लाल रंग के जरिए पीले और नारंगी श्रेणी के रंग प्राप्त किए जाते हैं।[14] प्रसंस्करण के बाद बची सामग्री का सुरक्षित रूप से गीले घास या उर्वरक के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है।[कृपया उद्धरण जोड़ें]

खेती और पारिस्थितिकीय समस्याएं

1770 में वनस्पतिशास्त्री सर जोसेफ बैंक्स द्वारा कुक अभियान के दौरान पहली बार पूरी दुनिया का परिचय ऑस्ट्रेलिया के नीलगिरी से हुआ। बाद में विशेष रूप से कैलिफोर्नियाब्राजीलइक्वाडोरकोलंबियाइथियोपियामोरक्कोपुर्तगालदक्षिण अफ्रीकायुगांडाइसराइलगैलिसिया और चिली सहित दुनिया के अनेक क्षेत्रों में इसे लगाया जाने लगा। स्पेन मेंकोमल लकड़ी के बागान में नीलगिरी लगाये जाने लगे। आराघरलुगदीचारकोल और अन्य अनेक उद्योगों का आधार है नीलगिरी . मुख्यतः वन्य जीवन के गलियारों और आवर्तन प्रबंधन के अभाव से कई प्रजातियां आक्रामक हो गयी हैं और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्रों के लिए बड़ी समस्या बन चुकी हैं।

समान अनुकूल जलवायु परिस्थिति के लिए कैलिफोर्निया और पुर्तगाल जैसे इलाकों में अक्सर ही नीलगिरी की जगह शाहबलूत के जंगल लगाए जाते हैं। मोनोकल्चर के परिणामस्वरूप जैविक विविधता के नुकसान के बारे में चिंता व्यक्त की जाती है। शाहबलूत के पेड़ नहीं होने से स्तनपायी और पक्षियों को खाने के फल उपलब्ध नहीं होतेउनके अभाव में उनके खोखले विवरों में पशु-पक्षियों को आवास नहीं मिल पाता और मधुमक्खियों के छत्तों के लिए स्थान नहीं रहतासाथ ही साथ व्यवस्थित वन में छोटे पेड़ों का अभाव भी होता है।

शुष्क मौसम में शाहबलूत के पेड़ अक्सर ही आग-प्रतिरोधी का काम करते हैंविशेष रूप से खुले घास के मैदानों मेंक्योंकि घास की आग बिखरे हुए पेड़ों को आग लगाने के लिए अपर्याप्त होती है। इसके विपरीत नीलगिरी जंगल आग फैलाने का काम करता हैक्योंकि इसकी पत्तियां विस्फोटक और अत्यधिक दहनशील तेल उत्पादित करती हैं। साथ ही साथ यह बड़ी मात्रा में ऐसा घासफूस भी पैदा करता है जो बहुत अधिक फेनोलिक्स होता हैजो फफूंदों से होनेवाले नुकसान से खुद को बचाता है और इस तरह भारी मात्रा मी सूखादहनशील ईंधन जमा कर लेता है।[15] नतीजतनघने नीलगिरी के जंगल विनाशकारी आग की आंधी का कारण हो सकते हैं। एपिकोर्मिक अंकुरों और लिग्नोट्यूबर,[15] या सेरोटेनियस फलों के उत्पादन द्वारा पुनर्जीवित होने की योग्यता से नीलगिरी लंबे समय तक आग में बचे रहने की क्षमता अर्जन करते हैं।

उत्तर अमेरिका

कैलिफोर्निया . 1850 के दशक मेंकैलिफोर्निया गोल्ड रश के दौरान कैलिफोर्निया में ऑस्ट्रेलियाईयों द्वारा नीलगिरी के पेड़ से परिचय कराया गया। कैलिफोर्निया के ज्यादातर हिस्से में ऑस्ट्रेलिया के कुछ इलाकों जैसी जलवायु है। 1900 के प्रारंभिक चरण मेंराज्य सरकार के प्रोत्साहन से हजारों एकड़ में नीलगिरी के पेड़ लगाए गए थे। यह आशा थी कि निर्माणफर्नीचर और रेलमार्ग टाई के लिए लकड़ी प्रदान करने के ये अक्षय स्रोत साबित होंगे। जल्द ही यह पाया गया कि अंतिम उद्देश्य के लिए नीलगिरी की लकड़ियां अनुपयुक्त हैंक्योंकि नीलगिरी की लकड़ियों से बनी रेलमार्ग टाई सूखने पर मुड़ जाया करती हैं और सूखी टाई इतनी कड़ी हो जाती हैं कि उनमे रेल की कील ठोंकना लगभग असंभव है।

"ऑस्ट्रेलिया के पुराने प्राकृतिक जंगलों पर आधारित कैलिफोर्निया में नीलगिरी के फायदे की संभावनाओं के वायदे पर वे चल पड़े थे। यह एक गलती थी क्योंकि सदियों पुरानी ऑस्ट्रेलिया के नीलगिरी लकड़ी के साथ कैलिफोर्निया के नए-नए पेड़ों की लकड़ी की गुणवत्ता की तुलना नहीं की जा सकती थी। इसकी कटाई के समय इसकी प्रतिक्रिया अलग प्रकार की होती. पुराने पेड़ों में दरार नहीं पड़ती या वे नहीं मुड़तेजबकि कैलिफोर्निया की नयी लकड़ियों में ऐसा हुआ करता था। दोनों के बीच एक विशाल अंतर था और इस कारण कैलिफोर्निया का नीलगिरी उद्योग बर्बाद हो गया।[16]

एक दूसरी तरह से नीलगिरीमुख्य रूप से नीली गोंद ई. ग्लोब्युलसकैलिफोर्निया में राजमार्गोंसंतरे के बागीचों और राज्य के अधिकांश वृक्षहीन मध्य भाग के अन्य फार्मों में वायुरोधी बनाने में मूल्यवान साबित हुए. कई शहरों और बागानों में छाया तथा सजावटी पेड़ के रूप में भी इनकी प्रशंसा की जाती है।

कैलिफोर्निया के जंगलों में नीलगिरी की आलोचना इसीलिए की गयी क्योंकि यह स्थानीय पेड़-पौधों से प्रतिस्पर्धा करते हैं और स्थानीय पशुओं के जीवन के अनुकूल नहीं है। आग भी एक समस्या है। 1991 में ओकलैंड हिल्स अग्नि में लगभग 3,000 घर जल गये और 25 लोग मारे गयेइसके लिए आंशिक रूप से उन घरों के पास भारी तादाद में मौजूद नीलगिरी के पेड़ भी जिम्मेवार हैं।[17]

कैलिफोर्निया के कुछ भागों में नीलगिरी जंगलों को हटाकर वहां देशी पेड़-पौधे फिर से लगाये जा रहे हैं। कुछ व्यक्ति भी अवैध रूप से कुछ पेड़ नष्ट कर रहे हैं और संदेह है कि ऑस्ट्रेलिया से ऐसे विनाशकारी कीट लाये जा रहे हैं जो पेड़ों पर हमला करते हैं।[18]

नीलगिरी के पेड़ असाधारण रूप से प्रशांत उत्तर-पश्चिम में अच्छी तरह से काम आ रहे हैं: वाशिंगटनऑरेगोन और ब्रिटिश कोलंबिया के भागों में.

दक्षिण अमेरिका

उरुग्वे . एंटोनियो लुस्सिच ने लगभग 1896 में उरुग्वे में नीलगिरी पेड़ों की शुरुआत कीपूरे तौर पर अब जिसे मैल्डोनाडो विभाग के नाम से जाना जाता है और यह दक्षिण-पूर्वी और पूर्वी तट तक सभी जगह फैल गया है। इस क्षेत्र में कोई पेड़-पौधे नहीं थेक्योंकि यह सूखी रेत के टीलों और पत्थरों से बना है। (लुस्सिच ने विशेष रूप से बबूल और चीड़ जैसे अन्य पेड़ भी लगाएलेकिन वे बड़े पैमाने पर तेजी से नहीं फैलते हैं।)

ब्राजील . 1910 में ब्राजील में लट्ठे के प्रतिस्थापन और चारकोल उद्योग के लिए नीलगिरी की शुरुआत हुई। यह स्थानीय वातावरण में फलने-फूलने लगा और आज वहां लगभग 5 लाख हेक्टेयर भूमि पर इसके जंगल हैं। काठ कोयला और लुगदी और कागज उद्योगों द्वारा इसकी लकड़ी की अत्यधिक सराहना की गयी है। लघु क्रमावर्तन से लकड़ी का भारी उत्पादन होता है और कई अन्य गतिविधियों के लिए लकड़ी की आपूर्ति होती हैइससे देसी जंगलों की रक्षा में मदद मिलती है। प्रबंधन अच्छा हो तो वृक्षारोपण टिकाऊ होते हैं और मिट्टी अंतहीन पुनर्रोपण को जारी रख सकती है। नीलगिरी वृक्षारोपण वायुरोधक का काम भी करते हैं। ब्राजील के वृक्षारोपण की वृद्धि दर दुनिया में एक रिकॉर्ड है,[19] खास तौर पर वहां प्रति वर्ष 40 क्यूबिक मीटर प्रति हेक्टेयर रोपाई होती है और वाणिज्यिक कटाई 5 साल के बाद होती है। लगातार विकास और सरकारी धन के कारणसाल-दर-साल विकास में लगातार सुधार किया जा रहा है। नीलगिरी का उत्पादन प्रति वर्ष 100 क्यूबिक मीटर प्रति हेक्टेयर तक किया जा सकता है। नीलगिरी की लुगदी और लट्ठों के निर्यात और निर्माण के मामले में ब्राजील शीर्ष पर है और इस क्षेत्र में देश के[तथ्य वांछित] प्रतिबद्ध अनुसंधान के जरिये ब्राजील ऑस्ट्रेलियाई बाजार के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। ब्राजील के स्थानीय लौह उत्पादक चारकोल के लिए दीर्घस्थायी परिपक्व नीलगिरी पर भारी भरोसा कर रहे हैंइससे हाल के वर्षों में चारकोल की कीमत में भारी इजाफा हुआ है। थॉम्सन फोरेस्ट्री (Thomson Forestry) जैसी टिंबर एस्सेट कंपनियां या अराक्रुज सेलूलोज़ (Aracruz Cellulose) और स्टोरा एंसो (Stora Enso) जैसे सेलूलोज़ उत्पादकों के पास आम तौर पर वनों का स्वामित्व है और वही राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय उद्योग को संचालित करते हैं। 1990 मेंब्राजील ने लगभग 1 बिलियन डॉलर का निर्यात किया था और 2005 तक 3.5 बिलियन डॉलर का.[तथ्य वांछित] इस व्यापार अधिशेष ने कृषि क्षेत्र में बड़ी मात्रा में विदेशी निवेश को आकर्षित किया। यूरोपीय निवेश बैंक और विश्व बैंक ने ब्राजील में लुगदी और कागज उद्योग तथा सेलूलोज़ प्रसंस्करण संयंत्रों के लिए विदेशी निवेश को पूरा सार्वजनिक समर्थन दिया। 1993 से ब्राजील के निजी उद्योग ने लुगदी और कागज उद्योग में 12 बिलियन डॉलर का निवेश किया है और हाल ही में वादा किया है कि इस क्षेत्र में अगले दशक में अतिरिक्त 14 बिलियन डॉलर का निवेश किया जाएगा.[कब?] वन उत्पाद उद्योग के खाते में सभी विश्व व्यापार लेखा का 3% आता है जो प्रति वर्ष 200 बिलियन अमेरीकी डॉलर से अधिक है। अनेक विदेशी TIMO (टिंबरलैंड इंवेस्टमेंट मैनेजमेंट ऑर्गनाइजेशन) की हाल की उपस्थिति वानिकी गतिविधि की आर्थिक क्षमता का एक आश्वासन है। दुनिया भर में TIMO प्रबंधित परिसंपत्ति 52 मिलियन डॉलर से अधिक हैजिसमें से 2012 से पहले 8 बिलियन डॉलर ब्राजील के विकास में निवेश किया जाना है।

कुल मिलाकरउम्मीद है कि 2010 तक दक्षिण अमेरिका विश्व के नीलगिरी के गोल लट्ठों के 55 प्रतिशत का उत्पादन करने लगेगा।

अफ्रीका

इथियोपिया . 1894 या 1895 मेंसम्राट मेनेलिक द्वितीय के फ्रांसिसी सलाहकार मोंडॉन विडैलहेट द्वारा या अंग्रेज कैप्टन ओब्रायन द्वारा नीलगिरी से इथियोपिया का परिचय कराया गया। जलावन के लिए शहर के आसपास बड़े पैमाने पर जंगल की कटाई होने के कारण मेनेलिक द्वितीय ने अपनी नई राजधानी अदीस अबाबा के आसपास इसके वन लगाने को बढ़ावा दिया। रिचर्ड आर. के. पंकहर्स्ट के अनुसार, "नीलगिरी का सबसे बड़ा फायदा है कि ये तेजी से बढ़ते हैंथोड़ी-सी देखभाल की जरूरत होती है और जब इन्हें काट लिया जाता है तो ये जड़ से वापस उग आते हैंहर दस साल में इनकी कटाई की जा सकती है। शुरूआत से ही पेड़ की सफलता सबित हो चुकी है".[20] नीलगिरी के बाग राजधानी से लेकर शहरी क्षेत्र के केंद्रस्थल तक जैसे डेब्रे मारकोज तक फैला हुआ है। पंकहर्स्ट कहते हैं कि 1960 के दशक के मध्य में एडीज अबाबा में सबसे आम प्रजाति ई. ग्लोबुलस मिलाहालांकि उन्हें ई. मेलिओडोरा और ई. रोस्ट्राटा भी अच्छी-खासी संख्या में भी मिला। 1940 के दशक के मध्य इथियोपिया के लेख में डेविड बक्सटॉन ने पाया कि नीलगिरी के पेड़ "अभिन्न हिस्सा बन गए हैं – और शोऑन के भूभाग का खुशगवार – तत्व बन गया और धीमी गति से बढ़नेवाले देसी 'सीडरजुनिपेरस प्रोसेरा की जगह बड़े पैमाने पर लगाये गए)."[21]

आम मान्यता कि नीलगिरी की प्यास नदी और कुंएं को भी सूखा देती हैके कारण इस प्रजाति का ऐसा विरोध होने लगा कि 1913 में इस मुद्दे के कारण आंशिक रूप से सभी पेड़ों को नष्ट कर कर देने की घोषणा की गयी और उनकी जगह शहतूत के पेड़ लगाये गए। पंकहर्स्ट कहते हैंयह घोषणा मृत पत्र बन कर रह गया; "नीलगिरी को काटे जाने का कोई प्रमाण नहीं मिलालेकिन शहतूत के पेड़ फिर भी लगाए गए।"[22] नीलगिरी अदीस अबाबा का खास पहचान रह गया।

मेडागास्कर. मेडागास्कर के मूल देशी जगंल के बड़े भाग में नीलगिरी के पेड़ लगाये गएइससे एंडासिबे मैंनटाडिया राष्ट्रीय पार्क जैसे अलग-थलग रह गए प्राकृतिक क्षेत्रों की जैव विविधता पर खतरा पैदा हो गया।

दक्षिण अफ्रीका . दक्षिण अफ्रीका में भी नीलगिरी की बहुत सारी प्रजातियों को मुख्य रूप से लट्ठ और जलावन के लिए ही नहींबल्कि सजावट के लिए भी लाया गया। ये शहद के लिए मधुमक्खी पालकों के बीच बहुत लोकप्रिय हैं[23] बहरहालइनके पानी को सोख लेने की क्षमता से पानी की आपूर्ति को खतरा हो जाने के कारण दक्षिण अफ्रीका में इन्हें आक्रामक माना जाता है। वे आस-पास की मिट्टी में एक ऐसा रसायन भी छोड़ते हैं जिनसे देसी प्रतिद्वंद्वी मारे जाते हैं।[6]

नीलगिरी के अंकुर आमतौर पर देसी घास को पछाड़ पाने में असमर्थ होते हैंलेकिन जब आग लगने से घास का आवरण हट जाता हैतब बीज की क्यारी बन सकती है। निम्नलिखित नीलगिरी प्रजातियां दक्षिण अफ्रीका में रचने-बसने में सक्षम हैं: ई. कैंलड्यूलेंसिसई. क्लैडोकैलिक्सई. डायवर्सीकलरई. ग्रैंडिस और ई. लेहमन्नी .[23]

जिंबाब्बे . दक्षिण अफ्रीका की ही तरहनीलगिरी की कई प्रजातियां जिम्बाब्वे लायी गयींमुख्य रूप से टिम्बर और जलावन के लिए और ई. रोबुस्टा और ई. टेरेटीकोर्निस को यहां के वातावरण में रचते-बसते दर्ज किया गया है।[23][23]

यूरोप

यूरोपीय पुर्तगाल में अज़ोरेस और गैलिसिया के असंख्य शाहबलूत के जंगलों की जगह लुगदी के लिए नीलगिरी के वन लगाये गयेजिससे वन्य जीवन पर बहुत ही बुरा असर पडॉ॰

इटली में19वीं सदी की समाप्ति पर ही नीलगिरी का आगमन हुआ और 20 वीं सदी की शुरुआत में मलेरिया के खात्मे के लिए वहां की दलदली भूमि को सुखाने के लिए बड़ी तादाद में इसका वृक्षारोपण शुरू हुआ। इतालवी जलवायु में उनके तेजी से विकास और वायुरोधी के रूप में उनके उत्कृष्ट कार्य के कारण सिसली और सार्डिनीया द्वीपों सहित देश के मध्य तथा दक्षिण में इन्हें बड़े पैमाने में देखा जाता है। इनसे उत्पादित विशेष खुशबू और स्वादिष्ट शहद के लिए भी इनकी कद्र की जाती है। नीलगिरी कैंलड्यूलेंसिस के विभिन्न प्रकार इटली में सबसे अधिक पाये जाते हैं।[24]

इतिहास

हालांकि नीलगिरी को पहले-पहल एकदम शुरुआती यूरोपीय खोजकर्ताओं और संग्राहकों द्वारा ही देखा गया होगालेकिन 1770 से पहले तक उनके किसी वनस्पति संग्रह का पता नहीं थाजब तक कि कप्तान जेम्स कुक के साथ जोसेफ बैंक्स और डैनियल सोलेंडर बॉटनी बे नहीं पहुंचे। वहां उन लोगों ने ई. गंमीफेरा और बाद में उत्तरी क्वींसलैंड में एंडेवर नदी के पास ई. प्लेटीफिल्ला के नमूने एकत्र कियेउस समय इनके नामकरण नहीं किये गये थे।

1777 मेंकुक के तीसरे अभियान मेंडेविड नेल्सन ने दक्षिणीतस्मानिया के ब्रुनी द्वीप से नीलगिरी का एक नमूना संग्रहित किया। यह नमूना लंदन के ब्रिटिश संग्रहालय ले जाया गया था और उस समय लंदन में कार्यरत फ्रांसीसी वनस्पतिशास्त्री एल'हेरिटियर ने उसका नाम रखा युक्लिप्टस ऑब्लीक्वा (Eucalyptus obliqua). उन्होंने यूनानी शब्द eu और calyptos को जोड़कर इस शब्द का इजाद कियाइनका अर्थ होता है "well" (भली-भांति) और "covered" (आवृत). यह कली की सुरक्षा के लिए उसके ऊपर के आवरण ऑपरक्युलम के संदर्भ में हैजो फूल बनने के समय पुंकेसर के दबाव पर खुल जाया करता है। यह बहुत संभव एक दुर्घटना जैसी ही थी कि एल'हेरीटियर ने सभी युक्लिप्टस (नीलगिरी) के लिए एक आम नाम चुना।

ऑब्लिक्वा नाम लैटिन शब्द obliquus (ऑब्लिक्यूस) से लिया गया हैजिसका अर्थ "oblique" (तिर्यक)इस वानस्पतिक शब्द का इस्तेमाल तब किया जाता है जब किसी पत्ते के आधार पर दोनों ओर की धार असमान लंबाई की होती हैं और पर्णवृंत की एक ही जगह में आपस में नहीं जुड़तीं.

ई. ऑब्लीक्वा 1788-89 में प्रकाशित हुई थीसंयोग से उसी समय ऑस्ट्रेलिया में पहला आधिकारिक यूरोपीय वास स्थापित हुआ। इस बीच और 19वीं सदी की समाप्ति के बादनीलगिरी की अनेक प्रजातियों के नामकरण हुए और उन्हें प्रकाशित किया गया। इनमें से अधिकांश अंग्रेज वनस्पति विज्ञानी जेम्स एडवर्ड स्मिथ द्वारा किये गये और जैसा कि उम्मीद की जा सकती है कि इनमें से अधिकांश सिडनी क्षेत्र के पेड़ थे। इनमें आर्थिक रूप से बहुमूल्य ई.पिलुलारिसई. सलिगना और ई. टेरेटीकोर्निस शामिल हैं।

1792 में फ्रांसिसी वनस्पतिशास्त्री जैक्वेज लैबिलारडियेर ने जहां से पहला स्थानीय पश्चिमी ऑस्ट्रेलियाई ‍नीलगिरी को संग्रहित किया और उन्होंने इसका नाम येट (Yate) (ई. कोरनुटा) दियावह स्थान अब एस्परेंस क्षेत्र कहलाता है।[8]

19 वीं सदी में कई नामी ऑस्ट्रेलियाई वनस्पतिशास्त्री सक्रिय थेखासकर फेरडिनैंड वॉन मुएलरनीलगिरी पर जिनके किये गये काम का 1867 में जॉर्ज बेनथेम के फ्लोरा ऑस्ट्रेलिएंसिस के पहले विस्तृत लेखाजोखा में बड़ा अवदान हैजो फिलहाल बाकी बचा एकमात्र संपूर्ण ऑस्ट्रेलियाई फ्लोरा है। इस वृतांत में वंश के बारे में सबसे महत्वपूर्ण आरंभिक व्यवस्थित वर्णन है। बेन्थम ने इसे पुकेसरोंविशेष रूप से पराग-कोश की विशेषताओं के आधार पर पांच श्रृंखलाओं में विभाजित किया (म्यूएलर1879-84)जोसेफ हेनरी मैडेन (1903-33) ने इस काम को विस्तारित किया और विलियम फारिस ब्लैकली (1934) ने इसे और आगे बढाया. पराग-कोश प्रणाली भी काम कर सकने में बहुत जटिल हो गयी थी और हाल के व्यवस्थित काम में कलियोंफलपत्ते और छाल की विशेषताओं पर ध्यान केंद्रित किया गया है।

इन्हें भी देखें

फोटो गैलरी

  • https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/c/c6/E.sideroxylon%2C_branchlets%2C_stems%2C_leaves%2C_capsules_%26_buds.jpg/90px-E.sideroxylon%2C_branchlets%2C_stems%2C_leaves%2C_capsules_%26_buds.jpg

यूकलिप्टस साइद्रोक्सिलनफल (बीज कोष) & ओपर्कुलम की उपस्थिति वाली कलियों का चित्र

 

  • https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/0/09/Bach_dan.jpg/120px-Bach_dan.jpg

ईस्ट गिप्सलैंडविक्टोरिया में नीलगिरी के वन.ज्यादातर यूकलिप्टस ऐल्बेंस (व्हाइट बॉक्स).

 

  • https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/e/ee/Eucalyptus_forest3.jpg/120px-Eucalyptus_forest3.jpg

ईस्ट गिप्सलैंडविक्टोरिया में नीलगिरी के वनज्यादातर यूकलिप्टस ऐल्बेंस (व्हाइट बॉक्स).

 

  • https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/f/f8/Eucalypt_forest.jpg/120px-Eucalypt_forest.jpg

ईस्ट गिप्सलैंडविक्टोरिया में नीलगिरी के वन.ज्यादातर यूकलिप्टस ऐल्बेंस (व्हाइट बॉक्स).

 

  • https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/c/ce/Eucalyptustreewithsun.JPG/120px-Eucalyptustreewithsun.JPG

नीलगिरी का एक वृक्ष जिसकी शाखाओं पर सूर्य का प्रकाश पड़ रहा है

 

  • https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/d/d6/Applebox.JPG/120px-Applebox.JPG

रेड हिलऑस्ट्रेलियैक राजधानी क्षेत्र में नीलगिरी ब्रिदगेसियाना (एप्पल बॉक्स).

 

  • https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/5/5f/Euc.uk.600pix.jpg/108px-Euc.uk.600pix.jpg

दक्षिणी इंग्लैंड में रोपी गई नीलगिरी गुन्नी.तना का निचला भाग आइवी लता में शामिल है।

 

  • https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/e/e2/Eucalyptus_cinera_x_pulverulenta.jpg/80px-Eucalyptus_cinera_x_pulverulenta.jpg

नीलगिरी सिनेरिया एक्स पुल्वेरूलेंटा - नेशनल बॉटनिकल गार्डन कैनबरा

 

  • https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/3/3d/Eucalyptus_gall.jpg/120px-Eucalyptus_gall.jpg

नीलगिरी गॉल

 

  • https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/3/36/CPonte_Eucalyptus.jpg/120px-CPonte_Eucalyptus.jpg

नीलगिरी ग्रंडिस.ब्यूनस आयर्स प्रांतअर्जेंटीना.

 

  • https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/3/32/Eucalipto_Galicia.JPG/90px-Eucalipto_Galicia.JPG

उत्तर-पश्चिम स्पेन में गलिसिया में विवेरो के पास नीलगिरी का वृक्षारोपण. ज्यादातर यूकलिप्टस ग्लोबुलस

 

  • https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/e/ea/Snow_Gum1.JPG/120px-Snow_Gum1.JPG

स्नो गम (ई. पौसिफ्लोरा)ऑस्ट्रेलियाई आल्प्स में सर्दियों में

 

  • https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/f/f6/Eucalyptus_rubida.jpg/120px-Eucalyptus_rubida.jpg

न्यू साऊथ वेल्स के बुरा में यूकलिप्टस रुबिडा (कैंडलबर्क गम)

 

  • https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/9/95/Heathcote_National_Park_tree.jpg/120px-Heathcote_National_Park_tree.jpg

हेथकोट नैशनल पार्क में इस पेड़ को एक गंभीर समस्या है।

 

  • https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/6/6e/Coast_Eucalyptus.JPG/120px-Coast_Eucalyptus.JPG

कोरीम्बिया मकुलाटा पेड़ साउथ कोस्ट न्यू साउथ वेल्स

 

  • https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/6/62/Eucalyptus_Chapmaniana_5198.JPG/120px-Eucalyptus_Chapmaniana_5198.JPG

लन्दन के क्यों गार्डंस में यूकलिप्टस चापमनियाना (बोगंग गम)

 

  • https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/a/a6/Sherbrooke_forest_Victoria_220rs.jpg/120px-Sherbrooke_forest_Victoria_220rs.jpg

विक्टोरिया के शेरब्रुक में नीलगिरी रेग्नंस के पेड़

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नीम का वृक्ष

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नीम की निबौली

नीम भारतीय मूल का एक पर्ण- पाती वृक्ष है। यह सदियों से समीपवर्ती देशों- पाकिस्तानबांग्लादेशनेपालम्यानमार (बर्मा)थाईलैंडइंडोनेशियाश्रीलंका आदि देशों में पाया जाता रहा है। लेकिन विगत लगभग डेढ़ सौ वर्षों में यह वृक्ष भारतीय उपमहाद्वीप की भौगोलिक सीमा को लांघ कर अफ्रीकाआस्ट्रेलियादक्षिण पूर्व एशियादक्षिण एवं मध्य अमरीका तथा दक्षिणी प्रशान्त द्वीपसमूह के अनेक उष्ण और उप-उष्ण 

 

अनुक्रम

2पारिस्थितिकी कटिबन्धीय देशों में भी पहुँच चुका है। इसका वानस्पतिक नाम Azadirachta indica है। नीम का वानस्पतिक नाम इसके अरबी- फारसी नाम आज़ाद दरख़्त ए हिन्द'से व्युत्पन्न है।

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फूल व पत्तियाँ कोलकातापश्चिम बंगालभारत.

नीम एक तेजी से बढ़ने वाला पर्णपाती पेड़ हैजो 15-20 मी (लगभग 50-65 फुट) की ऊंचाई तक पहुंच सकता है और कभी-कभी 35-40 मी (115-131 फुट) तक भी ऊंचा हो सकता है। नीम गंभीर सूखे में इसकी अधिकतर या लगभग सभी पत्तियां झड़ जाती हैं। इसकी शाखाओं का प्रसार व्यापक होता है। तना अपेक्षाकृत सीधा और छोटा होता है और व्यास में 1.2 मीटर तक पहुँच सकता है। इसकी छाल कठोरविदरित (दरारयुक्त) या शल्कीय होती है और इसका रंग सफेद-धूसर या लालभूरा भी हो सकता है। रसदारु भूरा-सफेद और अंत:काष्ठ लाल रंग का होता है जो वायु के संपर्क में आने से लाल-भूरे रंग में परिवर्तित हो जाता है। जड़ प्रणाली में एक मजबूत मुख्य मूसला जड़ और अच्छी तरह से विकसित पार्श्व जड़ें शामिल होती हैं।

20-40 सेमी (8 से 16 इंच) तक लंबी प्रत्यावर्ती पिच्छाकार पत्तियां जिनमें20 से लेकर 31 तक गहरे हरे रंग के पत्रक होते हैं जिनकी लंबाई 3-8 सेमी (1 से 3 इंच) तक होती है। अग्रस्त (टर्मिनल) पत्रक प्राय: उनुपस्थित होता है। पर्णवृंत छोटा होता है। कोंपलों (नयी पत्तियाँ) का रंग थोड़ा बैंगनी या लालामी लिये होता है। परिपक्व पत्रकों का आकार आमतौर पर असममितीय होता है और इनके किनारे दंतीय होते हैं।


 
फूल सफेद और सुगन्धित होते हैं और एक लटकते हुये पुष्पगुच्छ जो लगभग 25 सेमी (10 इंच) तक लंबा होता है में सजे रहते हैं। इसका फल चिकना (अरोमिल) गोलाकार से अंडाकार होता है और इसे निंबोली कहते हैं। फल का छिलका पतला तथा गूदा रेशेदारसफेद पीले रंग का और स्वाद में कड़वा-मीठा होता है। गूदे की मोटाई 0.3 से 0.5 सेमी तक होती है। गुठली सफेद और कठोर होती है जिसमें एक या कभी-कभी दो से तीन बीज होते हैं जिनका आवरण भूरे रंग का होता है।

नीम के पेड़ों की व्यवसायिक खेती को लाभदायक नहीं माना जाता। मक्का के निकट तीर्थयात्रियों के लिए आश्रय प्रदान करने के लिए लगभग 50000 नीम के पेड़ लगाए गए हैं।[तथ्य वांछित]

नीम का पेड़ बहुत हद तक चीनीबेरी के पेड़ के समान दिखता हैजो एक बेहद जहरीला वृक्ष है।

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हरेली पर्व के अवसर पर नीम के साथ छत्तीसगढ़ का एक ग्रामीण

पारिस्थितिकी

नीम का पेड़ सूखे के प्रतिरोध के लिए विख्यात है। सामान्य रूप से यह उप-शुष्क और कम नमी वाले क्षेत्रों में फलता है जहाँ वार्षिक वर्षा 400 से 1200 मिमी के बीच होती है। यह उन क्षेत्रों में भी फल सकता है जहाँ वार्षिक वर्षा 400 मिमी से कम होती है पर उस स्थिति में इसका अस्तित्व भूमिगत जल के स्तर पर निर्भर रहता है। नीम कई अलग-अलग प्रकार की मिट्टी में विकसित हो सकता हैलेकिन इसके लिये गहरी और रेतीली मिट्टी जहाँ पानी का निकास अच्छा होसबसे अच्छी रहती है। यह उष्णकटिबंधीय और उपउष्णकटिबंधीय जलवायु में फलने वाला वृक्ष है और यह 22-32° सेंटीग्रेड के बीच का औसत वार्षिक तापमान सहन कर सकता है। यह बहुत उच्च तापमान को तो बर्दाश्त कर सकता हैपर 4 डिग्री सेल्सियस से नीचे के तापमान में मुरझा जाता है। नीम एक जीवनदायी वृक्ष है विशेषकर तटीयदक्षिणी जिलों के लिए। यह सूखे से प्रभावित (शुष्क प्रवण) क्षेत्रों के कुछ छाया देने वाले (छायादार) वृक्षों में से एक है। यह एक नाजुक पेड़ नहीं हैं और किसी भी प्रकार के पानी मीठा या खारा में भी जीवित रहता है। तमिलनाडु में यह वृक्ष बहुत आम है और इसको सड़कों के किनारे एक छायादार पेड़ के रूप में उगाया जाता हैइसके अलावा लोग अपने आँगन में भी यह पेड़ उगाते हैं। शिवकाशी (सिवकासी) जैसे बहुत शुष्क क्षेत्रों मेंइन पेड़ों को भूमि के बड़े हिस्से में लगाया गया है और इनकी छाया में आतिशबाजी बनाने के कारखाने का काम करते हैं।

उपयोग

नीम एक बहुत ही अच्छी वनस्पति है जो की भारतीय पर्यावरण के अनुकूल है और भारत में बहुतायत में पाया जाता है। आयुर्वेद में नीम को बहुत ही उपयोगी पेड़ माना गया है। इसका स्वाद तो कड़वा होता है लेकिन इसके फायदे अनेक और बहुत प्रभावशाली है। [1][2] [3]

१- नीम की छाल का लेप सभी प्रकार के चर्म रोगों और घावों के निवारण में सहायक है।

२- नीम की दातुन करने से दांत और मसूड़े स्वस्थ रहते हैं।

३- नीम की पत्तियां चबाने से रक्त शोधन होता है और त्वचा विकार रहित और कांतिवान होती है। हां पत्तियां अवश्य कड़वी होती हैंलेकिन कुछ पाने के लिये कुछ तो खोना पड़ता है मसलन स्वाद।

४- नीम की पत्तियों को पानी में उबाल उस पानी से नहाने से चर्म विकार दूर होते हैं और ये खासतौर से चेचक के उपचार में सहायक है और उसके विषाणु को फैलने न देने में सहायक है।

५- नींबोली (नीम का छोटा सा फल) और उसकी पत्तियों से निकाले गये तेल से मालिश की जाये तो शरीर के लिये अच्छा रहता है।

६- नीम के द्वारा बनाया गया लेप बालो में लगाने से बाल स्वस्थ रहते हैं और कम झड़ते हैं।

७- नीम की पत्तियों के रस को आंखों में डालने से आंख आने की बीमारी में लाभ मिलता है(नेत्रशोथ या कंजेक्टिवाइटिस)

८- नीम की पत्तियों के रस और शहद को २:१ के अनुपात में पीने से पीलिया में फायदा होता है और इसको कान में डालने से कान के विकारों में भी फायदा होता है।

९- नीम के तेल की ५-१० बूंदों को सोते समय दूध में डालकर पीने से ज़्यादा पसीना आने और जलन होने सम्बन्धी विकारों में बहुत फायदा होता है।

१०- नीम के बीजों के चूर्ण को खाली पेट गुनगुने पानी के साथ लेने से बवासीर में काफ़ी फ़ायदा होता है।

औषधि

नीम घनवटी नामक आयुर्वेद में औषधि है जी की के पेड़ से निकली जाती है। इसका मुख्य घटक नीमघन सत् होता है। यह मधुमेह में अत्यधिक लाभकारी है।[4] २. इसका प्रयोग शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए किया जाता है। यह आयुर्वेद में एक प्रकार की औषधि है जी की नीम (Azadirachta indica) के पेड़ से निकली जाती है।

मुख्य घटक

नीमघन सत्

मुख्य लाभ

यह मधुमेह में अत्यधिक लाभकारी है।[4] इसका प्रयोग शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए किया जाता है। यह जीवाणु नाशकरक्त्शोधाक एवं त्वचा विकारों में गुणकारी है[5][6]। यह बुखार में भी लाभकारी है।

नीम त्वचा के औषधीय कार्यों में उपयोग की जाती है । नीम के उपयोग से त्वचा की चेचक जैसी भयंकर बीमारिया नही होती तथा इससे रक्त शुद्ध होता है । नीम स्वास्थ वर्धक एवं आरयोग्यता प्रदान करने वाला है। ये सभी प्रकार की व्याधियों को हरने वाला हैइसे मृत्यु लोक का कुल्पवृक्ष कहा जाता है। चरम रोग मे इसका विशेष महत्व है।

भारत में नीम का उपयोग एक औषधि के रूप में किया जाता हैआज के समय में बहुत सी एलोपैथिक दवाइयां नीम की पत्ती व उसकी छल से बनती है । नीम के पेड़ की हर अंग फायदेमंद होता हैबहुत सी  बीमारियों का उपचार इससे किया जाता है । भारत में नीम का पेड़ घर में लगाना शुभ माना जाता है ।

नीम स्वाद में कड़वा होता हैलेकिन नीम जितनी कड़वी होती हैउतनी ही फायदे वाली होती है ।

भारत में नीम का उपयोग एक औषधि के रूप में किया जाता हैआज के समय में बहुत सी एलोपैथिक दवाइयां नीम की पत्ती व उसकी छल से बनती है । नीम के पेड़ की हर अंग फायदेमंद होता हैबहुत सी  बीमारियों का उपचार इससे किया जाता है । भारत में नीम का पेड़ घर में लगाना शुभ माना जाता है ।
 
नीम स्वाद में कड़वा होता हैलेकिन नीम जितनी कड़वी होती हैउतनी ही फायदे वाली होती है । यहां हम आपको नीम के गुण और उसके लाभ के बारे में बता रहे हैं । जिसे आप घर में ही उपयोग कर बहुत बीमारियों का उपचार कर सकते हैं ।

काउंसिल फॉर द इंडियन स्कूल सर्टिफिकेट एग्जामिनेशन (आईसीएसई) ने प्रसिद्ध कहानीकार कृश्न चंदर की कहानी ‘जामुन का पेड़’ को दसवीं कक्षा के पाठ्यक्रम से हटा दिया है.
बोर्ड के इम्तिहानों से महज तीन महीने पहले यह फैसला लिया गया. द टेलीग्राफ के अनुसार आईसीएसई काउंसिल की ओर से जारी एक नोटिस में बताया गया है कि 2020-2021 में बोर्ड की परीक्षा देने वाले विद्यार्थियों से इस कहानी से प्रश्न नहीं किए जाएंगे.
काउंसिल के सेक्रेटरी और मुख्य कार्यकारी गेरी अराथून ने अख़बार को बताया कि कहानी को इसलिए हटाया गया क्योंकि यह दसवीं के विद्यार्थियों के लिए ‘उपयुक्त’ नहीं थी. हालांकि उन्होंने इसका कारण नहीं बताया, न ही यह बताया कि इस पर किसके द्वारा आपत्ति दर्ज करवाई गयी थी.
साठ के दशक में लिखी गई चंदर की यह कहानी साल 2015 से आईसीएसई के पाठ्यक्रम में थी. कहानी व्यंग्यात्मक शैली में लिखी गई है, जहां एक पेड़ के गिरने पर उसके नीचे दबे व्यक्ति को निकालने के लिए की जा रही सरकारी कार्रवाई के बारे में बताया गया है, जो देश में सरकारी विभागों के काम करने के तौर-तरीकों पर सवाल उठाती है.
इस कहानी को नीचे पढ़ सकते हैं.
रात को बड़े ज़ोर का झक्कड़ (आंधी) चला. सेक्रेटेरियट के लाॅन में जामुन का एक दरख़्त गिर पड़ा. सुबह जब माली ने देखा तो इसे मालूम पड़ा कि दरख़्त के नीचे एक आदमी दबा पड़ा है.
माली दौड़ा-दौड़ा चपरासी के पास गया. चपरासी दौड़ा-दौड़ा क्लर्क के पास गया. क्लर्क दौड़ा-दौड़ा सुपरिटेंडेंट के पास गया. सुपरिटेंडेंट दौड़ा-दौड़ा बाहर लॉन में आया. मिनटों में गिरे हुए दरख़्त के नीचे दबे हुए आदमी के गिर्द मज़मा इकट्ठा हो गया.
‘बेचारा! जामुन का पेड़ कितना फलदार था.’ एक क्लर्क बोला.
‘इसकी जामुन कितनी रसीली होती थीं.’ दूसरा क्लर्क बोला.
‘मैं फलों के मौसम में झोली भर के ले जाता था. मेरे बच्चे इस की जामुनें कितनी ख़ुशी से खाते थे.’ तीसरे क्लर्क ने तक़रीबन आबदीदा (रुआंसे) होकर कहा.
‘मगर ये आदमी?’ माली ने दबे हुए आदमी की तरफ़ इशारा किया.
‘हां, यह आदमी!’ सुपरिटेंडेंट सोच में पड़ गया.
‘पता नहीं ज़िंदा है कि मर गया!’ एक चपरासी ने पूछा.
‘मर गया होगा. इतना भारी तना जिनकी पीठ पर गिरे, वह बच कैसे सकता है!’ दूसरा चपरासी बोला.
‘नहीं मैं ज़िंदा हूं!’ दबे हुए आदमी ने बमुश्क़िल कराहते हुए कहा.
‘ज़िंदा है!’ एक क्लर्क ने हैरत से कहा.
‘दरख़्त को हटाकर इसे निकाल लेना चाहिये.’ माली ने मशविरा दिया.
‘मुश्क़िल मालूम होता है.’ एक काहिल और मोटा चपरासी बोला. ‘दरख़्त का तना बहुत भारी और वज़नी है.’
‘क्या मुश्क़िल है?’ माली बोला. ‘अगर सुपरिटेंडेंट साहब हुक़्म दे तो अभी पंद्रह-बीस माली, चपरासी और क्लर्क ज़ोर लगाकर दरख़्त के नीचे से दबे आदमी को निकाल सकते हैं.’
‘माली ठीक कहता है.’ बहुत-से क्लर्क एक साथ बोल पड़े. ‘लगाओ ज़ोर, हम तैयार हैं.’
एकदम बहुत से लोग दरख़्त को काटने पर तैयार हो गए.
‘ठहरो!’, सुपरिटेंडेंट बोला, ‘मैं अंडर-सेक्रेटरी से मशविरा कर लूं .’
सुपरिटेंडेंट अंडर-सेक्रेटरी के पास गया. अंडर-सेक्रेटरी डिप्टी सेक्रेटरी के पास गया. डिप्टी सेक्रेटरी जॉइन्ट सेक्रेटरी के पास गया. जॉइन्ट सेक्रेटरी चीफ सेक्रेटरी के पास गया.
चीफ सेक्रेटरी ने जॉइन्ट सेक्रेटरी से कुछ कहा. जॉइन्ट सेक्रेटरी ने डिप्टी सेक्रेटरी से कुछ कहा. डिप्टी सेक्रेटरी ने अंडर सेक्रेटरी से कुछ कहा. एक फाइल बन गयी.
फाइल चलने लगी. फाइल चलती रही. इसी में आधा दिन गुज़र गया. दोपहर को खाने पर दबे हुए आदमी के गिर्द बहुत भीड़ हो गयी थी. लोग तरह-तरह की बातें कर रहे थे. कुछ मनचले क्लर्कों ने मामले को अपने हाथ में लेना चाहा.
वह हुक़ूमत के फ़ैसले का इंतज़ार किए बग़ैर दरख़्त को ख़ुद से हटाने का तहैया कर रहे थे कि इतने में सुपरिटेंडेंट फाइल लिए भागा-भागा आया, बोला, ‘हम लोग ख़ुद से इस दरख़्त को यहां से हटा नहीं सकते. हम लोग महक़मा तिज़ारत (वाणिज्य विभाग) से मुताल्लिक़ (संबंधित) हैं और यह दरख़्त का मामला है जो महकमा-ए-ज़िराअत (कृषि विभाग) की तहवील (कब्ज़े) में है. इसलिए मैं इस फाइल को अर्जेन्ट मार्क करके महक़मा-ए-ज़िराअत में भेज रहा हूं . वहां से जवाब आते ही इस को हटवा दिया जाएगा.’
दूसरे दिन महक़मा-ए-ज़िराअत से जवाब आया कि दरख्त हटवाने की ज़िम्मेदारी महकमा-ए-तिज़ारत पर आईद (लागू) होती है. यह जवाब पढ़कर महक़मा-ए-तिज़ारत को ग़ुस्सा आ गया. उन्होंने फ़ौरन लिखा कि पेड़ों को हटवाने या न हटवाने की ज़िम्मेदारी महक़मा-ए-ज़िराअत पर आईद होती है. महक़मा-ए-तिज़ारत का इस मामले से कोई ताल्लुक़ नहीं है.
दूसरे दिन भी फाइल चलती रही. शाम को जवाब भी आ गया. ‘हम इस मामले को हॉर्टीकल्चरल डिपार्टमेंट के सुपुर्द कर रहे हैं क्योंकि यह एक फलदार दरख़्त का मामला है और एग्रीकल्चरल डिपार्टमेंट सिर्फ अनाज और खेतीबाड़ी के मामलों में फ़ैसला करने का मजाज़ (अधिकार) है. जामुन का पेड़ एक फलदार पेड़ है इसलिए पेड़ हॉर्टीकल्चरल डिपार्टमेंट के दाइरे-अख़्तियार (अधिकारक्षेत्र) में आता है.’
रात को माली ने दबे हुए आदमी को दाल-भात खिलाया हालांकि लॉन के चारों तरफ पुलिस का पहरा था कि कहीं लोग क़ानून को अपने हाथ में ले के दरख़्त को ख़ुद से हटवाने की कोशिश न करें. मगर एक पुलिस काॅन्स्टेबल को रहम आ गया और इसने माली को दबे हुए आदमी को खाना खिलाने की इजाज़त दे दी.
माली ने दबे हुए आदमी से कहा, ‘तुम्हारी फाइल चल रही है. उम्मीद है कि कल तक फ़ैसला हो जाएगा.’
दबा हुआ आदमी कुछ न बोला.
माली ने पेड़ के तने को ग़ौर से देखकर कहा, ‘हैरत गुज़री कि तना तुम्हारे कूल्हे पर गिरा. अगर कमर पर गिरता तो रीढ़ की हड्डी टूट जाती.’
दबा हुआ आदमी फिर भी कुछ न बोला.
माली ने फिर कहा, ‘तुम्हारा यहां कोई वारिस हो तो मुझे उसका अता-पता बताओ. मैं उसे ख़बर देने की कोशिश करूंगा.’
‘मैं लावारिस हूं.’ दबे हुए आदमी ने बड़ी मुश्क़िल से कहा.
माली अफ़सोस ज़ाहिर करता हुआ वहां से हट गया.
तीसरे दिन हॉर्टीकल्चरल डिपार्टमेंट से जवाब आ गया. बड़ा कड़ा जवाब था और तंज़आमेज़ (व्यंग्यपूर्ण). हॉर्टीकल्चरल डिपार्टमेंट का सेक्रेटरी अदबी मिजाज़ का आदमी मालूम होता था.
इसने लिखा था, ‘हैरत है, इस समय जब ‘दरख़्त उगाओ’ स्कीम बड़े पैमाने पर चल रही हैं, हमारे मुल्क़ में ऐसे सरकारी अफ़सर मौज़ूद हैं जो दरख़्त काटने का मशवरा देते हैं, वह भी एक फलदार दरख़्त को! और फिर जामुन के दरख़्त को! जिस की फल अवाम बड़ी रग़बत (चाव) से खाते हैं! हमारा महक़मा किसी हालत में इस फलदार दरख़्त को काटने की इज़ाजत नहीं दे सकता.’
‘अब क्या किया जाए?’ एक मनचले ने कहा. ‘अगर दरख़्त काटा नहीं जा सकता तो इस आदमी को काटकर निकाल लिया जाए! यह देखिए, उसी आदमी ने इशारे से बताया. अगर इस आदमी को बीच में से यानी धड़ के मुकाम से काटा जाए तो आधा आदमी इधर से निकल आएगा और आधा आदमी उधर से बाहर आ जाएगा, और दरख्त वहीं का वहीं रहेगा.’
‘मगर इस तरह से तो मैं मर जाऊंगा!’ दबे हुए आदमी ने एहतजाज़ किया.
‘यह भी ठीक कहता है!’ एक क्लर्क बोला.
आदमी को काटने वाली तजवीज़ (प्रस्ताव) पेश करने वाले ने पुरज़ोर-एहतजाज़ (कड़ा विरोध) किया, ‘आप जानते नहीं हैं. आजकल प्लास्टिक सर्जरी के ज़रिये धड़ के मुकाम पर इस आदमी को फिर से जोड़ा जा सकता है.’
अब फाइल को मेडिकल डिपार्टमेंट में भेज दिया गया. मेडिकल डिपार्टमेंट ने फ़ौरन इस पर एक्शन लिया और जिस दिन फाइल मिली उसने उसी दिन इस महक़मे का सबसे क़ाबिल प्लास्टिक सर्जन तहकीकात के लिए भेज दिया.
सर्जन ने दबे हुए आदमी को अच्छी तरह टटोलकर, उसकी सेहत देखकर, ख़ून का दबाव, सांस की आमदो-रफ़्त, दिल और फेफड़ों की जांचकर के रिपोर्ट भेज दी कि, ‘इस आदमी का प्लास्टिक सर्जरी का ऑपरेशन तो हो सकता है और ऑपरेशन कामयाब भी हो जाएगा, मगर आदमी मर जाएगा.’
लिहाज़ा यह तज़वीज़ भी रद्द कर दी गयी.
रात को माली ने दबे हुए आदमी के मुंह में खिचड़ी के लुक़मे डालते हुए उसे बताया, ‘अब मामला ऊपर चला गया है. सुना है कि सेक्रेटेरियट के सारे सेक्रेटेरियों की मीटिंग होगी. इसमें तुम्हारा केस रखा जाएगा. उम्मीद है सब काम ठीक हो जाएगा.’
दबा हुआ आदमी एक आह भरकर आहिस्ते से बोला, ‘हमने माना कि तग़ाफुल न करोगे लेकिन ख़ाक़ हो जाएंगे हम, तुमको ख़बर होने तक!’
माली ने अचंभे से मुंह में उंगली दबायी. हैरत से बोला, ‘क्या तुम शायर हो?’
दबे हुए आदमी ने आहिस्ते से सिर हिला दिया.

फोटो: पीटीआई
दूसरे दिन माली ने चपरासी को बताया. चपरासी ने क्लर्क को और क्लर्क ने हेड-क्लर्क को. थोड़े ही अरसे में सेक्रेटेरियट में यह बात फैल गयी कि दबा हुआ आदमी शायर है.
बस फिर क्या था. लोग जोक-दर-जोक (झुंड बनाकर) शायर को देखने के लिए आने लगे. इसकी ख़बर शहर में फैल गयी. और शाम तक मुहल्ले-मुहल्ले से शायर जमा होना शुरू हो गए. सेक्रेटेरियट का लॉन भांत-भांत के शायरों से भर गया. सेक्रेटेरियट के कई क्लर्क और अंडर-सेक्रेटरी तक, जिन्हें अदब और शायर से लगाव था, रुक गए.
कुछ शायर दबे हुए आदमी को अपनी ग़ज़लें और नज़्में सुनाने लगे. कई क्लर्क इससे अपनी ग़ज़लों पर इस्लाह (सुधार) लेने के लिए मुसिर होने (ज़िद करने) लगे.
जब यह पता चला कि दबा हुआ आदमी शायर है तो सेक्रेटेरियट की सब-कमेटी ने फ़ैसला किया कि चूंकि दबा हुआ आदमी एक शायर है लिहाज़ा इस फाइल का ताल्लुक़ न एग्रीकल्चरल डिपार्टमेंट से है, न हाॅर्टीकल्चरल डिपार्टमेंट से बल्कि सिर्फ़ और सिर्फ़ कल्चरल डिपार्टमेंट से है.
कल्चरल डिपार्टमेंट से इसतदअ (गुज़ारिश) की गयी कि जल्द से जल्द इस मामले का फ़ैसला करके बदनसीब शायर को इस शजरे-सायादार (छांव देने वाला पेड़) से रिहाई दिलायी जाए.
फाइल कल्चरल डिपार्टमेंट के मुख़्तलिफ़ शुआबों (विभाग) से गुज़रती हुई अदबी अकादमी के सेक्रेटरी के पास पहुंची. बेचारा सेक्रेटरी इसी वक़्त अपनी गाड़ी में सवार हो कर सेक्रेटेरियट पहुंचा और दबे हुए आदमी से इंटरव्यू लेने लगा.
‘तुम शायर हो?’ इसने पूछा.
‘जी हां.’ दबे हुए आदमी ने जवाब दिया.
‘क्या तख़ल्लुस करते हो?’
‘अवस.’
‘अवस!’ सेक्रेटरी ज़ोर से चीखा. ‘क्या तुम वही हो जिसका मजमुआ-ए-कलाम (शायरी संग्रह) अवस के फूल हाल ही में शाया (प्रकाशित) हुआ है?’
दबे हुए शायर ने इस बात में सिर हिलाया.
‘क्या तुम हमारी अकादमी के मेंबर हो?’ सेक्रेटरी ने पूछा.
‘नहीं!’
‘हैरत है!’ सेक्रेटरी ज़ोर से चीखा. ‘इतना बड़ा शायर! ‘अवस के फूल’ का मुसन्निफ़ (लेखक) ! और हमारी अकादमी का मेंबर नहीं है! उफ़, उफ़ कैसी ग़लती हो गयी हमसे! कितना बड़ा शायर और कैसे गोशिया-ए-ग़ुमनामी (गुमनामी के कोने) में दबा पड़ा है!’
‘गोशिया-ए-गुमनामी में नहीं बल्कि एक दरख़्त के नीचे दबा हुआ… बराहे-क़रम मुझे इस पेड़ के नीचे से निकालिए.’
‘अभी बंदोबस्त करता हूं.’ सेक्रेटरी फ़ौरन बोला और फ़ौरन जाकर इसने अपने महकमे में रिपोर्ट पेश की.
दूसरे दिन सेक्रेटरी भागा-भागा शायर के पास आया और बोला, ‘मुबारक़ हो, मिठाई खिलाओ, हमारी सरकारी अकादमी ने तुम्हें अपनी मर्क़ज़ी कमेटी (केंद्रीय समिति) का मेंबर चुन लिया है. यह लो परवाना-ए-इन्तख़ाब!’
‘मगर मुझे इस दरख़्त के नीचे से तो निकालो.’ दबे हुए आदमी ने कराहकर कहा. उसकी सांस बड़ी मुश्क़िल से चल रही थी और उसकी आंखों से मालूम होता था कि वह शदीद तशन्नुज और करब (काफ़ी तकलीफ़) में मुब्तला है.
‘यह हम नहीं कर सकते.’ सेक्रेटरी ने कहा. ‘जो हम कर सकते थे वह हमने कर दिया है. बल्कि हम तो यहां तक कर सकते हैं कि अगर तुम मर जाओ तो तुम्हारी बीवी को वज़ीफा दिला सकते हैं. अगर तुम दरख़्वास्त दो तो हम यह भी कर सकते हैं.’
‘मैं अभी ज़िंदा हूं.’ शायर रुक-रुककर बोला. ‘मुझे ज़िंदा रखो.’
‘मुसीबत यह है,’ सरकारी अकादमी का सेक्रेटरी हाथ मलते हुए बोला, ‘हमारा महक़मा सिर्फ़ कल्चर से मुताल्लुक़ है. इसके लिए हमने ‘फॉरेस्ट डिपार्टमेंट’ को लिख दिया है. ‘अर्जेंट’ लिखा है.’
शाम को माली ने आकर दबे हुए आदमी को बताया कि कल फॉरेस्ट डिपार्टमेंट के आदमी आकर इस दरख़्त को काट देंगे और तुम्हारी जान बच जाएगी.
माली बहुत ख़ुश था कि गो दबे हुए आदमी की सेहत जवाब दे रही थी मगर वह किसी-न-किसी-तरह अपनी ज़िंदगी के लिए लड़े जा रहा है. कल तक… सुबह तक… किसी न किसी तरह इसे ज़िंदा रहना है.
दूसरे दिन जब फॉरेस्ट डिपार्टमेंट के आदमी आरी-कुल्हाड़ी लेकर पहुंचे तो इनको दरख़्त काटने से रोक दिया गया. मालूम यह हुआ कि महकमा-ए-ख़ारज़ा (विदेश विभाग) से हुक़्म आया कि इस दरख़्त को न काटा जाए.
वजह यह थी कि इस दरख़्त को दस साल पहले हुकूमते पिटोनिया के वज़ीरे-आज़म (प्रधानमंत्री) ने सेक्रेटेरियट के लॉन में लगाया था. अब यह दरख़्त अगर काटा गया तो इस अम्र (बात) का शदीद अंदेशा था कि हुकूमते-पिटोनिया से हमारे ताल्लुक़ात हमेशा के लिए बिगड़ जाएंगे.
‘मगर एक आदमी की जान का सवाल है!’ एक क्लर्क ग़ुस्से से चिल्लाया.
‘दूसरी तरफ़ दो हुक़ूमतों के ताल्लुक़ात का सवाल है.’ दूसरे क्लर्क ने पहले क्लर्क को समझाया. ‘और यह भी तो समझो कि हुकूमते-पिटोनिया हमारी हुकूमत को कितनी इमदाद (ग्रांट) देती है. क्या हम इन की दोस्ती की ख़ातिर एक आदमी की ज़िंदगी को भी कुर्बान नहीं कर सकते?’
‘शायर को मर जाना चाहिये.’
‘बिलाशुबा.’ (निसंदेह)
अंडर-सेक्रेटरी ने सुपरिटेंडेंट को बताया. ‘आज सुबह वज़ीरे-आज़म बाहर-मुल्कों के दौरे से वापस आ गए हैं. आज चार बजे महकमा-ए-ख़ारज़ा इस दरख़्त की फाइल उन के सामने पेश करेगा. जो वह फ़ैसला देंगे वही सबको मंज़ूर होगा.’
शाम पांच बजे ख़ुद सुपरिटेंडेंट शायर की फाइल ले कर उसके पास आया. ‘सुनते हो?’ आते ही ख़ुशी से फाइल हिलाते हुए चिल्लाया, ‘वज़ीरे-आज़म ने दरख़्त को काटने का हुक़्म दे दिया है और इस वाकये की सारी बैनुल-अक़्वामी (अंतरराष्ट्रीय) ज़िम्मेदारी अपने सिर पर ले ली है. कल वह दरख़्त काट दिया जाएगा और तुम इस मुसीबत से छुटकारा हासिल कर लोगे.’
‘सुनते हो? आज तुम्हारी फाइल मुकम्मल हो गयी!’ सुपरिटेंडेंट ने शायर के बाजू को हिलाकर कहा. मगर शायर का हाथ सर्द था. आंखों की पुतलियां बेजान थीं और चींटियों की एक लंबी क़तार उसके मुंह में जा रही थी.
उसकी ज़िंदगी की फाइल भी मुकम्मल हो चुकी थी.

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महोगनी का वृक्ष

महोगनी जीनस स्वेतेनिया की उष्णकटिबंधीय दृढ़ लकड़ी प्रजातियों की एक सीधे-दानेदारलाल-भूरे रंग की इमारती लकड़ी हैजो अमेरिका का स्थानीय वृक्ष हैऔर उष्णकटिबंधीय चिनबेरी परिवारमेलियासी का हिस्सा है।

यह पौधा पर्यावरण के लिए सर्वाधिक उपयोगी है। इसकी पत्तियों से बनने वाली खाद खेतों को उपजाऊ बनाने का काम करती है। इसकी लम्बाई 70 से 90 फीट के करीब होती है। इस पेड़ की लकड़ी से पानी के जहाजवाद्य यंत्र के अलावा फर्नीचर बनाने के काम आता है। इसके फल व पत्तियों से कैंसरमधुमेह जैसे रोगों की औषधियां भी बनाई जाती है।

 

 

महुआ

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से

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महुआ की पतली डालीपत्तियाँ और फल

महुआ एक भारतीय उष्णकटिबंधीय वृक्ष है जो उत्तर भारत के मैदानी इलाकों और जंगलों में बड़े पैमाने पर पाया जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम मधुका लोंगफोलिआ है। यह एक तेजी से बढ़ने वाला वृक्ष है जो लगभग 20 मीटर की ऊँचाई तक बढ़ सकता है। इसके पत्ते आमतौर पर वर्ष भर हरे रहते हैं। यह पादपों के सपोटेसी परिवार से सम्बन्ध रखता है। यह शुष्क पर्यावरण के अनुकूल ढल गया हैयह मध्य भारत के उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वन का एक प्रमुख पेड़ है।

गर्म क्षेत्रों में इसकी खेती इसके स्निग्ध (तैलीय) बीजोंफूलों और लकड़ी के लिये की जाती है। कच्चे फलों की सब्जी भी बनती है। पके हुए फलों का गूदा खाने में मीठा होता है। प्रति वृक्ष उसकी आयु के अनुसार सालाना 20 से 200 किलो के बीच बीजों का उत्पादन कर सकते हैं। इसके तेल का प्रयोग (जो सामान्य तापमान पर जम जाता है) त्वचा की देखभालसाबुन या डिटर्जेंट का निर्माण करने के लिए और वनस्पति मक्खन के रूप में किया जाता है। ईंधन तेल के रूप में भी इसका प्रयोग किया जाता है। तेल निकलने के बाद बचे इसके खल का प्रयोग जानवरों के खाने और उर्वरक के रूप में किया जाता है। इसके सूखे फूलों का प्रयोग मेवे के रूप में किया जा सकता है। इसके फूलों का उपयोग भारत के उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में शराब के उत्पादन के लिए भी किया जाता है। कई भागों में पेड़ को उसके औषधीय गुणों के लिए उपयोग किया जाता हैइसकी छाल को औषधीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग किया जाता है। कई आदिवासी समुदायों में इसकी उपयोगिता की वजह से इसे पवित्र माना जाता है।

  इसकी भारत में बहुत सारी प्रजातियां पाई जाती है वहीं दक्षिणी भारत में इसकी लगभग 12 प्रजातियां पाई जाती है जिसके नाम। ऋषिकेश। अश्विनकेश,जटायुपुष्प प्रमुख हैं ये महुआ के मुकाबले बहुत ही कम उम्र में4-5 वर्ष में  ही फल-फूल देने लगते हैं इसका उपयोग सवगंघ बनाने के लिए लाया जाता है तथा इसके पेड महुआ के मुकाबले कम उचाई के होते हैं।

वृक्ष

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Bassia latifolia(Latin),Mahua Tree

महुआ भारतवर्ष के सभी भागों में होता है और पहाड़ों पर तीन हजार फुट की ऊँचाई तक पाया जाता है। इसकी पत्तियाँ पाँच सात अंगुल चौड़ीदस बारह अंगुल लंबी और दोनों ओर नुकीली होती हैं। पत्तियों का ऊपरी भाग हलके रंग का और पीठ भूरे रंग की होती है। हिमालय की तराई तथा पंजाब के अतिरिक्त सारे उत्तरीय भारत तथा दक्षिण में इसके जंगल पाए जाते हैं जिनमें वह स्वच्छंद रूप से उगता है। पर पंजाब में यह सिवाय बागों केजहाँ लोग इसे लगाते हैं और कहीं नहीं पाया जाता। इसका पेड़ ऊँचा और छतनार होता है और डालियाँ चारों और फैलती है। यह पेड़ तीस-चालीस हाथ ऊँचा होता है और सब प्रकार की भूमि पर होता है। इसके फूलफलबीज लकड़ी सभी चीजें काम में आती है। इसका पेड़ वीस पचीस वर्ष में फूलने और फलने लगता और सैकडों वर्ष तक फूलता फलता है।

फूल

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महुआ

इसकी पत्तियाँ फूलने के पहले फागुन चैत में झड़ जाती हैं। पत्तियों के झड़ने पर इसकी डालियों के सिरों पर कलियों के गुच्छे निकलने लगते हैं जो कूर्ची के आकार के होते है। इसे महुए का कुचियाना कहते हैं। कलियाँ बढ़ती जाती है और उनके खिलने पर कोश के आकार का सफेद फूल निकलता है जो गुदारा और दोनों ओर खुला हुआ होता है और जिसके भीतर जीरे होते हैं। यही फूल खाने के काम में आता है और 'महुआकहलाता है। महुए का फूल बीस वाइस दिन तक लगातार टपकता है। महुए के फूल में चीनी का प्रायः आधा अंश होता हैइसी से पशुपक्षी और मनुष्य सब इसे चाव से खाते हैं। इसके रस में विशेषता यह होती है कि उसमें रोटियाँ पूरी की भाँति पकाई जा सकती हैं। इसका प्रयोग हरे और सूखे दोनों रूपों में होता है। हरे महुए के फूल को कुचलकर रस निकालकर पूरियाँ पकाई जाती हैं और पीसकर उसे आटे में मिलाकर रोटियाँ बनाते हैं। जिन्हें 'महुअरीकहते हैं। सूखे महुए को भूनकर उसमें पियारपोस्ते के दाने आदि मिलाकर कूटते हैं। इस रूप में इसे लाटा कहते हैं। इसे भिगोकर और पीसकर आटे में मिलाकर 'महुअरीबनाई जाती है। हरे और सूखे महुए लोग भूनकर भी खाते हैं। गरीबों के लिये यह बड़ा ही उपयोगी होता है। यह गौंओभैसों को भी खिलाया जाता है जिससे वे मोटी होती हैं और उनका दूध बढ़ता है। इससे शराब भी खींची जाती है। महुए की शराब को संस्कृत में 'माध्वीऔर आजकल के गँवरा 'ठर्राकहते हैं। महुए का फूल बहुत दिनों तक रहता है और बिगड़ता नहीं।

फल

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Elloopa Fruits,Latin-Bassia Latifolia

इसका फल परवल के आकार का होता है और 'कलेंदीकहलाता है। इसे छील उबालकर और बीज निकालकर तरकारी (सब्जी ) भी बनाई जाती है।

बीज

फल के बीच में एक बीज होता है जिससे तेल निकलता है। वैद्यक में महुए के फूल को मधुरशीतलधातु- वर्धक तथा दाहपित्त और बात का नाशकहृदय को हितकर औऱ भारी लिखा है। इसके फल को शीतलशुक्रजनकधातु और बलबंधकवातपित्ततृपादाहश्वासक्षयी आदि को दूर करनेवाला माना है। छाल रक्तपितनाशक और व्रणशोधक मानी जाती है। इसके तेल को कफपित्त और दाहनाशक और सार को भूत-बाधा-निवारक लिखा है।

सेमल (वैज्ञानिक नाम:बॉम्बैक्स सेइबा)इस जीन्स के अन्य पादपों की तरह सामान्यतः 'कॉटन ट्रीकहा जाता है। इस उष्णकटिबंधीय वृक्ष का तना सीधाउर्ध्वाधर होता है। इसकी पत्तियां डेशिडुअस होतीं हैं। इसके लाल पुष्प की पाँच पंखुड़ियाँ होतीं हैं। ये वसंत ऋतु के पहले ही आ जातीं हैं।

इसका फल एक कैप्सूल जैसा होता है। ये फल पकने पर श्वेत रंग के रेशेकुछ कुछ कपास की तरह के निकलते हैं। इसके तने पर एक इंच तक के मजबूत कांटे भरे होते हैं। इसकी लकड़ी इमारती काम के उपयुक्त नहीं होती है।

 

सेमल को संस्कृत में 'शिम्बलऔर 'शाल्मलिकहते हैं। यह पत्ते झाड़नेवाला एक बहुत बड़ा पेड़ होता हैजिसमें बड़े आकार और मोटे दलों के लाल फूल लगते है और जिसके फलों या डोडों में केवल रूई होती हैगूदा नहीं होता। इस पेड़ के धड़ और डालों में दूर दूर पर काँटे होते हैंपत्ते लंबे और नुकीले होते हैं तथा एक एक डाँड़ी में पंजे की तरह पाँच-पाँचछह-छह लगे होते हैं। फूल मोटे दल केबड़े-बड़े और गहरे लाल रंग के होते हैं। फूलों में पाँच दल होते हैं और उनका घेरा बहुत बड़ा होता है। फाल्गुन में जब इस पेड़ की पत्तियाँ बिल्कुल झड़ जाती हैं और यह ठूँठा ही रह जाता है तब यह इन्हीं लाल फूलों से गुछा हुआ दिखाई पड़ता है। दलों के झड़ जाने पर डोडा या फल रह जाता है जिसमें बहुत मुलायम और चमकीली रूई या घूए के भीतर बिनौले से बीज बंद रहते हैं।

सेमल के डोड या फलों की निस्सारता भारतीय कवि परंपरा में बहुत काल से प्रसिद्ध है और यह अनेक अन्योक्तियों का विषय रहा है। 'सेमर सेइ सुवा पछ्तानेयह एक कहावत सी हो गई है। सेमल की रूई रेशम सी मुलायम और चमकीली होती है और गद्दों तथा तकियों में भरने के काम में आती हैक्योंकि काती नहीं जा सकती। इसकी लकड़ी पानी में खूब ठहरती है और नाव बनाने के काम में आती है। आयुर्वेद में सेमल बहुत उपकारी ओषधि मानी गई है। यह मधुरकसैलाशीतलहलकास्निग्धपिच्छिल तथा शुक्र और कफ को बढ़ाने वाला कहा गया है। सेमल की छाल कसैली और कफनाशकफूल शीतलकड़वाभारीकसैलावातकारकमलरोधकरूखा तथा कफपित्त और रक्तविकार को शांत करने वाला कहा गया है। फल के गुण फूल ही के समान हैं।

सेमल के नए पौधे की जड़ को सेमल का मूसला कहते हैंजो बहुत पुष्टिकारककामोद्दीपक और नपुंसकता को दूर करनेवाला माना जाता है। सेमल का गोंद मोचरस कहलाता है। यह अतिसार को दूर करनेवाला और बलकारक कहा गया है। इसके बीज स्निग्धताकारक और मदकारी होते हैऔर काँटों में फोड़ेफुंसीघावछीप आदि दूर करने का गुण होता है।

फूलों के रंग के भेद से सेमल तीन प्रकार का माना गया हैएक तो साधारण लाल फूलोंवालादूसरा सफेद फूलों का और तीसरा पीले फूलों का। इनमें से पीले फूलों का सेमल कहीं देखने में नहीं आता। सेमल भारतवर्ष के गरम जंगलों में तथा बरमाश्री लंका और मलाया में अधिकता से होता है।

अन्य भाषाओं में[संपादित करें]

सेमर के अन्य भाषाओं में नाम :

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सेमर की रूई

चित्र दीर्घा

  • https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/a/a5/Bombax_ceiba_%28Semal%29_trunk_Jayanti%2C_Duars%2C_West_Bengal_W_Picture_064.jpg/99px-Bombax_ceiba_%28Semal%29_trunk_Jayanti%2C_Duars%2C_West_Bengal_W_Picture_064.jpg

trunk at Jayanti in Buxa Tiger Reserve in जलपाईगुड़ी जिला मेंपश्चिम बंगालभारत.

 

 

  • https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/f/f3/Semal_%28Bombax_ceiba%29-_Young_tree_in_Kolkata_W_IMG_9737.jpg/120px-Semal_%28Bombax_ceiba%29-_Young_tree_in_Kolkata_W_IMG_9737.jpg

Young tree in कोलकातापश्चिम बंगालभारत.

 

  • https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/3/39/Semal_%28Bombax_ceiba%29_trunk_of_an_old_tree_in_Kolkata_W_IMG_4122.jpg/65px-Semal_%28Bombax_ceiba%29_trunk_of_an_old_tree_in_Kolkata_W_IMG_4122.jpg

trunk of an old tree in कोलकातापश्चिम बंगालभारत.

 

  • https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/5/5a/Semal_%28Bombax_ceiba%29_leaves_in_Kolkata_W_IMG_9724.jpg/120px-Semal_%28Bombax_ceiba%29_leaves_in_Kolkata_W_IMG_9724.jpg

leaves in कोलकातापश्चिम बंगालभारत.

 

  • https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/2/2a/Semal_%28Bombax_ceiba%29_leaves_%28back_side%29_in_Kolkata_W_IMG_4135.jpg/119px-Semal_%28Bombax_ceiba%29_leaves_%28back_side%29_in_Kolkata_W_IMG_4135.jpg

leaves (back side) in कोलकातापश्चिम बंगालभारत.

 

  • https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/b/b9/Semal_%28Bombax_ceiba%29_leaf_in_Kolkata_W_IMG_9726.jpg/120px-Semal_%28Bombax_ceiba%29_leaf_in_Kolkata_W_IMG_9726.jpg

leaf in कोलकातापश्चिम बंगालभारत.

 

  • https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/5/5e/Semal_%28Bombax_ceiba%29-_House_Crows_at_canopy_in_Kolkata_W_IMG_4325.jpg/120px-Semal_%28Bombax_ceiba%29-_House_Crows_at_canopy_in_Kolkata_W_IMG_4325.jpg

House Crows at canopy in कोलकातापश्चिम बंगालभारत.

 

  • https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/c/cb/Semal_%28Bombax_ceiba%29_flowers_in_Kolkata_W_IMG_4132.jpg/120px-Semal_%28Bombax_ceiba%29_flowers_in_Kolkata_W_IMG_4132.jpg

flowers in कोलकातापश्चिम बंगालभारत.

 

  • https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/8/8c/Semal_%28Bombax_ceiba%29_flowers_in_Kolkata_W_IMG_4116.jpg/120px-Semal_%28Bombax_ceiba%29_flowers_in_Kolkata_W_IMG_4116.jpg

flowers in कोलकातापश्चिम बंगालभारत.

 

  • https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/c/cf/Semal_%28Bombax_ceiba%29_flowering_tree_in_Kolkata_W_IMG_4143.jpg/80px-Semal_%28Bombax_ceiba%29_flowering_tree_in_Kolkata_W_IMG_4143.jpg

flowering tree in कोलकातापश्चिम बंगालभारत.

 

  • https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/c/c8/Semal_%28Bombax_ceiba%29_flowering_canopy_in_Kolkata_W_IMG_4107.jpg/120px-Semal_%28Bombax_ceiba%29_flowering_canopy_in_Kolkata_W_IMG_4107.jpg

flowering canopy in कोलकातापश्चिम बंगालभारत.

 

  • https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/1/1f/Semal_%28Bombax_ceiba%29_flower_buds_at_Narendrapur_W_IMG_4143.jpg/120px-Semal_%28Bombax_ceiba%29_flower_buds_at_Narendrapur_W_IMG_4143.jpg

flower buds at Narendrapur near कोलकातापश्चिम बंगालभारत.

 

  • https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/1/1a/Semal_%28Bombax_ceiba%29_flower_bud_in_Kolkata_W_IMG_4134.jpg/93px-Semal_%28Bombax_ceiba%29_flower_bud_in_Kolkata_W_IMG_4134.jpg

flower bud in कोलकातापश्चिम बंगालभारत.

 

  • https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/8/8a/Semal_%28Bombax_ceiba%29-_a_view_from_below_in_Kolkata_W_IMG_4126.jpg/120px-Semal_%28Bombax_ceiba%29-_a_view_from_below_in_Kolkata_W_IMG_4126.jpg

a view from below in कोलकातापश्चिम बंगालभारत.

 

  • https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/f/fe/Semal_%28Bombax_ceiba%29-_fallen_flower_at_ground_in_Kolkata_W_IMG_4121.jpg/120px-Semal_%28Bombax_ceiba%29-_fallen_flower_at_ground_in_Kolkata_W_IMG_4121.jpg

Ficus religiosa Bo.jpghttps://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/7/79/Ficus_religiosa.JPG/212px-Ficus_religiosa.JPG

पीपल की कोपलें

पीपल (अंग्रेज़ी: सैकरेड फिगसंस्कृत:अश्वत्थ) भारतनेपालश्री लंकाचीन और इंडोनेशिया में पाया जाने वाला बरगदया गूलर की जाति का एक विशालकाय वृक्ष है जिसे भारतीय संस्कृति में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है तथा अनेक पर्वों पर इसकी पूजा की जाती है। बरगद और गूलर वृक्ष की भाँति इसके पुष्प भी गुप्त रहते हैं अतः इसे 'गुह्यपुष्पकभी कहा जाता है। अन्य क्षीरी (दूध वाले) वृक्षों की तरह पीपल भी दीर्घायु होता है।[1] इसके फल बरगद-गूलर की भांति बीजों से भरे तथा आकार में मूँगफली के छोटे दानों जैसे होते हैं। बीज राई के दाने के आधे आकार में होते हैं। परन्तु इनसे उत्पन्न वृक्ष विशालतम रूप धारण करके सैकड़ों वर्षो तक खड़ा रहता है। पीपल की छाया बरगद से कम होती हैफिर भी इसके पत्ते अधिक सुन्दरकोमल और चंचल होते हैं। वसंत ऋतु में इस पर धानी रंग की नयी कोंपलें आने लगती है। बाद मेंवह हरी और फिर गहरी हरी हो जाती हैं। पीपल के पत्ते जानवरों को चारे के रूप में खिलाये जाते हैंविशेष रूप से हाथियों के लिए इन्हें उत्तम चारा माना जाता है। पीपल की लकड़ी ईंधन के काम आती है किंतु यह किसी इमारती काम या फर्नीचर के लिए अनुकूल नहीं होती। स्वास्थ्य के लिए पीपल को अति उपयोगी माना गया है। पीलियारतौंधीमलेरियाखाँसी और दमा तथा सर्दी और सिर दर्द में पीपल की टहनीलकड़ीपत्तियोंकोपलों और सीकों का प्रयोग का उल्लेख मिलता है।[2]

अनुक्रम

देव वृक्ष

 

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पीपल का पत्ता

भारतीय संस्कृति में पीपल देववृक्ष हैइसके सात्विक प्रभाव के स्पर्श से अन्त: चेतना पुलकित और प्रफुल्लित होती है। स्कन्द पुराण में वर्णित है कि अश्वत्थ (पीपल) के मूल में विष्णुतने में केशवशाखाओं में नारायणपत्तों में श्रीहरि और फलों में सभी देवताओं के साथ अच्युत सदैव निवास करते हैं।[क] पीपल भगवान विष्णु का जीवन्त और पूर्णत:मूर्तिमान स्वरूप है। भगवान कृष्ण कहते हैं- समस्त वृक्षों में मैं पीपल का वृक्ष हूँ।[ख] स्वयं भगवान ने उससे अपनी उपमा देकर पीपल के देवत्व और दिव्यत्व को व्यक्त किया है। शास्त्रों में वर्णित है कि पीपल की सविधि पूजा-अर्चना करने से सम्पूर्ण देवता स्वयं ही पूजित हो जाते हैं।[ग] पीपल का वृक्ष लगाने वाले की वंश परम्परा कभी विनष्ट नहीं होती। पीपल की सेवा करने वाले सद्गति प्राप्त करते हैं। पीपल वृक्ष की प्रार्थना के लिए अश्वत्थस्तोत्र में पीपल की प्रार्थना का मंत्र भी दिया गया है। [घ] प्रसिद्ध ग्रन्थ व्रतराज में अश्वत्थोपासना में पीपल वृक्ष की महिमा का उल्लेख है। अश्वत्थोपनयनव्रत में महर्षि शौनक द्वारा इसके महत्त्व का वर्णन किया गया है। अथर्ववेदके उपवेद आयुर्वेद में पीपल के औषधीय गुणों का अनेक असाध्य रोगों में उपयोग वर्णित है। पीपल के वृक्ष के नीचे मंत्रजप और ध्यान तथा सभी प्रकार के संस्कारों को शुभ माना गया है। श्रीमद्भागवत् में वर्णित है कि द्वापर युग में परमधाम जाने से पूर्व योगेश्वर श्रीकृष्ण इस दिव्य पीपल वृक्ष के नीचे बैठकर ध्यान में लीन हुए। यज्ञ में प्रयुक्त किए जाने वाले 'उपभृत पात्र' (दूर्वीस्त्रुआ आदि) पीपल-काष्ट से ही बनाए जाते हैं। पवित्रता की दृष्टि से यज्ञ में उपयोग की जाने वाली समिधाएं भी आम या पीपल की ही होती हैं। यज्ञ में अग्नि स्थापना के लिए ऋषिगण पीपल के काष्ठ और शमी की लकड़ी की रगड़ से अग्नि प्रज्वलित किया करते थे।[3] ग्रामीण संस्कृति में आज भी लोग पीपल की नयी कोपलों में निहित जीवनदायी गुणों का सेवन कर उम्र के अंतिम पडाव में भी सेहतमंद बने रहते हैं।[4]

पूजन एवं व्रत

जब अमावस्या (हिंदू कैलेंडर महीने के पन्द्रहवें दिन) हिन्दू कैलेंडर वर्ष में सोमवार को पड़ती है। इस दिन पवित्र पीपल के पेड़ की १०८ बार परिक्रमा कर महिलाएं व्रत रख कर पूजन करती हैं।

 

बरगद

बरगद

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बरगद का चित्र

वैज्ञानिक वर्गीकरण

  
  
  
  
  
  
  

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बरगद बहुवर्षीय विशाल वृक्ष है। इसे 'वटऔर 'बड़भी कहते हैं। यह एक स्थलीय द्विबीजपत्री एंव सपुष्पक वृक्ष है। इसका तना सीधा एंव कठोर होता है। इसकी शाखाओं से जड़े निकलकर हवा में लटकती हैं तथा बढ़ते हुए धरती के भीतर घुस जाती हैं एंव स्तंभ बन जाती हैं। इन जड़ों को बरोह या प्राप जड़ कहते हैं। इसका फल छोटा गोलाकार एंव लाल रंग का होता है। इसके अन्दर बीज पाया जाता है। इसका बीज बहुत छोटा होता है किन्तु इसका पेड़ बहुत विशाल होता है। इसकी पत्ती चौड़ीएंव लगभग अण्डाकार होती है। इसकी पत्तीशाखाओं एंव कलिकाओं को तोड़ने से दूध जैसा रस निकलता है जिसे लेटेक्स अम्ल कहा जाता है।

धार्मिक महत्व

हिंदू धर्म में वट वृक्ष की बहुत महत्ता है। ब्रह्माविष्णुमहेश की त्रिमूर्ति की तरह ही वट,पीपल व नीम को माना जाता हैअतएव बरगद को शिव समान माना जाता है। अनेक व्रत व त्यौहारों में वटवृक्ष की पूजा की जाती है। यह आस्था के ऊपर निर्भर करता है।

 

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अमलतास के फूल

अमलतास [[English : golden shower,[1] purging cassia, [2]Indian laburnum,[3] pudding-pipe tree[4]] पीले फूलो वाला एक शोभाकर वृक्ष है।

अमलतास को संस्कृत में व्याधिघातनृप्रद्रुम इत्यादिगुजराती में गरमाष्ठोबँगला में सोनालू तथा लैटिन में कैसिया फ़िस्चुला कहते हैं। शब्दसागर के अनुसार हिंदी शब्द अमलतास संस्कृत अम्ल (खट्टा) से निकला है।

भारत में इसके वृक्ष प्राय: सब प्रदेशों में मिलते हैं। तने की परिधि तीन से पाँच कदम तक होती हैकिंतु वृक्ष बहुत उँचे नहीं होते। शीतकाल में इसमें लगनेवालीहाथ सवा हाथ लंबीबेलनाकार काले रंग की फलियाँ पकती हैं। इन फलियों के अंदर कई कक्ष होते हैं जिनमें कालालसदारपदार्थ भरा रहता है। वृक्ष की शाखाओं को छीलने से उनमें से भी लाल रस निकलता है जो जमकर गोंद के समान हो जाता है। फलियों से मधुरगंधयुक्तपीले कलझवें रंग का उड़नशील तेल मिलता है।

 

आयुर्वेद में इस वृक्ष के सब भाग औषधि के काम में आते हैं। कहा गया हैइसके पत्ते मल को ढीला और कफ को दूर करते हैं। फूल कफ और पित्त को नष्ट करते हैं। फली और उसमें का गूदा पित्तनिवारककफनाशकविरेचक तथा वातनाशक हैं फली के गूदे का आमाशय के ऊपर मृदु प्रभाव ही होता हैइसलिए दुर्बल मनुष्यों तथा गर्भवती स्त्रियों को भी विरेचक औषधि के रूप में यह दिया जा सकता है।

अफारा ,मुंह में पानी आना आदि लक्षणों में भी इसका उपयोग किया जाता है

बबूल या कीकर (वानस्पतिक नाम : आकास्या नीलोतिका) अकैसिया प्रजाति का एक वृक्ष है। यह अफ्रीका महाद्वीप एवं भारतीय उपमहाद्वीप का मूल वृक्ष है।

बबुल का पेड़ जिसे स्थानीय भाषा में देशी कीकर कहा जाता है। पुरानी मान्यताओं के अनुसार इस पेड़ में भगवान विष्णु का निवास माना जाता है।प्राचीन समय में इस पेड की पुजा की जाती थी । इस पेड़ को काटना महापाप माना जाता है। जिस जगह यह पेड होता है वह जगह अत्यंत शुभ मानी जाती है। ऐसा माना जाता है कि जिस घर में यह पेड़ पाया जाता है कि वह घर हमेशा धन धान्य से परिपूर्ण रहता है। यह पेड़ एक मात्र पश्चिमी राजस्थान में पाया जाता है इस पेड़ की गिनती दुर्लभ क्षेणी में होती है ।बबूल का गोद औषधीय गुणों से भरपूर होता है तथा अनेक रोगों के उपचार में काम आता है बबूल की हरी पतली टहनियां दातून के काम आती हैं। बबूल का गोद उतम कोटि का होता है जो औषधीय गुणों से भरपूर होता है तथा सेकडो रोगों के उपचार में काम आता है ।बबूल की दातुन दांतों को स्वच्छ और स्वस्थ रखती है। बबूल की लकड़ी का कोयला भी अच्छा होता है। हमारे यहां दो तरह के बबूल अधिकतर पाए और उगाये जाते हैं। एक देशी बबूल जो देर से होता है और दूसरा मासकीट नामक बबूल. बबूल लगा कर पानी के कटाव को रोका जा सकता है। जब रेगिस्तान अच्छी भूमि की ओर फैलने लगता हैतब बबूल के जगंल लगा कर रेगिस्तान के इस आक्रमण को रोका जा सकता है। [2]

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होडलफरीदाबाद में बबूल वृक्ष

 

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बबूल का तना

 

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बबूल की फली

  • https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/a/a8/Vachellia_nilotica%2C_Village_Behlolpur%2C_Punjab%2C_India.JPG/120px-Vachellia_nilotica%2C_Village_Behlolpur%2C_Punjab%2C_India.JPG

Vachellia nilotica, Village Behlolpur, Punjab, India

 

  • https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/f/fc/Vachellia_nilotica%2C_at_village_Chaparr_Chirri%2C_Mohali%2C_Punjab%2C_India.JPG/59px-Vachellia_nilotica%2C_at_village_Chaparr_Chirri%2C_Mohali%2C_Punjab%2C_India.JPG

Vachellia nilotica, at village Chaparr Chirri, Mohali, Punjab, India

 

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अशोक वृक्ष (अंग्रेज़ीSaraca asoca) को हिन्दू धर्म में काफ़ी पवित्र, लाभकारी और विभिन्न मनोरथों को पूर्ण करने वाला माना गया है। अशोक का शब्दिक अर्थ होता है- "किसी भी प्रकार का शोक न होना"। यह पवित्र वृक्ष जिस स्थान पर होता है, वहाँ पर किसी प्रकार का शोक व अशान्ति नहीं रहती। मांगलिक एवं धार्मिक कार्यों में अशोक के पत्तों का प्रयोग किया जाता है। इस वृक्ष पर प्राकृतिक शक्तियों का विशेष प्रभाव माना गया है, जिस कारण यह वृक्ष जिस जगह पर भी उगता है, वहाँ पर सभी कार्य पूर्णतः निर्बाध रूप से सम्पन्न होते चले जाते हैं। इसी कारण अशोक का वृक्ष भारतीय समाज में काफ़ी प्रासंगिक है। भगवान श्रीराम ने भी स्वयं ही इसे शोक दूर करने वाले पेड़ की उपमा दी थी। कामदेव के पंच पुष्प बाणों में एक अशोक भी है। ऐसा कहा जाता है कि जिस पेड़ के नीचे बैठने से शोक नहीं होता, उसे 'अशोक' कहते हैं, अर्थात् जो स्त्रियों के सारे शोकों को दूर करने की शक्ति रखता है, वही अशोक है।

वानस्पतिक परिचय

अशोक का वृक्ष हरित वृक्ष आम के समान 25 से 30 फुट तक ऊँचा, बहुत-सी शाखाओं से युक्त घना व छायादार हाता है। देखने में यह मौलश्री के पेड़ जैसा लगता है, परन्तु ऊँचाई में उससे छोटा ही होता है। इसका तना कुछ लालिमा लिए हुए भूरे रंग का होता है। यह वृक्ष सारे भारत में पाया जाता है। इसके पल्लव 9 इंच लंबे, गोल व नोंकदार होते हैं। ये साधारण डण्ठल के व दोनों ओर 5-6 जोड़ों में लगते हैं। कोमल अवस्था में इनका वर्ण श्वेताभ लाल फिर गहरा हरा हो जाता है। पत्ते सूखने पर लाल हो जाते हैं। फल वसंत ऋतु में आते हैं। पहले कुछ नारंगी, फिर क्रमशः लाल हो जाते हैं। ये वर्षा काल तक ही रहते हैं।

अशोक वृक्ष की फलियाँ आठ से दस इंच लंबी चपटी, एक से दो इंच चौड़ी दोनों सिरों पर कुछ टेढ़ी होती है। ये ज्येष्ठ माह में लगती हैं। प्रत्येक में चार से दस की संख्या में बीज होते हैं। फलियाँ पहले जामुनी व पकने पर काले वर्ण की हो जाती हैं। बीज के ऊपर की पपड़ी रक्ताभ वर्ण की, चमड़े के सदृश मोटी होती है। औषधीय प्रयोजन में छाल, पुष्प व बीज प्रयुक्त होते हैं। असली अशोक व सीता अशोक, पेण्डुलर ड्रपिंग अशोक जैसी मात्र बगीचों में शोभा देने वाली जातियों में औषधि की दृष्टि से भारी अंतर होता है। छाल इस दृष्टि से सही प्रयुक्त हो, यह अनिवार्य है। असली अशोक की छाल बाहर से शुभ्र धूसर, स्पर्श करने से खुरदरी अंदर से रक्त वर्ण की होती है। स्वाद में कड़वी होती है। मिलावट के बतौर कहीं-कहीं आम के पत्तों वाले अशोक का भी प्रयोग होता है, पर यह वास्तविक अशोक नहीं है।[1]

प्रकार

अशोक का वृक्ष दो प्रकार का होता है- एक तो असली अशोक वृक्ष और दूसरा उससे मिलता-जुलता नकली अशोक वृक्ष।

असली अशोक वृक्ष

असली अशोक के वृक्ष को लैटिन भाषा में 'जोनेसिया अशोका' कहते हैं। यह आम के पेड़ जैसा छायादार वृक्ष होता है। इसके पत्ते 8-9 इंच लम्बे और दो-ढाई इंच चौड़े होते हैं। इसके पत्ते शुरू में तांबे जैसे रंग के होते हैं, इसीलिए इसे 'ताम्रपल्लव' भी कहते हैं। इसके नारंगी रंग के फूल वसंत ऋतु में आते हैं, जो बाद में लाल रंग के हो जाते हैं। सुनहरी लाल रंग के फूलों वाला होने से इसे 'हेमपुष्पा' भी कहा जाता है।

नकली अशोक वृक्ष

नकली अशोक वृक्ष के पत्ते आम के पत्तों जैसे होते हैं। इसके फूल सफ़ेदपीले रंग के और फल लाल रंग के होते हैं। यह देवदार जाति का वृक्ष होता है। यह दवाई के काम का नहीं होता।[2]

विभिन्न नाम

अशोक वृक्ष का फूल

अशोक वृक्ष के विभिन्न भाषाओं में नाम भिन्न हैं जो निम्नवत हैं-

औषधीय व धार्मिक गुण

अशोक का वृक्ष अपने विशेष गुणों के लिए भी जाना जाता है। इसके कुछ गुण निम्नलिखित हैं-

  1. अशोक का वृक्ष शीतल, कड़वा, ग्राही, वर्ण को उत्तम करने वाला, कसैला और वात-पित्त आदि दोष, अपच, तृषा, दाह, कृमि, शोथ, विष तथा रक्त विकार नष्ट करने वाला है। यह रसायन और उत्तेजक है।
  2. इस वृक्ष का क्वाथ गर्भाशय के रोगों का नाश करता है, विशेषकर रजोविकार को नष्ट करता है। इसकी छाल रक्त प्रदर रोग को नष्ट करने में उपयोगी होती है।
  3. माना जाता है कि अशोक वृक्ष घर में लगाने से या इसकी जड़ को शुभ मुहूर्त में धारण करने से मनुष्य को सभी शोकों से मुक्ति मिल जाती है।
  4. अशोक के फल एवं छाल को उबालकर पीने से स्त्रियों को कई रोगों से मुक्ति मिल जाती है। साथ ही यह सौंदर्य में भी वृद्धि करता है।
  5. इसकी छाल को उबालकर पीने से कई तरह के चर्म रोगों से मुक्ति मिलती है।
  6. यदि व्यक्ति किसी महत्त्वपूर्ण कार्य से जा रहा है तो अशोक वृक्ष का एक पत्ता अपने सिर पर धारण करके जाए, इससे कार्य में अवश्य सफलता मिलेगी।

अशोक वृक्ष

  1. अशोक के वृक्ष की जड़ शुभ मुहूर्त में लाकर विधिपूर्वक पूजन कर धारण करें या पूजा स्थल में रखें, तो धन की कमी नहीं होती।
  2. इस वृक्ष को लगाने और उसको सींचने से धन में वृद्धि होती है।
  3. यदि अशोक वृक्ष की जड़ को तांबे के ताबीज में भरकर विधिपूर्वक धारण किया जाए, तो हर असंभव कार्य पूर्ण होने की संभावना बढ़ जाएगी।
  4. इस वृक्ष को प्रतिदिन जल देने से मनुष्य की सारी मनोकामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं।
  5. इस वृक्ष के बीज, पत्ते एवं छाल को पीसकर लेप लगाने से सौंदर्य वृद्धि होती है।
  6. इसके बीज या फूल को शहद के साथ मिलाकर खाया जाए, तो कई व्याधियाँ दूर होती हैं।

रासायनिक गुण

अशोक वृक्ष की छाल में हीमैटाक्सिलिन, टेनिन, केटोस्टेरॉल, ग्लाइकोसाइड, सैपोनिन, कार्बनिक कैल्शियम तथा लौह के यौगिक पाए गए हैं, पर अल्कलॉइड और एसेन्शियल ऑइल की मात्रा बिलकुल नहीं पाई गई। टेनिन एसिड के कारण इसकी छाल सख्त ग्राही होती है, बहुत तेज और संकोचक प्रभाव करने वाली होती है, अतः रक्त प्रदर में होने वाले अत्यधिक रजस्राव पर बहुत अच्छा नियन्त्रण होता है।[2]

वास्तुशास्त्र में उपयोग

  • अशोक का वृक्ष घर में उत्तर दिशा में लगाना चाहिए, जिससे गृह में सकारात्मक ऊर्जा का संचारण बना रहता है। घर में अशोक के वृक्ष होने से सुख, शान्ति एवं समृद्धि बनी रहती है एवं अकाल मृत्यु नहीं होती।
  • परिवार की महिलाओं को शारीरिक व मानसिक ऊर्जा में वृद्धि होती है। यदि महिलायें अशोक के वृक्ष पर प्रतिदिन जल अर्पित करती रहें तो उनकी इच्छाएँ एवं वैवाहिक जीवन में सुखद वातावरण बना रहता है।

छात्रों की स्मरण शक्ति के लिए अशोक की छाल तथा ब्रहमी समान मात्रा में सुखाकर उसका चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को 1-1 चम्मच सुबह शाम एक गिलास हल्के गर्म दूध के साथ सेवन करने से शीघ्र ही लाभ मिलेगा।

गूलर के फल के अन्दर का दृष्य गूलर (Ficus racemosa) फिकस कुल (Ficus) का एक विशाल वृक्ष है। इसे संस्कृत में उडुम्बर, बांग्ला में डुमुर, मराठी में उदुम्बर, गुजराती में उम्बरा, अरबी में जमीझ, फारसी में अंजीरे आदमसकी शाखाओं में से फल उत्पन्न होते हैं। फल गोल-गोल अंजीर की तरह होते हैं और इसमें से सफेद-सफेद दूध निकलता है। इसके पत्ते लभेड़े के पत्तों जैसे होते हैं। नदी के उदुम्बर के पत्ते और फूल गूलर के पत्तों-फल से छोटे होते हैं। गूलर, २ प्रकार का होता है- नदी उदुम्बर और कठूमर। कठूमर के पत्ते गूलर के पत्तों से बडे होते हैं। इसके पत्तों को छूने से हाथों में खुजली होने लगती है और पत्तों में से दूध निकलता है। • गूलर की छाल - अत्यंत शीतल, दुग्धवर्धक, कसैली, गर्भहितकारी और वर्णविनाशक है। • कोमल फल- स्तम्भक, कसैले, हितकारी, तथा तृषा पित्त-कफ और रूधिरदोष नाशक है। • मध्यम कोमल फल - स्वादु, शीतल, कसैले, पित्त, तृषा, मोहकारक एवं वमन तथा प्रदर रोग विनाशक है। • तरूण फल - कसैले, रूचिकारी, अम्ल, दीपन, माँसवर्धक, रूधिरदोषकारी और दोषजनक है। • पका फल - कसैला, मधुर, कृमिकारक, जड, रूचिकारक, अत्यंत शीतल, कफकारक, तथा रक्तदोष, पित्त, दाह, क्षुधा, तृषा, श्रम, प्रमेह शोक और मूर्छा नाशक है। नदी उदुम्बर गूलर गूलर कई तरह गुण वाला तथा रसवीर्य और विपाक में उससे कुछ हीन है। गूलर का एक भेद काकोदुम्बरी अथवा कठूमर है। संस्कृत - काकोदुम्बरी, हिंदी - कठूमर, बं- काकडुमुर, कालाउम्बर तथा बोखाडा, गुजराती- टेडौम्बरो, अरबी - तनवरि, फारसी - अंजीरेदस्ती,

ताड़ एकबीजपत्री वृक्ष है। इसकी 6 प्रजातियाँ होती हैं। यह अफ्रीकाएशिया तथा न्यूगीनी का मूल-निवासी है। इसका तना सीधा, सबल तथा शाखाविहिन होता है। ऊपरी सिरे पर कई लम्बी वृन्त तथा किनारे से कटी फलकवाली पत्तियाँ लगी होती हैं। इसका फल काष्ठीय गुठलीवाला होता है। ताड़ के वृक्ष 30 मीटर तक बढ़ सकते हैं।

ये पेड़ मुख्यता हिमालय की उचाई पर पाई जाती हैं। ये पेड़ सदाबहार वृक्ष होते हैं इनकी उचाई लगभग 45 से 50 मीटर तक होती हैं।

ताड़ की उपयोगिता के कारण इसे भारतीय नोट में स्थापित किया गया है जो इसकी विशिष्टता को दिखाता है

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डाली में लगा हुआ बेर का फल

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पके हुए बेर

बेर (वानस्पतिक नाम : Ziziphus mauritiana) फल का एक प्रकार हैं। कच्चे फल हरे रंग के होते हैं। पकने पर थोड़ा लाल या लाल-हरे रंग के हो जाते हैं।

बेर की एक प्रजाति

बेर एक ऐसा फलदार पेड़़ है जो कि एक बार पूरक सिंचाई से स्थापित होने के पश्चात वर्षा के पानी पर निर्भर रहकर भी फलोत्पादन कर सकता है। यह एक बहुवर्षीय व बहुउपयोगी फलदार पेड़ है जिसमें फलों के अतिरिक्त पेड़ के अन्य भागों का भी आर्थिक महत्व है। शुष्क क्षेत्रों में बार-बार अकाल की स्थिति से निपटने के लिए भी बेर की बागवानी अति उपयोगी सिद्ध हो सकती है। इसकी पत्तियाँ पशुओं के लिए पौष्टिक चारा प्रदान करती है जबकि इसमें प्रतिवर्ष अनिवार्य रूप से की जाने वाली कटाई-छंटाई से प्राप्त कांटेदार झाड़ियां खेतों व ढ़ाणियों की रक्षात्मक बाड़ बनाने व भण्डारित चारे की सुरक्षा के लिए उपयोगी है।

बेर खेती ऊष्ण व उपोष्ण जलवायु में आसानी से की जा सकती है क्योंकि इसमें कम पानी व सूखे से लड़ने की विशेष क्षमता होती है बेर में वानस्पतिक बढ़वार वर्षा ऋतु के दौरान व फूल वर्षा ऋतु के आखिर में आते है तथा फल वर्षा की भूमिगत नमी के कम होने तथा तापमान बढ़ने से पहले ही पक जाते है। गर्मियों में पौधे सुषुप्तावस्था में प्रवेश कर जाते है व उस समय पत्तियाँ अपने आप ही झड़ जाती है तब पानी की आवश्यकता नहीं के बराबर होती है। इस तरह बेर अधिक तापमान तो सहन कर लेता है लेकिन शीत ऋतु में पड़ने वाले पाले के प्रति अति संवेदनशील होता है। अतः ऐसे क्षेत्रों में जहां नियमित रूप से पाला पड़ने की सम्भावना रहती हैइसकी खेती नहीं करनी चाहिए।

जहां तक मिट्टी का सवाल हैबलुई दोमट मिट्टी जिसमें जीवांश की मात्रा अधिक हो इसके लिए सर्वोत्तम मानी जाती हैहालाकि बलुई मिट्टी में भी समुचित मात्रा में देशी खाद का उपयोग करके इसकी खेती की जा सकती है। हल्की क्षारीय व हल्की लवणीय भूमि में भी इसको लगा सकते है। बेर में 300 से भी अधिक किस्में विकसित की जा चुकी है परन्तु सभी किस्में बारानी क्षेत्रों में विशेषकर कम वर्षा वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त नहीं है। ऐसे क्षेत्रों के लिए अगेती व मध्यम अवधि में पकने वाली किस्में ज्यादा उपयुक्त पाई गई है।