जूट उद्योग में सफल महिलायें

 

जूट से संवारी जिदंगी

 

 जिंदगी में छोटी सी छोटी बात भी कब अहम साबित हो सकती है। इसे संगीता से बेहतर कोई नहीं जान सकता। घर की आर्थिक तंगी को दूर करने के लिए साधारण समङो जाने वाले जूट से बनी कलाकृति ने आज संगीता को उस मुकाम पर पहुंचा दिया है। जिसके बारे में उन्होंने कभी सोचा नहीं था। जूट से बने सामानों ने उनको ऐसी पहचान दी कि आज वंचित तबके से ताल्लुक रखने वाली संगीता अपने इलाके की एक मिसाल बन गयी है। आठवीं पास संगीता एक संदेश है वैसी महिलाओं के लिए जिन्होंने खुद को हर कदम पर खुद से ही जद्दोजहद करते हुए पाया है।

बुर्का में मोती लगाने से हुई थी शुरुआत

दरअसल सफलता के इस कहानी की शुरुआत तब हुई थी जब संगीता के पति राजधानी पटना में ऑटो चलाते थे। यह सन् 1997 की बात है। एक ऑटो चलाने वाले पर घर की सारी आर्थिक स्थिति टिकी रहती थी। कुछ पैसे और घर में आ सके इसके लिए संगीता ने बुर्का में मोती लगाने का काम शुरू किया। इसी बीच में संगीता के पति ने देखा कि जूट का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। कुछ उत्सुकता और कुछ आर्थिक रुप से मजबूत होने की चाहत से संगीता के पति ने उनको जूट से सामान बनाने के लिए प्रशिक्षण दिलवाने का निश्चय किया। प्रशिक्षण मिलने के बाद पटना के पटेल नगर में संगीता ने एक दुकान भी लगाया था लेकिन इसी बीच में संगीता के ससुर की मृत्यु हो जाने के बाद सब लोग पटना से वापस अपने गांव जमुई जिला के प्रधानचक गांव चले गये।

गांव में भी जूट से बना रहा लगाव

गांव जाने के बाद भी जूट और इससे बने सामानों के प्रति संगीता का लगाव बना रहा। इसी बीच संगीता के पति की नौकरी सबौर विश्वविद्यालय में चालक  के पद पर लग गयी। पति के सबौर चले जाने के बाद संगीता को घर के दूसरे काम पर भी ध्यान देना पड़ता था। बकौल संगीता ‘घर की जिम्मेवारी उठाने के साथ जूट के सामानों मैं बराबर ध्यान देती रही’। यकीन यही था कि मेरे काम का फल मुङो जरूर मिलेगा। आज वही हो रहा है।

पति ने दिया साथ तो बन गयी बात

जूट और उसके सामानों के प्रति ललक बढ़ाने के काम में संगीता को उसके पति का साथ मिला। सबसे पहले 12 हजार रुपये में मोती, धागा, जूट का कपड़ा, तुलसी लकड़ी की मोती आदि सामानों को संगीता के पति ने कोलकाता से मंगवाया। पति की नौकरी जब सबौर में लग गयी तब सारी जिम्मेवारी संगीता ने अपने ऊपर ले लिया। काफी समय गुजरने के बाद सन् 2011 में बिहार दिवस के मौके पर गांव में ही स्टॉल लगाया जहां संगीता के सामान को पहली बार लोगों ने देखा।

गांव की महिलाओं को देती है प्रशिक्षण

उनकी इस अद्भुत कला को देखने के लिए गांव की महिलाएं भी आने लगी। कुछ ने सीखने की इच्छा भी जताई। पहले एक-दो महिलाओं ने ही इसमें रुचि दिखाई लेकिन बाद में इनकी संख्या बढ़ती गयी। आज संगीता के पास गांव की ही लगभग 20-25 महिलाएं जूट का काम सीखने आती है। उनके कामों की भी सराहना हो रही है।

सबौर से खुला कामयाबी का रास्ता

सन् 2012 में सबौर में तकनीकी सप्ताह कृषि विज्ञान मनाया जा रहा था। संगीता के पति ने उसमें इन कलाकृतियों की स्टॉल लगाने की बात सोची। आयोजिन समिति से बात कर के उन्होंने जूट से बने सामानों का स्टॉल पहली बार लगाया। जिसने भी देखा, खुल मन से सराहा। सबौर विश्वविद्यालय के कुलपति ने देखा तो उन्होंने भी इन सामानों को देख के खुल कर तारिफ की। पंजाब के लुधियाना शहर में जब स्टॉल लगा तो जूट का सामान वहा भी गया। वहां के लोगों ने इसे इतना पसंद किया कि सारा सामान बिक गया।

जूट से बनाती है कई तरह का सामान

वैसे तो संगीता कई तरह के सामान को बना कर लोगों को अपनी तरफ आकृष्ट करती है लेकिन उनके द्वारा बनाये गये पितौनी के बीज की माला, लकड़ी की मोतियों से बना शार्ट कोर, रक्तचंदन के बीज का लॉकेट, दुल्हन के गले में पहने जाने वाला दुल्हन सेट, चाभी रिंग, वुडेन बटन, जूट की गुड़िया की बहुत मांग है। इनका मूल्य 20 रुपये से लेकर एक हजार रुपये तक है। जूट के अलावा बांस की चूड़ी पर भी संगीता अब काम कर रही है। बाजार में इसकी भी मांग होने लगी है। 30 से 50 रुपये के बीच बिकने वाली एक चूड़ी को बांस की फट्टी को काट कर उस पर जूट का कपड़ा लगा कर बनाया जाता है। इसके अलावा भगवान शंकर की शिवलिंग की तरह शिवलिंग सीड, लॉकेट, बद्धी बनाने की योजना है।

सारा काम खुद ही करती है

पति के सबौर चले जाने के बाद सामान को खरीदने से लेकर उसे बेचने और आपूर्ति करने की जिम्मेदारी संगीता ने बखूबी संभाल ली है। वैसे तो जूट कोलकाता से आता है लेकिन कटिहार से भी जूट को मंगाया जाता है। वैसे ही बांका की एक संस्था है जहां से रक्तचंदन के बीज को मंगाया जाता है। बीज का दाम कोई स्थिर नहीं है। जैसी बीज होती है, वैसा उसका दाम होता है। जूट के बने सामान और उनको मिल रही प्रसिद्धि को देख कर कल तक जो लोग संगीता के काम और कला पर प्रश्नचिन्ह लगाते थे। आज वही इनकी मेहनत की सराहना करते हैं। खुद संगीता के शब्दों में कटिहार में लगे एक मेले में वरिष्ठ राजनेता तारिक अनवर ने उनकी कला को देखा और सराहा तब मन में एक अलग तरह से खुशी हुई। तब से मैंने और उत्साहित होकर काम करना शुरू कर दिया।

कई जगह पर कर चुकी है अपनी कला का प्रदर्शन

महज कुछ ही दिनों में सफलता की इबारत लिखने वाली संगीता की कला कई जगहों पर अपनी छाप छोड़ने में सफल रही है।  पिछले साल दिसंबर में शुरू हुए जागृति रेल यात्रा  में इन्होंने 14 हजार का सामान बेचा। इनके सामानों को सबने सराहा। खासकर विदेशी पर्यटकों ने। मुंबई से शुरू होने वाली यह विशेष रेल यात्रा  देश के कई शहरों में गयी जहां लोगों ने इस यात्रा  में शामिल लोगों की कला को सराहा। इसके अलावा कटिहार, कोलकाता, लुधियाना में भी इनके सामानों का स्टॉल लग चुका है।

जूट के सामान से बढ़ता आत्मसम्मान

जूट का उपयोग कई तरह से होता है। इससे कई तरह का सामान बनते हैं। जूट का एक और उपयोग हो रहा है। इससे आधी आबादी अपने जीवन को संवार रही हैं। तरक्की और आधुनिकता के इस दौर में आधी आबादी कई विकल्पों पर काम कर के अपनी कार्यक्षमता को साबित कर रही है। वैशाली के ग्रामीण इलाके की यह महिलाएं जूट से कई तरह के सामान को बनाकर न केवल उसकी खूबसूरती में चार चांद लगा रही हैं बल्कि आर्थिक स्तर पर भी खुद को सुदृढ कर रही हैं।

सबल बनाने के लिए सहारा

महिला और उनकी हितों में कार्य करने वाली संस्था से जुड़ी माला बताती हैं, हमारा काम पूरे बिहार में चलता है। ध्येय यही होता है कि ग्रामीण इलाके की वैसी महिलाएं जो प्रतिभा संपन्न हैं, उनकी प्रतिभा को सामने लाया जाये और उन्हें इस तरह से प्रशिक्षण दिया जाये कि वह अपने काम को निखारने के साथ आर्थिक तौर पर भी मजबूत हो सकें। प्रयास यही रहता है कि जिस महिला की जैसे कार्य में रुचि हो, उसी कार्य में उनका सहयोग किया जाये। हमारी संस्था इसके लिए अपने स्तर से उन क्षेत्रों में एक सर्वे कराने के बाद यह निर्णय लेती है कि महिलाएं किस कार्य को करना चाहती हैं। पूरे राज्य में कई जगहों पर कई तरह के कार्य आधी आबादी की उन्नति के लिए हो रहे हैं।

खुद बनायी राह

वैशाली जैसे इलाके में जूट को कार्य कराने को लेकर पूछने पर माला बताती हैं, इसके लिए जब क्षेत्र को चुना गया तो इन सभी महिलाओं से यह जानने की कोशिश की गयी कि वह किस तरह का कार्य करना चाहेंगी? कई विकल्प भी बताये गये थे, सभी ने जूट के कार्य को करने में अपनी सहमति जतायी। तब इस कार्य को आरंभ किया गया। वह कहती हैं, सन् 2002 में इसकी नींव डाली गयी थी। तब करीब 65 महिलाओं को इस काम में जोड़ा गया था। अभी इनकी संख्या में कुछ कमी आई है। फिर भी करीब 30 महिलाएं लगातार इस काम को कर रही हैं।

सरकार भी करती है इस कला की कद्र

खूबसूरत डिजाइनों से सजी धजी जूट के बैग, टिफिन बैग, बोतल बैग सभी को बखूबी आकर्षित करते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है कि कम कीमत में लोगों को डिजाईनों के कई विकल्प मिल जाते हैं। बैग की कीमत 45 से 350 रुपये के बीच है। यह कीमत जूट के गुणवत्ता और डिजाइन पर निर्भर करता है। इन महिलाओं के द्वारा बनाये गये फाइल फोल्डर की भी मांग हमेशा बनी रहती है। ये फोल्डर जूट से बने होने के कारण पर्यावरण के अनुकूल तो होते ही हैं, साथ ही मजबूत होने के कारण भी खरीदार इसे काफी पसंद करते हैं। माला बताती हैं, राज्य सरकार हमेशा इन महिलाओं के द्वारा बनाये गये फाइल फोल्डर को खरीदती रहती है। सरकार से जब भी आदेश मिलता है, जूट के बने इन फोल्डरों की आपूर्ति कर दी जाती है। वह कहती हैं, ज्यादातर सरकारी विभाग हमारे पास से हमेशा फाइल फोल्डर लेते हैं। इनकी कीमत 110 रुपये से 275 रुपये के बीच होती है। वह कहती हैं, आमतौर पर बाजार के हिसाब से दर तय होता है। पूरे साल में मई से जून तक थोड़ी धीमी गति से कार्य होता है, लेकिन जुलाई महीने से कार्य फिर प्रगति पर आ जात है। इन महीने में ऑर्डर मिलने शुरू हो जाते हैं। जितना ज्यादा ऑर्डर मिलता है। आमदनी भी उसी रुप में होती है। जूट के पीस के ऊपर भी आमदनी होती है।

कहीं का जूट, कहीं की मेहनत

इन सामानों को बनाने के लिए रॉ मेटेरियल वाले जूट को कोलकाता से मंगाया जाता है। शुरू में यह काम संस्था के स्तर पर होता था, लेकिन जैसे जैसे महिलाओं ने अपनी जिम्मेदारी को संभाला। अपने काम को भी बांट लिया। अब केवल संपर्क करने पर ही रॉ मेटेरियल वाला जूट आ जाता है।

नया प्रयोग खरीदारों को भाया

आकर्षित करने वाले डिजाइन वाले बैग, फोल्डर वैसे तो पहले से ही लोगों को पसंद है। इन महिलाओं ने कुछ नया करने के लिए जूट के साथ कॉटन को मिला कर एक नया प्रयोग किया है, जिसे ‘जोकूकॉटन’ नाम दिया गया है। इससे डीलक्स डिजाइन वाले बैग बनते हैं। बाजार में इनकी मांग बहुत है।

प्रदर्शनी में दिखाया दम

गांव की महिलाओं को दुनिया के सामने लाने के लिए जमीनी स्तर पर कार्य करने के बाद कुछ और भी पहल की गयी है। इसके बारे में माला बताती हैं, राज्य सरकार और विभागीय स्तर पर जो भी प्रदर्शनी लगती हैं, उनमें महिलाएं अपनी सहभागिता को पूरी ईमानदारी से निभाती हैं। साल में छह - सात बार प्रदर्शनी में हिस्सा लेती हैं। कोई पुरस्कार तो नहीं मिला है लेकिन प्रदर्शन में इस कार्य को लेकर लोगों में काफी आकर्षण बना रहता है।

सामाजिक कार्यो से भी सरोकार

इस काम को करने वाली सभी महिलाएं नाम मात्र के लिए शिक्षित हैं। उनके अंदर शिक्षा की लौ जगाने के लिए भी संस्था द्वारा कार्य किया जाता है। बकौल माला, हमारी यह पूरी कोशिश होती है कि काम करने के साथ सभी महिलाएं शिक्षा के महत्व को भी जाने। इसके लिए समय समय पर शिक्षा के क्षेत्र में भी कार्य किया जाता है। आर्थिक, सामाजिक  दृष्टि से कितना प्रभाव पड़ा है? इसके बारे में उनका कहना है, काम को मिलते उचित दाम से सभी के अंदर आत्मविश्वास आ गया है। पहले जहां वह घर, परिवार की जिम्मेदारी को बमुश्किल उठा पाती थी, वहीं अब घर का खर्च निकालने के साथ अपने बच्चों को शिक्षा दिलवा रही हैं।

मिलता है मेहनत को सम्मान

इस काम में लगी महिलाओं को किस तरह से आर्थिक लाभ मिलता है? इसके बारे में माला बताती हैं, संस्था ने सभी महिलाओं को शेयर होल्डर बना दिया है। पूरे साल में बिक्री से जितनी कमाई होती है, उसे महिलाओं में बांट दिया जाता है। किसने कितना काम किया है? इसका पूरा लेखा - जोखा रखा जाता है। जो महिला जितना कार्य करती है, उसी हिसाब से उसका भुगतान होता है। इनके काम को ग्रामीण इलाके से निकाल कर शहरों तक लाने और लोगों तक सीधी पहुंच बनाने के लिए संस्था के स्तर पर एक और कोशिश की गयी है। इनके द्वारा बनाये गये सामान की बिक्री के लिए पटना शहर में एक आउटलेट भी खोला गया है। माला बताती हैं, अभी तक इसका बढ़िया परिणाम सामने आया है। आगे कुछ और भी आउटलेट खोलने की योजना है।

कपास की खेती कैसे करें

 

कपास की खेती भारत की सबसे महत्वपूर्ण रेशा और नगदी फसल में से एक है| और देश की औदधोगिक व कृषि अर्थव्यवस्था में एक प्रमुख भूमिका निभाता है| कपास की खेती लगभग पुरे विश्व में उगाई जाती है| यह कपास की खेती वस्त्र उद्धोग को बुनियादी कच्चा माल प्रदान करता है| भारत में कपास की खेती लगभग 6 मिलियन किसानों को प्रत्यक्ष तौर पर आजीविका प्रदान करता है और 40 से 50 लाख लोग इसके व्यापार या प्रसंस्करण में कार्यरत है|

व्यावसायिक रूप से कपास की खेती को सफेद सोना के रूप में भी जाना जाता है| देश में व्यापक स्तर पर कपास उत्पादन की आवश्यकता है| क्योंकी कपास का महत्व इन कार्यो से लगाया जा सकता है इसे कपड़े बनते है, इसका तेल निकलता है और इसका विनोला बिना रेशा का पशु आहर में व्यापक तौर पर उपयोग में लाया जाता है|

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लम्बे रेशा वाले कपास को सर्वोतम माना जाता है जिसकी लम्बाई 5 सेंटीमीटर इसको उच्च कोटि की वस्तुओं में शामिल किया जाता है| मध्य रेशा वाला कपास (Cotton) जिसकी लम्बाई 3.5 से 5 सेंटीमीटर होती है इसको मिश्रित कपास कहा जाता है| तीसरे प्रकार का कपास छोटे रेशा वाला होता है| जिसकी लम्बाई 3.5 सेंटीमीटर होती है|

कपास हेतु जलवायु

कपास की उत्तम फसल के लिए आदर्श जलवायु का होना आवश्यक है| फसल के उगने के लिए कम से कम 16 डिग्री सेंटीग्रेट और अंकुरण के लिए आदर्श तापमान 32 से 34 डिग्री सेंटीग्रेट होना उचित है| इसकी बढ़वार के लिए 21 से 27 डिग्री तापमान चाहिए| फलन लगते समय दिन का तापमान 25 से 30 डिग्री सेंटीग्रेट तथा रातें ठंडी होनी चाहिए| कपास के लिए कम से कम 50 सेंटीमीटर वर्षा का होना आवश्यक है| 125 सेंटीमीटर से अधिक वर्षा का होना हानिकारक होता है|

उपयुक्त भूमि

कपास के लिए उपयुक्त भूमि में अच्छी जलधारण और जल निकास क्षमता होनी चाहिए| जिन क्षेत्रों में वर्षा कम होती है, वहां इसकी खेती अधिक जल-धारण क्षमता वाली मटियार भूमि में की जाती है| जहां सिंचाई की सुविधाएं उपलब्ध हों वहां बलुई एवं बलुई दोमट मिटटी में इसकी खेती की जा सकती है| यह हल्की अम्लीय एवं क्षारीय भूमि में उगाई जा सकती है| इसके लिए उपयुक्त पी एच मान 5.5 से 6.0 है| हालाँकि इसकी खेती 8.5 पी एच मान तक वाली भूमि में भी की जा सकती है|

फसल चक्र

जलवायु, भूमि, सिंचाई की सुविधाओं तथा किसानों की अपनी व्यक्तिगत आवश्यकताओं के अनुसार कपास की फसल भिन्न-भिन्न फसल चक्र के अंतर्गत उगाई जा सकती है जो इस प्रकार से हैं, जैसे-

वर्षा आधारित क्षेत्रों के लिए फसल चक्र

मध्य और दक्षिण भारत के वर्षा आधारित क्षेत्रों में कपास की एक ही फसल उगाई जाती है| कपास के बाद अगले वर्ष बाजरा, ज्वार या मिर्च आदि की फसलें भी उगाई जाती हैं|

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सिंचाई आधारित क्षेत्रों के लिए फसल चक्र

  1. कपास- गेहूं या जौ
  2. कपास – बरसीम या सेंजी या जई
  3. कपास – सूरजमुखी
  4. कपास – मूंगफली कपास आदि|
अन्र्तफसली खेती

कपास की कतारों के बीच एक कतार बैसाखी मूंग की बोना लाभप्रद है| बारानी क्षेत्र में अन्तर्शस्य अपनाना उपयुक्त है, जुड़वा कतार विधि से अन्तर्शस्य अधिक लाभप्रद रहती है| सिंचित क्षेत्र में निम्न फसल चक्र लाभप्रद एवं उपज में वृद्धि करने वाले पाये गये हैं, जैसे-

  1. कपास – गेहूं या मटर (एक वर्ष)
  2. मक्का – गेहूं – कपास – मैथी (दो वर्ष)
  3. मक्का – सरसों – कपास – मैथी (दो वर्ष)
  4. ग्वार – गेहूं – चारा – कपास (दो वर्ष)

उत्तरी भारत में कपास- गेहूं, कपास – मटर एवं  कपास – ज्वार और दक्षिणी भारत में कपास – धान, कपास – ज्वार, कपास – मूंगफली एवं धान – कपास फसल चक्र मुख्य हैं| उत्तरी भारत में कपास के बाद गेहूं की फसल लेने के लिए कपास की जल्दी पकने वाली किस्में बोनी चाहिए एवं गेहूं की देर से बोने वाली किस्मों का चयन करना चाहिए| हाल ही में हुए अनुसंधान से पता चला है, कि कपास की कटाई के बाद बिना जुताई आधुनिक मशीनों के द्वारा गेहूं की समय पर बुवाई की जा सकती है| जिससे अधिक उपज और पानी की बचत होती है| बिना जुताई के खेती कपास – गेहूं फसल चक्र में ज्यादा सटीक सिद्ध हुई है|

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उन्नत किस्में

किसान भाइयों वर्तमान में बी टी कपास का बोलबाला है| जिसकी किस्मों का चुनाव आप अपने क्षेत्र, परिस्थितियों और क्षेत्र की प्रचलित किस्म के अनुसार ही करें| लेकिन कुछ प्रमुख नरमा, देशी और संकर कपास की अनुमोदित किस्में क्षेत्रवार इस प्रकार है, जैसे-

उत्तरी क्षेत्र के लिए अनुमोदित किस्में-

राज्य 

नरमा (अमरीकन) कपास 

देशी कपास 

संकर कपास 

पंजाब

एफ- 286, एल एस- 886, एफ- 414, एफ- 846, एफ- 1861, एल एच- 1556, पूसा- 8-6, एफ- 1378

एल डी- 230, एल डी- 327, एल डी- 491, पी एयू- 626, मोती, एल डी- 694

फतेह, एल डी एच- 11, एल एच एच- 144

हरियाणा

एच- 1117, एच एस- 45, एच एस- 6, एच- 1098, पूसा 8-6

डी एस- 1, डी एस- 5, एच- 107, एच डी- 123

धनलक्ष्मी, एच एच एच- 223, सी एस ए ए- 2, उमा शंकर

राजस्थान

गंगानगर अगेती, बीकानेरी नरमा, आर एस- 875, पूसा 8 व 6, आर एस- 2013

आर जी- 8

राज एच एच- 116 (मरू विकास)

पश्चिमी उत्तर प्रदेश

विकास

लोहित यामली

मध्य क्षेत्र हेतु अनुमोदित किस्में-

राज्य 

नरमा (अमेरिकन) कपास 

देशी 

संकर 

मध्य प्रदेश

कंडवा- 3, के सी- 94-2

माल्जरी

जे के एच वाई 1, जे के एच वाई 2

महाराष्ट्र

पी के वी- 081, एल आर के- 516, सी एन एच- 36, रजत

पी ए- 183, ए के ए- 4, रोहिणी

एन एच एच- 44, एच एच वी- 12

गुजरात

गुजरात कॉटन- 12, गुजरात कॉटन- 14, गुजरात कॉटन- 16, एल आर के- 516, सी एन एच- 36

गुजरात कॉटन 15, गुजरात कॉटन 11

एच- 8, डी एच- 7, एच- 10, डी एच- 5

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दक्षिण क्षेत्र हेतु अनुमोदित किस्में-

राज्य 

नरमा (अमेरिकन) कपास 

देशी 

संकर 

आंध्र प्रदेश

एल आर ए- 5166, एल ए- 920, कंचन

श्रीसाईंलम महानदी, एन ए- 1315

सविता, एच बी- 224

कर्नाटक

शारदा, जे के- 119, अबदीता

जी- 22, ए के- 235

डी सी एच- 32, डी एच बी- 105, डी डी एच- 2, डी डी एच- 11

तमिलनाडु

एम सी यू- 5, एम सी यू- 7, एम सी यू- 9, सुरभि

के- 10, के- 11

सविता, सूर्या, एच बी- 224, आर सी एच- 2, डी सी एच- 32

पिछले 10 से 12 वर्षों में बी टी कपास की कई किस्में भारत के सभी क्षेत्रों में उगाई जाने लगी हैं| जिनमें मुख्य किस्में इस प्रकार से हैं, जैसे- आर सी एच- 308, आर सी एच- 314, आर सी एच- 134, आर सी एच- 317, एम आर सी- 6301, एम आर सी- 6304 आदि है|

खेत की तैयारी

दक्षिण व मध्य भारत में कपास वर्षा-आधारित काली भूमि में उगाई जाती है| इन क्षेत्रों में खेत तैयार करने के लिए एक गहरी जुताई मिटटी पलटने वाले हल से रबी फसल की कटाई के बाद करनी चाहिए, जिसमें खरपतवार नष्ट हो जाते हैं और वर्षा जल का संचय अधिक होता है| इसके बाद 3 से 4 बार हैरो चलाना काफी होता है| बुवाई से पहले खेत में पाटा लगाते हैं, ताकि खेत समतल हो जाए| उत्तरी भारत में कपास की खेती मुख्यतः सिंचाई आधारित होती है|

इन क्षेत्रों में खेत की तैयारी के लिए एक सिंचाई कर 1 से 2 गहरी जुताई करनी चाहिए एवं इसके बाद 3 से 4 हल्की जुताई कर, पाटा लगाकर बुवाई करनी चाहिए| कपास का खेत तैयार करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि खेत पूर्णतया समतल हो ताकि मिटटी की जलधारण एवं जलनिकास क्षमता दोनों अच्छे हों| यदि खेतों में खरपतवारों की ज्यादा समस्या न हो तो बिना जुताई या न्यूनतम जुताई से भी कपास की खेती की जा सकती है|

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बीज की मात्रा

संकर तथा बी.टी. के लिए चार किलो प्रमाणित बीज प्रति हैक्टेयर डालना चाहिए| देशी और नरमा किस्मों की बुवाई के लिए 12 से 16 किलोग्राम प्रमाणित बीज प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग करें| बीज लगभग 4 से 5 सेंटीमीटर की गहराई पर डालें|

बीज उपचार

  1. कपास के बीज में छुपी हुई गुलाबी सुंडी को नष्ट करने के लिये बीजों को धूमित कर लीजिये| 40 किलोग्राम तक बीज को धूमित करने के लिये एल्यूमीनियम फॉस्फॉइड की एक गोली बीज में डालकर उसे हवा रोधी बनाकर चौबीस घण्टे तक बन्द रखें| धूमित करना सम्भव न हो तो तेज धूप में बीजों को पतली तह के रूप में फैलाकर 6 घण्टे तक तपने देवें|
  2. बीजों से रेशे हटाने के लिये जहां सम्भव हो, 10 किलोग्राम बीज के लिये एक लीटर व्यापारिक गंधक का तेजाब पर्याप्त होता है| मिट्टी या प्लास्टिक के बर्तन में बीज डालकर तेजाब डालिये तथा एक दो मिनट तक लकड़ी से हिलाईये| बीज काला पड़ते ही तुरन्त बीज को बहते हुए पानी में धो डालिये एवं ऊपर तैरते हुए बीज को अलग कर दीजिये| गंधक के तेजाब से बीज के उपचार से अंकुरण अच्छा होगा| यह उपचार कर लेने पर बीज को प्रधूमन की आवश्यकता नहीं रहेगी|
  3. बीज जनित रोग से बचने के लिये बीज को 10 लीटर पानी में एक ग्राम स्ट्रेप्टोसाइक्लिन या ढाई ग्राम एग्रीमाइसिन के घोल में 8 से 10 घण्टे तक भिगोकर सुखा लीजिये इसके बाद बोने के काम में लेवें|
  4. जहाँ पर जड़ गलन रोग का प्रकोप होता है ट्राइकोड़मा हारजेनियम या सूडोमोनास फ्लूरोसेन्स जीव नियन्त्रक से 10 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें या रासायनिक फफूंदनाशी जैसे कार्बोक्सिन 70 डब्ल्यू पी, 3 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज या कार्बेन्डेजिम 50 डब्ल्यू पी से 2 ग्राम या थाईरम 3 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें|
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  1. रेशे रहित एक किलोग्राम नरमे के बीज को 5 ग्राम इमिडाक्लोप्रिड 70 डब्ल्यू एस या 4 ग्राम थायोमिथोक्साम 70 डब्ल्यू एस से उपचारित कर पत्ती रस चूसक हानिकारक कीट और पत्ती मरोड़ वायरस को कम किया जा सकता है|
  2. असिंचित स्थितियों में कपास की बुवाई के लिये प्रति किलोग्राम बीज को 10 ग्राम एजेक्टोबेक्टर कल्चर से उपचारित कर बोने से पैदावार में वृद्धि होती है|

बुवाई का समय तथा विधि

  1. कपास की बुवाई का उपयुक्त समय अप्रेल के द्वितीय पखवाड़े से मई के प्रथम सप्ताह तक है|
  2. अमेरिकन किस्मों की कतार से कतार की दूरी 60 सेन्टीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 45 सेन्टीमीटर रखनी चाहिये|
  3. देशी किस्मों में कतार से कतार की दूरी 45 सेन्टीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 30 सेन्टीमीटर रखनी चाहिये|
  4. बी टी कपास की बुवाई बीज रोपकर (डिबलिंग) 108 X 60 सेंटीमीटर अर्थात 108 सेंटीमीटर कतार से कतार और पौधे से पौधे 60 सेंटीमीटर या 67.5 X 90 सेंटीमीटर की दूरी पर करें|
  5. पौलीथीन की थैलियों में पौध तैयार कर रिक्त स्थानों पर रोप कर वांछित पौधों की संख्या बनाये रख सकते हैं|
  6. लवणीय भूमि में यदि कपास बोई जाये तो मेड़े बनाकर मेड़ों की ढाल पर बीज उगाना चाहिए|

खाद एवं उर्वरक

  1. बुवाई से तीन चार सप्ताह पहले 25 से 30 गाड़ी गोबर की खाद प्रति हैक्टेयर की दर से जुताई कर भूमि में अच्छी तरह मिला देवें|
  2. अमेरिकन और बीटी किस्मों में प्रति हैक्टेयर 75 किलोग्राम नत्रजन तथा 35 किलोग्राम फास्फोरस की आवश्यकता पड़ती है|
  3. देशी किस्मों को प्रति हैक्टेयर 50 किलोग्राम नत्रजन और 25 किलो फास्फोरस की आवश्यकता होती है|
  4. पोटाश उर्वरक मिट्टी परीक्षण के आधार पर देवें, फास्फोरस तथा पोटाश की पूरी मात्रा और नत्रजन की आधी मात्रा बुवाई से पहले देवें| नत्रजन की शेष आधी मात्रा फूलों की कलियां बनते समय देवें|

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सूक्ष्म तत्व सिफारिश- मिटटी जांच के आधार पर जिंक तत्व की कमी निर्धारित होने पर बुवाई से पूर्व बी टी या नरमा कपास में 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट को मिट्टी में मिलाकर बुरका दिया जाना चाहिए| यदि बुवाई के समय जिंक सल्फेट नही दिया गया हो तो 0.5 प्रतिशत जिंक सल्फेट के घोल का दो छिड़काव पुष्पन और टिण्डा वृद्धि अवस्था पर करने से अधिक पैदावार ली जा सकती है| इस उपचार से जड़ गलन की समस्या से भी निजात मिलेगी|

सल्फर- अमेरिकन कपास मे यदि फास्फोरस डी ए पी द्वारा देते हैं| तो उसके साथ 150 किलोग्राम जिप्सम प्रति हैक्टर देवें| यदि फास्फोरस सिंगल सुपर फास्फेट द्वारा दे रहे हो तो जिप्सम देने की आवश्यकता नहीं है|

सिंचाई प्रबंधन

  1. बुवाई के बाद 5 से 6 सिंचाई करें, उर्वरक देने के बाद एवं फूल आते समय सिंचाई अवश्य करें| दो फसली क्षेत्र में 15 अक्टूबर के बाद सिंचाई नहीं करें|
  2. अंकुरण के बाद पहली सिंचाई 20 से 30 दिन में कीजिये| इससे पौधों की जड़े ज्यादा गहराई तक बढ़ती है| इसी समय पौधों की छंटनी भी कर दीजिये| बाद की सिंचाईयां 20 से 25 दिन बाद करें|
  3. नरमा या बी टी की प्रत्येक कतार में ड्रिप लाईन डालने की बजाय कतारों के जोड़े में ड्रिप लाईन डालने से ड्रिप लाईन का खर्च आधा होता है|
  4. इसमें पौधे से पौधे की दूरी 60 सेंटीमीटर रखते हुए जोडे में कतार से कतार की दूरी 60 सेंटीमीटर रखें और जोडे से जोडे की दूरी 120 सेंटीमीटर रखें| प्रत्येक जोडे में एक ड्रिप लाईन डाले तथा ड्रिप लाईन में ड्रिपर से ड्रिपर की दूरी 30 सेंटीमीटर हो और प्रत्येक ड्रिपर से पानी रिसने की दर 2 लीटर प्रति घण्टा हो|
  5. सूखे में बिजाई करने के बाद लगातार 5 दिन तक 2 घण्टे प्रति दिन के हिसाब से ड्रिप लाईन चला देवें| इससे उगाव अच्छा होता है और बुवाई के 15 दिन बाद बून्द-बून्द सिंचाई प्रारम्भ करें|
  6. बून्द-बूंद सिंचाई का समय संकर नरमा की सारणी के अनुसार ही रखे, वर्षा होने पर वर्षा की मात्रा के अनुसार सिंचाई उचित समय के लिये बन्द कर दें| पानी एक दिन के अन्तराल पर लगावें|
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  1. 10 मीटर क्यारी की चौड़ाई और 97.50 प्रतिशत कट ऑफ रेशियो पर अधिकतम उपज ली जा सकती है|
  2. बूंद-बूंद सिंचाई पद्धति से सिफारिश किये गयी नत्रजन की मात्रा 6 बराबर भागों में दो सप्ताह के अन्तराल पर ड्रिप संयंत्र द्वारा देने से सतही सिंचाई की तुलना में ज्यादा उपयुक्त पायी गयी है|
  3. इस पद्धति से पैदावार बढ़ने के साथ-साथ सिंचाई जल की बचत, रूई की गुणवत्ता में बढ़ौतरी और कीड़ों के प्रकोप में भी कमी होती है|

किसान भाइयों को सिंचाई निचे सूचि के अनुसार एक दिन के अन्तराल पर बुवाई के दिन के बाद से शुरू कर देना चाहिए, जो इस प्रकार है, जैसे-

पानी देने का समय-

महिना 

घंटे 

मिनट 

मई

2

जून

2

30

जुलाई

3

अगस्त

3

30

सितम्बर

2

20

अक्तूबर

1

30

निराई-गुड़ाई

  1. निराई-गुड़ाई सामान्यतः पहली सिंचाई के बाद बतर आने पर कसौले से करनी चाहिए| इसके बाद आवश्यकतानुसार एक या दो बार त्रिफाली चलायें|
  2. रसायनों द्वारा खरपतवार नियंत्रण के लिए पेन्डीमेथालीन 30 ई सी, 833 मिलीलीटर (बीजों की बुवाई के बाद मगर अंकुरण से पहले) या ट्राइलूरालीन 48 ई सी, 780 मिलीलीटर (बीजाई से पूर्व मिट्टी पर छिड़काव) को 600 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टेयर की दर से लेट फेन नोजल से उपचार करने से फसल प्रारम्भिक अवस्था में खरपतवार विहीन रहती है| इनका प्रयोग बिजाई से पूर्व मिट्टी पर छिड़काव भली-भांति मिलाकर करें|
  3. प्रथम सिंचाई के बाद कसोले से एक बार गुड़ाई करना लाभदायक रहता है| यदि फसल में बोई किस्म के अलावा दूसरी किस्म के पौधे मिले हुए दिखाई दें तो उन्हें निराई के समय उखाड़ दीजिए क्योंकि मिश्रित कपास का मूल्य कम मिलता है|

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फूल और टिण्डों के गिरने की रोकथाम

स्वतः गिरने वाली पुष्प कलियों और टिण्डों को बचाने के लिए एन ए ए 20 पी पी एम (2 ग्राम प्रति 100 लीटर पानी) का घोल बनाकर पहला छिड़काव कलियाँ बनते समय एवं दूसरा टिण्डों के बनना शुरू होते ही करना चाहिए|

डिफोलिएसन नियंत्रण

नरमा कपास की फसल में पूर्ण विकसित टिण्डे खिलाने हेतु 50 से 60 प्रतिशत टिण्डे खिलने पर 50 ग्राम ड्राप अल्ट्रा (थायाडायाजुरोन) को 150 लीटर पानी में घोल कर प्रति बीघा की दर से छिड़काव करने के 15 दिन के अन्दर करीब-करीब पूर्ण विकसित सभी टिण्डे खिल जाते हैं| ड्राप अल्ट्रा का प्रयोग करने का उपयुक्त समय 20 अक्टूबर से 15 नवम्बर है| इसके प्रयोग से कपास की पैदावार में वृद्धि पाई गई है| गेहूं की बिजाई भी समय पर की जा सकती है|

जिन क्षेत्रों में कपास की फसल अधिक वानस्पतिक बढ़वार करती है, वहाँ पर फसल की अधिक बढ़वार रोकने के लिए बिजाई 90 दिन उपरान्त वृद्धि निपवण रसायन साईकोसिल 80 पी पी एम (8 ग्राम प्रति 100 लीटर पानी) का छिड़काव करें|

कीट नियंत्रण 

कपास की फसल को वैसे तो बहुत सारे कीट हानि पहुंचाते हैं। परन्तु जो कीट आर्थिक दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण हैं| उनके बारे में विस्तृत जानकारी इस प्रकार है, जैसे-

हरा तेला- पत्तियों की निचली सतह पर शिराओं के पास बैठकर रस चूस कर हानि पहुंचाता है, जिससे पत्तियों के किनारे हल्के पीले पड़ जाते हैं, फलस्वरूप ये पत्तियाँ किनारों से नीचे की तरफ मुड़ने लगती है|

नियंत्रण

  1. परभक्षी कीट क्राईसोपा 10 हजार प्रति बीघा की दर से छोड़े और आवश्यकता पड़ने पर परभक्षी को फूल अवस्था में पुनः दोहरायें|
  2. प्रकोप अधिक होने पर निम्नलिखित रसायनों इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस एल, 0.2 मिलीलीटर प्रति लीटर या मोनोक्रोटोफास 36 एस एल, 2.0 मिलीलीटर प्रति लीटर या एसीफेट 75 एस पी, 2.0 ग्राम प्रति लीटर या डाइमिथोएट 30 ई सी, 2.0 मिलीलीटर प्रति लीटर या थायोमिथोक्साम 25 डब्ल्यू जी, 0.5 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से किसी एक कीटनाशी का छिड़काव करें|

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सफेद मक्खी- यह पत्तियों की निचली सतह से रस चूसती है और साथ ही शहद जैसा चिपचिपा पदार्थ छोड़ती है, जिसके ऊपर फहूँद उत्पन्न होकर बाद में पत्तियों को काला कर देती है| अधिक प्रकोप होने पर पत्तियाँ राख और तेलिया दिखाई देती है| यह कीट विषाणु रोग (पत्ता मरोड़क) भी फैलाता है|

नियंत्रण
  1. कीट रोधी बीकानेरी नरमा, मरू विकास, आर एस- 875 उगायें जैसी किस्में उगाएं|
  2. 8 से 12 येलो स्टिकी ट्रेप प्रति बीघा की दर से फसल में कीट के सक्रिय काल में लगायें|
  3. परभक्षी कीट क्राइसोपा 12 हजार प्रति बीघा की दर से छोड़े और आवश्यकता पड़ने पर परभक्षी को फूल अवस्था में पुनः दोहरायें|
  4. अधिक प्रकोप होने पर ट्राइजोफास 40 ई सी, 2.5 मिलीलीटर प्रति लीटर या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस एल, 0.3. मिलीलीटर प्रति लीटर या मिथाईल डिमेटोन 25 ई सी, 2.0 मिलीलीटर प्रति लीटर या एसिटामिप्रीड 20 एस पी, 0.4 ग्राम प्रति लीटर या थायोक्लोप्रिड 240 एस सी,1.0 मिलीलीटर प्रति लीटर या थायोमिथोग्जाम 25 डब्ल्यू जी, 0.5 ग्राम प्रति लीटर या डाईफेन्थूरान 50 डब्ल्यू पी, 2 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से किसी एक कीटनाशी का छिड़काव करें|

चितकबरी सुंडी- प्रारम्भ में लटें तने और शाखाओं के शीर्षस्थ भाग में प्रवेश कर उन्हें खाकर नष्ट करती है, इससे कीट ग्रसित ये भाग सूख जाते हैं| लट से प्रभावित कलियों की पंखुड़ियाँ पीली होकर आपस में एक दूसरे से दूर हटती हुई दिखाई देती है। जैसे ही पौधों पर कलियाँ, फूल एवं टिण्डे बनने शुरू होते हैं लटें उन पर आक्रमण कर देती है|

नियंत्रण
  1. फसल में कीट ग्रसित तने और शाखाओं के शीर्षस्थ भागों को तोड़कर उन्हें जलाकर नष्ट कर देना चाहिये|
  2. 5 से 10 फेरेमोन ट्रेप (लिंग आकर्षक) प्रति हैक्टेयर नर पतंगों का पता और उनको नष्ट करने हेतू लगाये|
  3. परजीवी ट्राइकोग्रामा 40 हजार प्रति बीघा की दर से शाम के समय फसल में छोड़े| यह प्रक्रिया कम से कम 3 बार (7 दिन अन्तराल) पर अवश्य दोहरायें|
  4. परभक्षी कीट क्राईसोपा 12 हजार प्रति बीघा की दर से छोड़े| आवश्यकता पड़ने पर परभक्षी को फूल अवस्था में पुनः छोड़ें|

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  1. अधिक प्रकोप होने पर निम्नलिखित रसायनों मोनोक्रोटोफॉस 36 एस एल, 2.0 मिलीलीटर प्रति लीटर या फेनवेलरेट 20 ई सी, 1.0 मिलीलीटर प्रति लीटर या मेलाथियॉन 50 ई सी, 2.0 मिलीलीटर प्रति लीटर या क्लोरपाईरीफॉस 20 ई सी, 5.0 मिलीलीटर प्रति लीटर या डेल्टामेथ्रिन 2.8 ई सी, 1.0 मिलीलीटर प्रति लीटर या क्यूनालफॉस 25 ई सी, 2.0 मिलीलीटर प्रति लीटर या इन्डोक्साकार्ब 14.5 एस सी, 1.0 मिलीलीटर प्रति लीटर या स्पाईनोसेड 45 एस सी, 0.33 मिलीलीटर प्रति लीटर या फ्लूबेन्डियामाइड 480 एस सी, 0.40 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से किसी एक कीटनाशी का छिड़काव करें|

अमेरिकन सुंडी- पौधों में फलीय भाग उपलब्ध न होने पर पत्तियों को खाकर और गोल-गोल छेद कर नुकसान करती है| फूल एवं टिण्डों के अन्दर नुकसान करती हुई लटों का मल पदार्थ फल भागों के बाहर निकला हुआ दिखाई देता है। कीट का सक्रिय काल सामान्य तौर पर मध्य अगस्त से मध्य अक्टूबर परन्तु विशेष परिस्थिति में कीट का आक्रमण आगे-पीछे भी हो सकता है|

नियंत्रण
  1. प्रकाश पाश (लाईट ट्रेप) को सूर्य अस्त होने के दो घण्टे बाद तथा सूर्योदय के दो घण्टे पूर्व जलाकर प्रौढ़ पतंगों को आकर्षित कर नष्ट किया जा सकता है|
  2. परजीवी ट्राइकोग्रामा 40 से 50 हजार प्रति बीघा की दर से फेरोमोन ट्रेप के अन्दर प्रौढ़ और फसल में अण्डे दिखाई देने पर ही छोड़े|
  3. परभक्षी क्राइसोपा 10 से 12 हजार प्रति बीघा की दर से फसल में पत्तों पर अण्डे दिखाई देने पर छोड़ें|
  4. न्युक्लियर पोलिहाइड्रोसिस वायरस (एन पी वी) का 0.75 मिली लीटर (एल ई) प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें|
  5. नीम युक्त दवा (300 पीपीएम) 5.0 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से छिड़कें|
  6. अधिक प्रकोप होने पर निम्नलिखित रसायनों क्यूनालफॉस 25 ई सी, 2.0 मिलीलीटर प्रति लीटर या मेलाथियॉन 50 ई सी, 2.0 मिलीलीटर प्रति लीटर या डेल्टामेथ्रिन 2.8 ई सी, 1.0 मिलीलीटर प्रति लीटर या थायोडिकार्ब 75 एस पी, 1.75 ग्राम प्रति लीटर या इथियान 50 ई सी, 3.0 मिलीलीटर प्रति लीटर या बीटासिफलूथिन 2.5 ई सी, 0.75 मिलीलीटर प्रति लीटर या क्लोरपाईरीफॉस 20 ई सी, 5.0 मिलीलीटर प्रति लीटर या अल्फामेथ्रिन 10 ई सी, 0.5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से किसी एक कीटनाशी का छिड़काव करें|

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गुलाबी सुंडी- गुलाबी सुंडी के नुकसान की पहचान अपेक्षाकृत कठिन होती है, क्योंकि लटें फलीय भागों के अन्दर छुपकर एवं प्रकाश से दूर रहकर नुकसान करती है| फिर भी अगर कलियाँ फूल एवं टिण्डों को काटकर देखें तो छोटी अवस्था की लटें प्रायः फलीय भागों के ऊपरी हिस्सों में मिलती है|

नियंत्रण
  1. ऐसे सभी फूल जिनकी पंखुड़ियाँ ऊपर से चिपकी हो उन्हें हाथ से तोड़कर उनके अन्दर मौजूद गुलाबी सुंडियों को नष्ट किया जा सकता है| यह प्रक्रिया सप्ताह में कम से कम एक बार अवश्य करें|
  2. 5 फेरोमोन ट्रेप प्रति हैक्टेयर नर पतंगों को नष्ट करने हेतु लगायें|
  3. अधिक प्रकोप होने पर निम्नलिखित रसायनों साइपरमेथ्रिन 10 ई सी, 1.0 मिलीलीटर प्रति लीटर या साइपरमेथ्रिन 25 ई सी, 0.4 मिलीलीटर प्रति लीटर या कार्बरिल 50 डब्ल्यू पी, 4.5 ग्राम प्रति लीटर या ट्राइजोफॉस 40 ई सी, 2.5 मिलीलीटर प्रति लीटर या मेलाथियॉन 50 ई सी, 2.0 मिलीलीटर प्रति लीटर या डेल्टामेथ्रिन 2.8 ई सी, 1.0 मिलीलीटर प्रति लीटर या फ्लूबेन्डियामाइड 480 एस सी, 0.4 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से किसी एक कीटनाशी का छिड़काव करें|

तम्बाकू लट- यह लट बहुत ही हानिकारक कीट है| इसकी लटें पौधों की पत्तियाँ खाकर जालीनुमा बना देती है व कभी-कभी पौधों को पत्तियाँ रहित कर देती है|

नियंत्रण
  1. इस कीट के अंण्डो के समूह जो कि पत्तियों की नीचे वाली सतह पर होते हैं उन्हें इकट्ठा करके नष्ट कर दें, लटों को हाथ से इक्ट्ठा करके नष्ट कर देना चाहिए|
  2. प्रौढ़ कीट (पतंगों) को फेरोमोन ट्रेप लगाकर पकड़ा जा सकता है, इसलिए 10 ट्रेप प्रति हैक्टर की दर से खेत में लगाने चाहिए|
  3. अधिक प्रकोप होने पर निम्नलिखित रसायनों थायोडिकार्ब 75 एस पी, 1.75 ग्राम प्रति लीटर या क्लोरपाइरिफास 20 ई सी, 5 मिलीलीटर प्रति लीटर या क्यूनालफॉस 25 ई सी, 2 मिलीलीटर प्रति लीटर या एसीफेट 75 एस पी, 2 ग्राम प्रति लीटर या न्यूवालूरोन 10 ई सी, 1 मिलीलीटर प्रति लीटर या इमामैक्टीन बैनजोएट 5 एस जी, 0.5 ग्राम प्रति लीटर या फलूबैन्डीयामाइड 480 एस सी, 0.4 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से किसी एक कीटनाशी का छिड़काव करें|

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मीलीबग- इस कीट के मुखांग रस चूसने वाले होते है| कीट अनुकूल परिस्थितियों में भूमि से निकल कर खेत के आसपास के खरपतवारों पर संरक्षण लेते है| फिर मुख्य फसल पर आता है| खेत में अधिक प्रकोप होने पर ही पता चलता है| कीट के निम्फ या  क्रावलर्स व व्यस्क दोनों ही पत्तियों, डण्ठलों, कलियों, फूलों, टहनियों व टिण्डों से रस चूसते है| कीट के अधिक प्रकोप से पत्तियाँ पीली हो कर गिर जाती हैं| तना सूख कर सिकुड़ जाता है व काला हो जाता है और फूल टिण्डे सूख कर गिर जाते है|

नियंत्रण
  1. फसल चक्र को अपनायें, एक ही खेत में लगातार कपास की फसल न लें|
  2. मीलीबग की रोकथाम हेतु चीटियों का नियंत्रण करना जरूरी है|क्योंकि मीलीबग चीटिंयों की सहायता से एक खेत से दूसरे खेत में प्रवेश कर जाती है| इसके लिए खेत के चारों तरफ अवरोधक का घेरा बनायें तथा क्यूनालफॉस डस्ट का प्रयोग करें| चीटियों के बिलों को नष्ट कर दें|खेत में ग्रसित फसलों के अवषेशों को इकट्ठा करके जला दें और खेत के चारों तरफ उगे खरपतवारों को नष्ट कर दें|
  3. मीलीबग कपास की छंटियों के अंदर रहते हैं अतः छुट्टियों को फरवरी माह से पहले-पहले जला देना चाहिए, छुट्टियों का खेत में ढेर नहीं लगाना चाहिए| 7. फसल के चारों तरफ बाजरा व ज्वार की दो-दो कतार में बोयें लेकिन फसल के पास ग्वार, भिण्डी को न बोयें|

जैव नियंत्रण

मिलीबग कीट पर आक्रमण करने वाले कीट, जैसे-

परभक्षी- (लेडीबर्ड बीटल) बरूमेडस लिनीटस, कोक्सीनैला सेप्टमपंक्टेटा, चिलोमेन्स सेक्समाकूलाटा, रोडोलिया फूमिडा, क्रीप्टोलीम्स मोनट्रोज्यूरी व क्राइसोपरला कारनी परभक्षी कीटो को खेत में छोड़े|

परजीवी कीट- अनागीरस रामली व अनीसीअस बोम्बावाली भी खेत में छोड़ें|

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रासायनिक नियत्रंण
  1. कीटनाशक रसायनों का छिड़काव पौधे के तने व ऊपरी भाग पर अच्छी तरह से करें व दूसरा छिड़काव जल्दी ही दोहरायें|
  2. मीलीबग से ग्रसित खेत को तैयार करते समय क्यूनालफॉस धूडा 25 किलोग्राम प्रति हैक्टर की दर से मिला देवें या खेत में पलेवा देते समय क्लोरपाइरीफास 20 ई सी, 4 लीटर प्रति हैक्टर सिंचाई के साथ दें|
  3. अधिक प्रकोप होने पर निम्नलिखित रसायनों का मिथाईल डिमेटोन 25 ई सी, 2 मिलीलीटर प्रति लीटर या क्यूनालफॉस 25 ई सी, 2 मिलीलीटर प्रति लीटर या ट्राईजोफॉस 40 ई सी, 1 मिलीलीटर प्रति लीटर या प्रोफेनोफास 50 ई सी, 1.5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी या एसिटामिप्रिड 20 एस पी, 1 ग्राम प्रति लीटर या क्लोरपाइरीफॉस 20 ई सी, 2 मिलीलीटर प्रति लीटर या एसीफेट 75 एस पी 2 ग्राम प्रति लीटर या थायोडीकार्ब 75 डब्ल्यू पी, 2 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से किसी एक कीटनाशी का छिड़काव करें|

रोग नियंत्रण

जीवाणु अंगमारी- इस रोग की रोकथाम के लिए कीटनाशक दवाओं के छिड़काव करते समय निम्न दवाओं को प्रति 100 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें, जैसे-

  1. स्ट्रेप्टोसाईक्लिन- 5 से 10 ग्राम या प्लाटोमाइसीन या पोसामाइसीन – 50 से 100 ग्राम
  2. कॉपर ऑक्सीक्लोराइड – 300 ग्राम|

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जड़गलन- जड़गलन की समस्या वाले खेतों में बुवाई से पूर्व बोये जाने वाले बीजों को कार्बोक्सिन 70 डब्ल्यू पी, 0.3 प्रतिशत या कार्बेन्डेजिम 50 डब्ल्यू पी, 0.2 प्रतिशत 2 ग्राम प्रति लीटर पानी के घोल में भिगोकर, भिगोये गये बीज को कुछ समय तक छाया में सुखाने के बाद ट्राइकोडर्मा हरजेनियम जीव या सूडोमोनास फ्लूरोसेन्स 10 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करके बोये|

जिन खेतों में जड़ गलन रोग का प्रकोप अधिक है उन खेतों के लिए बुवाई के पूर्व 2.5 किलोग्राम ट्राइकोडर्मा हरजेनियम को 50 किलोग्राम आर्द्रता युक्त गोबर की खाद (एफ वाई एम) में अच्छी तरह मिलाकर 10 से 15 दिनों के लिए छाया में रख दें|

इस मिश्रण को बुवाई के समय डेढ़ बीघा में पलेवा करते समय मिट्टी में मिला दें, साथ में ट्राइकोडरमा जैव से बीज उपचार करें| रोग ग्रस्त खेतों में कपास और मोठ की मिश्रित फसल लीजिए| रोग का प्रकोप अधिक हो तो रोगग्रस्त खेतों में दो वर्ष तक कपास की फसल न लेंवे|

कपास की चुनाई

कपास में टिंडे पूरे खिल जाये तब उनकी चुनाई कर लीजिये| प्रथम चुनाई 50 से 60 प्रतिशत टिण्डे खिलने पर शुरू करें और दूसरी शेष टिण्डों के खिलने पर करें|

पैदावार

उपरोक्त उन्नत विधि से खेती करने पर देशी कपास की 20 से 25, संकर कपास की 25 से 32 और बी टी कपास की 30 से 50 क्विण्टल प्रति हैक्टेयर पैदावार ली जा सकती है|

सनई

 

 

सनई (Sunn या sunn hemp; वैज्ञानिक नाम : Crotalaria juncea) एक पौधा है जिसका उपयोग हरी खाद बनाने में किया जाता है। इसके फूलों की शब्जी बनती है। इसके तने को पानी में सड़ाने के बाद इसके ऊपर लगा रेशा से रस्सी बनायी जाती है।और यह रस्सी बहुत ही टिकाऊ होती है।

 

सनई की खेती

जलवायु

भारत के सभी भागों में इसे उगाया जाता है लेकिन, उ०प्र० एवं मध्य प्रदेश में इसे प्रमुखता से उगाते हैं उत्तरी राज्यों में इसे खरीफ में उगाते हैं जबकि दक्षिणी राज्यों में इसे रबी में भी उगाते हैं इसकी खेती के लिए कम से कम ४० सेमी. वार्षिक वर्षा पर्याप्त रहती है, जिसका वितरण ठीक हो, जो लगभग ५० दिन में गिरे।

भूमि

उचित जल- निकास वाली अल्यूवियल मृदा उचित रहती है, जो बलुई दोमट से दोमट हो चूँकि यह दलहनी (legume) फसल है, लेकिन इसकी जङों में गाँठो (nodules) का निर्माण भूमि में उपस्थित कैल्शियम (Ca) एवं फास्फोरस (P) की मात्रा पर निर्भर करता है अत: कम पी-एच (pH) वाली मृदायें उचित नहीं होती है, लेकिन अम्लीय मृदाओं में चूना प्रयोग करके उन्हें सुधारा जा सकता है रेशा तथा हरी खाद दोनों के लिये खेत की फसल के लिये, सुविधाओं के अनुसार, एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से व २-३ जुताई देशी हल से करते हैं अन्तिम जुताई के बाद खेत को समतल एवं भुरभुरा बनाने के लिए पाटा चलाया जाता है।

प्रजातियाँ

सनई की संस्तुत किस्में एवं उनकी विशेषतायें-

कानपुर-१२ (K-12)- अधिक उपज, रेशा अच्छी गुणवत्ता का, उकठा प्रतिरोधी, उपज १४ कुं०प्रति है०

M-18- शीघ्र परिपक्वता, हल्की भूमि हेतु उपयुक्त, कम वर्षा चाहिए

M-35- तना छेदक प्रतिरोधी, शेष M-18 की तरह

BE-1(नालन्दा सनई)- अच्छी उपज एवं रेशों का गुण भी अच्छा

बैल्लारी- अधिक उपज

D-IX - उकठा प्रतिरोधी

ST-55- K-12 से अधिक उपज

बीज-बुवाई

बुवाई- सनई को खरीफ फसल के रूप में रबी में गेहूँ अथवा तिलहनों - सरसों आदि से पूर्व उगाते हैं इसे प्राय: छिटकवाँ विधि से बोते हैं यदि इसे लाइन में बोया जाय तो उचित होगा छिटकवाँ विधि में बीजदर लगभग २५-३० किग्रा०/ हेक्टेयर पर्याप्त रहती है जबकि लाइनों में बुवाई करने पर मात्र ५ किग्रा०/ हेक्टेयर बीज चाहिए कतार से कतार कतार ३० सेमी तथा पौधा से पौधा ५ से ७ सेमी की दूरी पर हो खाद हेतु इसके बीज की मात्रा ५०-६० किग्रा०/ हेक्टेयर छिटकवाँ विधि में रखते हैं

बुवाई का समय- वर्षा से पूर्व जुलाई में प्राय: इसे बोते हैं एक वर्ष से पुराना बीज न हो, क्योकि बीजों की अंकुरण क्षमता ९० प्रतिशत होती है।

उर्वरक

चूँकि यह एक दलहनी फसल है और स्वयं जङें (ग्रथियों में जीवाणु होने के कारण) वायुमण्डल से नत्रजन एकत्रित कर लेती हैं, अत: नत्रजन देने की जरूरत नहीं पङती है फाँस्फोरस एवं पोटाश तत्वों की मत्रायें लगभग २०-२० क्रिग्रा० (P व K) प्रति हेक्टेयर दी जाय सूक्ष्म-तत्व बोरोन (Boron) एवं माँलिब्डेनम (Mo) लाभदायक है, लेकिन इन्हें प्राय: नहीं दिया जाता है क्योंकि इन तत्वों की मात्रा भूमि में पाई जाती है कैल्सियम की अधिक मात्रा में जरूरत पङती है उ० प्र० के प्रचलित क्षेत्रों - बनारस, प्रतापगढ, सुल्तानपुर, आजमगढ, देवरिया में चूना नहीं दिया जाता खेत में खाद डालने के बाद इसकी बुवाई कर दी जाती है भूमि में रेक चला कर बीजों को मिट्टी में अच्छी तरह मिला देते हैं। सिंचाई:

अप्रैल - मई में बोई गई फसल में वर्षा आरम्भ होने से पहले १-२ सिंचाई करते हैं दाने व रेशे वाली फसलों के लिये वर्षा अगर शीघ्र समाप्त हो जाय या बीच में सूखा पङ जाये तो आवश्यकतानुसार सिंचाई कर देते हैं। खरपतवार:

प्राय: निकाई नहीं की जाती है चूँकि सनई में आइपोमिया स्पीशीज (Ipomea sp.) के बीज मिल जाते हैं अत: एक निकाई आवश्यक है।

कीट-नियंत्रण

१.सनई का मोथ-यह पत्तियों को खाता है इसके ऊसर लाल, काले और सफेद निशान होते हैं यह कैप्सूल में छेद करके अन्दर घुस जाता है मौथ के पंखों पर सफेद, लाल व काले चिन्ह मिलते हैं पत्तियों और तनों पर अपने अण्डे देता है इसकी सूँडी फसल को क्षति पहुँचाती है इससे बचने के लिये अण्डों और सूँडियों को चुनकर बाहर डाल कर नष्ट कर देना चाहिये या ५ प्रतिशत बी० एच० सी० धूल १२-२० किग्रा० प्रति हैक्टर की दर से बुरकनी चाहिये या ०.१५ प्रतिशत इन्डोसल्फान (३५ ई० सी०) के घोल का छिङकाव करें

२. तना छेदक-यह कीट पौधे के उपरोक्त भाग में छेद करके पौधे को क्षति पहुंचाता है इसकी रोकथाम के लिये ५ प्रतिशत बी० एच० सी० की धूल लाभप्रद रहती है या ०.०४ प्रतिशत डायजिनान के घोल का छिङकाव करें

३. लाल रोयेंदार सूँडी- यह लाल बालों वाली सूँडी पत्तियों को खाती है यह सूँडी अंकुरित होते हुये बीजांकुरों को भी खा जाती है और भूमि के अन्दर ही इसकी प्यूपा अवस्था पूरी होती है इसके मौथ के पंखो पर काले धब्बे होते हैं इसके अण्डे भी भूमि में ही पाये जाते हैं इसके रोकथाम के लिये मौथ को रोशनी द्वारा आकर्षित करके, पकङ कर नष्ट कर देना चाहिये, १० प्रतिशत बी० एच० सी० की धूल २५-३० किग्रा० प्रति है० की दर से बुरकना चाहिये या ०.१५ प्रतिशत इन्डोसल्फान के घोल का छिङकाव करें।

रोग

(१) चूर्णिल आसिता - यह फफूँद से लगने वाला रोग है इसके द्वारा बहुत हानि होती है; रोगी पौधों को उखाङकर जला दें, घुलनशील गन्धक जैसे इलोसाल या सल्फैक्स की ३ कि.ग्रा. मात्रा को १००० ली० पानी में घोलकर प्रति हे० की दर से छिङकाव करें या फसल पर ०.०६ प्रतिशत कैराथेन (६० ग्राम दवा १०० ग्राम ली० पानी में) नामक दवा का छिङकाव करें

(२) गेरूई या रतुआ-यह फफूँद से लगता है पौधे के सभी वायुवीय भागों पर फफोले दिखाई देते हैं इनका रंग कुछ पीला - भूरा होता है धब्बे बिखरे रहते हैं व बाद में काले - भूरे हो जाते हैं इसकी रोकथाम के लिये ०.२ प्रतिशत डाइथेन एम-४५ के घोल का छिङकाव करें

(३) मोजेक- यह विषाणु द्वारा लगने वाली बीमारी है पत्तियाँ इससे प्रभावित होती हैं और इनमें मोङ आ जाते हैं तथा कुरूप हो जाती हैं शारीरिक क्रिया कम हो जाती है फसल की पैदावार घट जाती है इसकी रोकथाम भी अभी तक अज्ञात है वैसे फसलों के हरे-फेर कर बोने से रोग को कुछ सीमा तक रोका जा सकता है

(४) मुरझान या उकठा- यह फफूँद द्वारा लगता है पत्तियाँ पीली पङ जाती हैं यह रोग अक्टूबर में दिखाई देता है और पूरा पौधा मुरझा जाता है तथा बाद में नष्ट हो जाता है इसे रोकने के लिये प्रतिरोधी किस्मों (के १२ व के १२ पीली) को उगाना चाहिये, फसल -चक्र अपनाने चाहियें और खेत की स्वच्छता का भी ध्यान रखना चाहिये बीज को बोने से पहले एग्रोसन जी० एन० से उपचारित कर लेना चाहिये

(५) जीवाणु पत्ती या पर्ण दाग- यह बीमारी जीवाणु से लगती है इसके द्वारा पत्तियो पर चकत्ते बने जाते हैं यह बहुत कम प्रभाव दिखाती है और कम ही क्षति इसके द्वारा होती है खेत से उचित जल निकास का प्रबन्ध करें व उचित फसल - चक्र अपनायें।

कटाई

(अ) हरी खाद के लिये कटाई-फसल बोने के ५० - ६० दिन बाद फसल खेत में पलट दी जाती है अप्रैल -मई में बोई गई फसल जून- जौलाई में खेत में पलट देते हैं व जून -जौलाई में बोई गई फसल अगस्त - सितम्बर में खेत में पलट देते है

(ब) रेशे वाली फसल-बोने के १० -१२ सप्ताह बाद रेशे के लिये फसल की कटाई करते हैं पहले कटाई करने पर रेशा कच्चा प्राप्त होता है तथा उपज में भारी कमी होती है व बाद में कटाई करने पर रेशा अच्छे गुणों वाला प्राप्त नहीं होता सितम्बर में इस फसल की कटाई हो जाती है

(स) बीज या दाने वाली फसल - फलियों में बीज जब कठोर व काला हो जाये तभी फसल की कटाई करने पर रेशा दाने के लिये करते हैं इस अवस्था पर फलियाँ सूख जाती हैं व बीज अपने वृन्त से अलग हो जाता है हंसिया से कटाई करके, फसल से सूखे डन्डों की सहायता से बीज अलग कर लेते हैं सूखे तने को पानी में गला कर निम्न गुणों का रेशा भी प्राप्त हो जाता है।

उपज

हरी खाद की फसल से २००-३०० कुन्तल प्रति है० तक जीवांश प्राप्त हो जाता है रेशे वाली फसलों से ८-१२ कु० तक रेशे प्रति है० दाने वाली फसल से ८-१० कुन्तल दाना प्रति हैक्टर प्राप्त हो जाता है।

सड़ाना एवं रेशा निकालना

जूट की भाँति इसके सङाने की विधि है प्राय: पोखर, तालाबों, जहाँ वर्षा का पानी कुछ दिनों तक भर जाय, ऐसी जगह इसके तनों का बंडल बाँधकर पानी में गाढ देते हैं, पहले खङा करके पानी में १-२ दिन छोङ देते हैं फिर उन्हें पानी में डालकर मिट्टी से ढक देते हैं लगभग ५-७ दिन में सङाव क्रिया पूर्ण हो जाती है जूट की तुलना में सनई से रेशा निकालना कठिन कार्य है पीटना एवं झटक विधि उपयुक्त नहीं रहती क्योंकि टूटे तने पर रेशा चिपका रहता है अत: इसके प्रत्येक तने से अलग - अलग रेशा निकालते हैं, जो हाथ से निकाला जाता है रेशा को बाद में पानी में धोकर धूप में सूखा देते हैं यदि सङाव अच्छा नहीं हुआ है, तो रेशा मोटा (भद्दा) एवं हरा तो होगा लेकिन उसकी ताकत में कमी नहीं आवेगी पानी में कम धुलाई से गोंद सा रेशे पर चिपका रहेगा

बीज उत्पादन

प्राय: १०० दानों का वजन ३.४ से ६ ग्राम होता है जो किस्म से किस्म भिन्न होता है इसके बीज में प्रोटीन अधिक होती है अत: चिपकाने के काम में आती है वैसे बीज उत्पादन अभी कोई संगठित रूप नहीं हो रहा हैं, लेकिन कृषक पुराने तरीकों से ही बाजरा, ज्वार, रागी, धान की फसलों के चारों ओर कूंड लगाकर बीज हेतु सनई उगाते हैं बीज की उपज २० कुं० प्रति है० तक पहुँच जाती है हरी खाद हेतु सनई: सनई को हरी खाद हेतु उगाने के लिए बीज लगभग ६० किग्रा० प्रति हैक्टर प्रयोग होता है, जो जुलाई में बोते हैं और अगस्त तक लगभग ४५ दिन की फसल को खेत में पलट देते हैं, ताकि एक माह में फसल वर्षा के पानी से सङ जाय प्राय: ६०-८० किग्रा० नत्रजन प्रति हेक्टेयर भूमि में (P व K के अलावा) प्राप्त हो जाती है जो हरे तने लगभग २० टन प्रति हेक्टेयर भूमि में पलटने से मिल जाती है ऊसर भूमियों को सुधारने के लिए हरी खाद प्रयोग करते हैं।

पटसन

पटसनपाट या पटुआ एक द्विबीजपत्री, रेशेदार पौधा है। इसका तना पतला और बेलनाकार होता है। इसके तने से पत्तियाँ अलग कर पानी में गट्ठर बाँधकर सड़ने के लिए डाल दिया जाता है। इसके बाद रेशे को पौधे से अलग किया जाता है। इसके रेशे बोरे, दरी, तम्बू, तिरपाल, टाट, रस्सियाँ, निम्नकोटि के कपड़े तथा कागज बनाने के काम आता है।

'जूट' शब्द संस्कृत के 'जटा' या 'जूट' से निकला समझा जाता है। यूरोप में 18वीं शताब्दी में पहले-पहल इस शब्द का प्रयोग मिलता है, यद्यपि वहाँ इस द्रव्य का आयात 18वीं शताब्दी के पूर्व से "पाट" के नाम से होता आ रहा था।

 

पटसन के पौधे

पटसन के रेशे दो प्रकार के जुट के पौधों से प्राप्त होते हैं। ये पौधे टिलिएसिई (Tiliaceae) कुल के कौरकोरस कैप्सुलैरिस (Corchorus capsularis) और कौरकोरस ओलिटोरियस (Oolitorius) हैं और रेशे के लिये दोनों ही उगाए जाते हैं। पहले प्रकार की फसल कुल वार्षिक खेती के 3/4 भाग में और दूसरे प्रकार की फसल कुल खेती के शेष 1/4 भाग में होती है। ये प्रधानता भारत और पाकिस्तान में उपजाए जाते हैं।

कैप्सुलैरिस कठोर होता है और इसकी खेती ऊँची तथा नीची दोनों प्रकार की भूमियों में होती है जब कि ओलिटोरियस की खेती केवल ऊँची भूमि में होती है। कैप्सुलैरिस की पत्तियाँ गोल, बीज अंडाकार गहरे भूरे रंग के और रेशे सफेद पर कुछ कमजोर होते हैं, जब कि ओलिटोरियस की पत्तियाँ वर्तुल, सूच्याकार और बीज काले रंग के होते हैं और रेशे सुंदर सुदृढ़ पर कुछ फीके रंग के। कैप्सुलैरिस की किस्में फंदूक, घालेश्वरी, फूलेश्वरी, देसीहाट, बंबई डी 154 और आर 85 हैं तथा ओलिटोरियस की देसी, तोसाह, आरथू और चिनसुरा ग्रीन हैं। बीज से फसल उगाई जाती है। बीज के लिये पौधों को पूरा पकने दिया जाता है, पर रेशे के लिये पकने के पहले ही काट लिया जाता है।

पटसनकी खेती

पटसन का खेत

भारत के बंगाल, बिहार, उड़ीसा, असम और उत्तर प्रदेश के कुछ तराई भागों में लगभग 16 लाख एकड़ भूमि में जूट की खेती होती है। इससे लगभग 38 लाख गाँठ (एक गाँठ का भार 400 पाउंड) जूट पैदा होता है। उत्पादन का लगभग 67 प्रति शत भारत में ही खपता है। 7 प्रति शत किसानों के पास रह जाता है और शेष ब्रिटेन, बेल्जियम जर्मनी, फ्रांस, इटली और संयुक्त राज्य, अमरीका, को निर्यात होता है। अमरीका, मिस्र, ब्राज़िल, अफ्रीका, आदि अन्य देशों में इसके उपजाने की चेष्टाएँ की गईं, पर भारत के जूट के सम्मुख वे अभी तक टिक नहीं सके।

जूट की खेती गरम और नम जलवायु में होती है। ताप 25-35 सेल्सियस और आपेक्षिक आर्द्रता 90 प्रतिशत रहनी चाहिए। हलकी बलुई, डेल्टा की दुमट मिट्टी में खेती अच्छी होती है। इस दृष्टि से बंगाल का जलवायु इसके लिये सबसे अधिक उपयुक्त है। खेत की जुताई अच्छी होनी चाहिए। प्रति एकड़ 50 से 100 मन गोबर की खाद, या कंपोस्ट और 400 पाउंड लकड़ी या घास पात की राख डाली जाती है। पुरानी मिट्टी में 30-60 पाउंड नाइट्रोजन दिया जा सकता है। कुछ नाइट्रोजन बोने के पहले और शेष बीजांकुरण के एक सप्ताह बाद देना चाहिए। पोटाश और चूने से भी लाभ होता है। नीची भूमि में फरवरी में और ऊँची भूमि में मार्च से जुलाई तक बोआई होती है। साधारणतया छिटक बोआई होती है। अब ड्रिल का भी उपयोग होने लगा है। प्रति एकड़ 6 से लेकर 10 पाउंड तक बीज लगता है।

पौधे के तीन से लेकर नौ इंच तक बड़े होने पर पहले गोड़ाई की जाती है। बाद में दो या तीन निराई और की जाती है। जून से लेकर अक्टूबर तक फसलें काटी जाती हैं। फूल झर जाने तथा फली निकल आने पर ही फसल काटनी चाहिए। अन्यथा देर करने से पछेती कटाई से रेशे मजबूत, पर भद्दे और मोटे हो जाते हैं और उनमें चमक नहीं होती। बहुत अगेती कटाई से पैदावार कम और रेशे कमजोर होते हैं।

भूमि की सतह से पौधे काट लिए जाते हैं। कहीं कहीं पौधे आमूल उखाड़ लिए जाते हैं। ऐसी कटी फसल को दो तीन दिन सूखी जमीन में छोड़ देते हैं, जिससे पत्तियाँ सूख या सड़ कर गिर पड़ती हैं। तब डंठलों को गठ्ठरों में बाँधकर पत्तों, घासपातों, मिट्टी आदि से ढँककर छोड़ देते हैं। फिर गठ्ठरों से कचरा हटाकर उनकी शाखादार चोटियों को काटकर निकाल लेते हैं। अब पौधे गलाए जाते हैं। गलाने के काम दो दिन से लेकर एक मास तक का समय लग सकता है। यह बहुत कुछ वायुमंडल के ताप और पानी की प्रकृति पर निर्भर करता है। गलने का काम कैसा चल रहा है, इसकी प्रारंभ में प्रति दिन जाँच करते रहते हैं। जब देखते है कि डंठल से रेशे बड़ी सरलता से निकाले जा सकते हैं तब डंठल को पानी से निकाल कर रेशे अलग करते और धोकर सुखाते हैं।

रेशा निकालने वाला पानी में खड़ा रहकर, डंठल का एक मूठा लेकर जड़ के निकट वाले छोर को छानी या मुँगरी से मार मार कर समस्त डंठल छील लेता है। रेशा या डंठल टूटना नहीं चाहिए। अब वह उसे सिर के चारों ओर घुमा घुमा कर पानी की सतह पर पट रख कर, रेशे को अपनी ओर खींचकर, अपद्रव्यों को धोकर और काले धब्बों को चुन चुन कर निकाल देता है। अब उसका पानी निचोड़ कर धूप में सूखने के लिये उसे हवा में टाँग देता है। रेशों की पूलियाँ बाँधकर जूट प्रेस में भेजी जाती हैं, जहाँ उन्हें अलग अलग विलगाकर द्रवचालित दाब (Hydraulic press) में दबाकर गाँठ बनाते हैं। डंठलों में 4.5 से 7.5 प्रति शत रेशा रहता है।

जूट : पटसनके रेशे

जूट को सुखाया जा रहा है।

ये साधारणतया छह से लेकर दस फुट तक लंबे होते हैं, पर विशेष अवस्थाओं में 14 से लेकर 15 फुट तक लंबे पाए गए हैं। तुरंत का निकाला रेशा अधिक मजबूत, अधिक चमकदार, अधिक कोमल और अधिक सफेद होता है। खुला रखने से इन गुणों का ह्रास होता है। जूट के रेशे का विरंजन कुछ सीमा तक हो सकता है, पर विरंजन से बिल्कुल सफेद रेशा नहीं प्राप्त होता। रेशा आर्द्रताग्राही होता है। छह से लेकर 23 प्रति शत तक नमी रेशे में रह सकती है।

जूट की पैदावार, फसल की किस्म, भूमि की उर्वरता, अंतरालन, काटने का समय आदि, अनेक बातों पर निर्भर करते हैं। कैप्सुलैरिस की पैदावार प्रति एकड़ 10-15 मन और ओलिटोरियस की 15-20 मन प्रति एकड़ होती है। अच्छी जोताई से प्रति एकड़ 30 मन तक पैदावार हो सकती है।

जूट के रेशे से बोरे, हेसियन तथा पैंकिंग के कपड़े बनते हैं। कालीन, दरियाँ, परदे, घरों की सजावट के सामान, अस्तर और रस्सियाँ भी बनती हैं। डंठल जलाने के काम आता है और उससे बारूद के कोयले भी बनाए जा सकते हैं। डंठल का कोयला बारूद के लिये अच्छा होता है। डंठल से लुगदी भी प्राप्त होती है, जो कागज बनाने के काम आ सकती है।

 

 

पटसन या पाट को मेस्टोम भी कहते हैं। भारत में पटसन की कृषि लगभग 582 हजार एकड़ भूमि में होती है। इससे मोटे रस्से, मछली के जाल, मोटे बोरे, टाट तथा कैनवास बनता है। जूट के साथ मिलाकर इसके चीनी के बोरे भी बनते हैं। इसकी पत्तियाँ, कोपलें और फल बहुत कड़वे होते हैं। पोधों के शीर्ष और शाखाएँ पशुओं को खिलाई जाती है। इसका बीज दुधारू पशुओं को खिलाया जाता है। सूखे डंठल जलाधन के काम आते हैं। इनसे दियासलाई को सींक भी बनती है।

पटसन के लिये 20 से लेकर 30 इंच तक वर्षा, पाँच छह महीनों के बीच वितरित होनी चाहिए। खरीफ की फसल के रूप में इसकी खेती अच्छी होती है। भारी वर्षा और पाला फसल के लिये हानिकारक होता है।

हलकी काली भूमि तथा बलुई कछार दुमट इसके लिये अच्छी होती है। पथरीली भूमि में भी यह उगता है। निचली मिट्टी इसके लिये उपयुक्त नहीं है। इसकी फसल बाजरा, ज्वार और कपास के साथ होती है। फसलों के किनारे किनारे यह उगाया जाता है। या तो यह छींटा जाता है या मुख्य फसल के साथ पाँच या छह कतारों के बाद ड्रिल से स्वतंत्र कतारों में बोया जाता है।

पटसन के लिये खेत की तीन बार जुताई और फिर आड़ी जुताई करके हैरो चलाया जाता है, जिसमें मिट्टी भुरभुरी हो जाय। साधारणतया खाद नहीं दी जाती। यदि 20 से लेकर 30 पाउंड नाइट्रोजन की खाद का प्रयोग किया जाय तो फसल अच्छी होती है। इसकी बोआई बरसात के आरंभ में मई से जुलाई के बीच की जाती है। एक दो बार गुड़ाई की जाती है। पौधों की दूरी चार से लेकर छह इंच तक रहनी चाहिए।

जब फूल खिलने लगें तब रेशे के लिये फसल काटी जाती है। पौधों को उखाड़कर धूप में सुखाया जाता है। फिर 30 से 40 पौधों को बाँधकर पोरियों को काट दिया जाता है ताकि कठोर भाग मुलायम हो जायें। फिर पौधों को पानी में लिटाकर तथा डुबाकर गलाई के लिये रख देते हैं। आवश्यकता होने पर उनपर वजन भी रखा जाता है।

10 से लेकर 20 दिनों तक के भीतर गलाई हो जाती है। फिर जूट की भाँति ही इससे रेशा निकालकर और धोकर सुखाते हैं। सूखे डंठलों में लगभग 16 प्रतिशत रेशा होता है।

यदि बीज प्राप्त करना है तो पटसन को कुछ दिन और खड़ा रहने दिया जाता है। जब पौधा सूखने की अवस्था में आता है तब उसे काट लिया जाता है। अब डंडे से पीटकर, बीज निकालकर और डंठलों को सड़ाकर रेशा निकालते हैं। बीज से निकाला गया रेशा मोटा, चमकरहित और कमजोर होता है। पछेती बुआई की फसल से प्रति एकड़ 400 से लेकर 800 पाउंड तक बीच प्राप्त होता है।

पटसन की खपत देश में ही होती है। इसका निर्यात नहीं होता। सफेद, मुलायम, चमकदार तथा नमी, अपद्रव्य और काले धब्बों से रहित रेशा कीमती समझा जाता है। इसे 300 से लेकर 400 पाउंड तक की गाँठों में दबाकर बाँधते हैं। पटसन का रेशा अन्य रेशों के साथ, विशेषत: रोजेल के रेशों के साथ, मिलाकर बेचा जाता है। यह हिबिसकस डेब डेरीफ नामक सजातीय पौधे से प्राप्त होता है।

ढैंचा की खेती

 

ढैंचा की खेती दलहनी फसल के रूप में की जाती है. किसान भाई इसकी खेती हरी खाद और बीज दोनों के लिए करते हैं. ढैंचा के हरे पौधों से तैयार की गई खाद खेत की उर्वरक शक्ति को काफी ज्यादा बढ़ा देती है. और इसकी पैदावार भी खेत की उर्वरक क्षमता को बढ़ाती है. इसके पौधे जमीन में नाइट्रोजन की पूर्ति करते हैं.

 

ढैंचा की खेती

ढैंचा का पौधा 10 से 15 फिट तक की ऊंचाई का होता है. इसके पौधों को विकास करने के लिए किसी ख़ास जलवायु की जरूरत नही होती. इसकी खेती भारत में ज्यादातर खरीफ की फसलों के साथ की जाती है. इसके पौधे कम और ज्यादा बारिश में भी आसानी से विकास कर सकते हैं.

अगर आप भी इसकी खेती करने का मन बना रहे हैं तो आज हम आपको इसकी खेती के बारें में सम्पूर्ण जानकारी देने वाले हैं.

 

उपयुक्त मिट्टी

ढैंचा की खेती से अधिक उपज लेने के लिए इसे काली चिकनी मिट्टी में उगाना चाहिए. जबकि हरी खाद के लिए इसे किसी भी तरह की भूमि में उगा सकते हैं. इसका पौधा जल भराव होने पर भी आसानी से विकास कर लेता है. इसकी खेती के लिए जमीन का पी.एच. मान सामान्य होना चाहिए.

जलवायु और तापमान

ढैंचा की खेती के लिए किसी ख़ास जलवायु की जरूरत नही होती. लेकिन उत्तम पैदावार लेने के लिए इसे खरीफ की फसल के साथ उगाना अच्छा होता है. इसके पौधे पर अधिक गर्मी या सर्दी का असर नही पड़ता. इसके पौधे को बारिश की सामान्य जरूरत होती है.

शुरुआत में इसके पौधे को अंकुरित होने के लिए सामान्य तापमान की जरूरत होती है. उसके बाद इसके पौधे किसी भी तापमान पर आसानी से विकास कर लेते हैं. लेकिन सर्दियों में न्यूनतम 8 डिग्री के आसपास तापमान अधिक समय तक रहने पर इसकी पैदावार में फर्क देखने को मिलता है.

उन्नत किस्में

वर्तमान में ढैंचा की कई तरह की उन्नत किस्में हैं. जिन्हें उनकी उपज के आधार पर अलग अलग जगहों पर उगाया जाता है.

पंजाबी ढैंचा 1

ढैंचा की इस किस्म के पौधों की वृद्धि काफी तेज़ी से होती है. इस किस्म के बीजों का आकार मोटा होता है. जिनका रंग मटियाला दिखाई देता है. इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के लगभग 150 दिन में कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं. इस किस्म के पौधों को हरी खाद के लिए अधिक उगाया जाता है.

सी.एस.डी. 137

उन्नत किस्म का पौधा

इस किस्म के पौधे क्षारीय भूमि में भी उगाये जा सकते हैं. जिससे भूमि का क्षारीय गुण भी कम हो जाता है. इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के लगभग 130 से 140 दिन बाद पककर तैयार हो जाते हैं. जिनकी प्रति हेक्टेयर पैदावार 20 से 30 टन के आसपास पायी जाती है.

हिसार ढैंचा-1

ढैंचा की इस किस्म को हरी खाद के लिए उगाया जाता है. इसके पौधे जल्दी पैदावार देने के लिए जाने जाते हैं. इस किस्म का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 15 से 20 टन तक पाया जाता है.

सी.एस.डी. 123

इस किस्म के पौधे अधिक पानी सोखने वाली जमीन के लिए उपयुक्त होते हैं. इसके अलावा इस किस्म को भी जमीन में क्षारीय गुण को कम करने के लिए उगा सकते हैं. इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के लगभग 120 से 130 दिन बाद पककर तैयार हो जाते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर उत्पादन 20 से 25 टन के बीच पाया जाता है.

पंत ढैंचा-1

ढैंचा की इस किस्म को उत्तर प्रदेश में अधिक उगाया जाता है. इस किस्म को ज्यादातर हरी खाद के लिए उगाते हैं. लेकिन इसका पौधा अधिक पैदावार देने के लिए भी जाना जाता है. इस किस्म का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 30 टन से ज्यादा मिलता है. इसके बीज मटियाले रंग के होते हैं. जिनका आकार सामान्य दिखाई देता है.

खेत की तैयारी

ढैंचा की अधिक पैदावार लेने के लिए शुरुआत में खेतों की अच्छे से जुताई की जानी चाहिए. इसके लिए खेत की मिट्टी पलटने वाले हलों से गहरी जुताई कर खेत को खुला छोड़ दें. उसके बाद खेत में लगभग 10 गाडी प्रति एकड़ के हिसाब से पुरानी गोबर की खाद डालकर उसे मिट्टी में मिला दें. खाद को मिट्टी में मिलाने के बाद खेत का पलेव कर दें. पलेव करने के बाद जब मिट्टी उपर से सुखी हुई दिखाई देने लगे तब उसमें रासायनिक खाद की उचित मात्रा का छिडकाव कर रोटावेटर चला दें. उसके बाद खेत में पाटा लगाकर उसे समतल कर दें.

बीज रोपाई का तरीका और टाइम

पौध रोपाई का तरीका

ढैंचा के बीजों की रोपाई समतल खेत में ड्रिल वाली मशीनों के माध्यम से की जाती है. ड्रिल के माध्यम से इसके बीजों की रोपाई सरसों की तरह पंक्तियों में की जाती है. पंक्तियों में इसके बीजों के बीच 10 सेंटीमीटर के आसपास दूरी रखी जाती है. जबकि पंक्ति से पंक्ति की दूरी एक फिट के आसपास होनी चाहिए. इसके अलावा छोटी भूमि पर खेत के लिए कुछ किसान भाई इसकी रोपाई छिडकाव विधि से भी करते हैं. जिसमें किसान भाई समतल खेत में इसके बीजों को छिड़क देंते हैं. उसके बाद कल्टीवेटर के माध्यम से खेत की दो हल्की जुताई कर देते हैं जिससे बीज मिट्टी में अच्छे से मिल जाता है. दोनों विधि से रोपाई के दौरान बीज को जमीन में तीन से चार सेंटीमीटर नीचे उगाया जाना चाहिए.

ढैंचा के बीजों की रोपाई हरी खाद के लिए अप्रैल के महीने में की जाती है. जबकि पैदावार के लिए इसे खरीफ की फसल के साथ बारिश के मौसम के शुरुआत में ही उगाया जाता है. इसकी खेती के लिए प्रति एकड़ लगभग 10 से 15 किलो बीज काफी होता है.

पौधों की सिंचाई

इसके पौधों को अंकुरित होने के बाद सिंचाई की जरूरत कम होती है. लेकिन अधिक पैदावार लेने के लिए इसके पौधों की चार से पांच सिंचाई कर देना अच्छा होता है. इसके बीजों की रोपाई नम भूमि में की जाती है. उसके बाद जब बीज अंकुरित हो जाएँ तब इसके पौधे को लगभग 20 दिन बाद पानी देना चाहिए. उसके बाद पौधों की दूसरी और तीसरी सिंचाई एक एक महीने के अंतराल में करनी चाहिए. जबकि बाकी की दो सिंचाई पौधों पर फली बनने के दौरान करनी चाहिए. जिससे फली में बीजों की मात्रा बढती है. और पैदावार भी अधिक मिलती है.

उर्वरक की मात्रा

ढैंचा के पौधों को उर्वरक की ज्यादा जरूरत नही होती. इसके लिए खेत की जुताई के वक्त लगभग 10 गाडी पुरानी गोबर की खाद को प्रति हेक्टेयर के हिसाब से खेत में डालकर मिट्टी में मिला दें. इसके अलावा रासायनिक खाद के रूप में एक बोरा एन.पी.के. की मात्रा को खेत की आखिरी जुताई के वक्त खेत में छिड़क देना चाहिए.

खरपतवार नियंत्रण

ढैंचा की खेती में में खरपतवार नियंत्रण पौधों की एक या दो नीलाई गुड़ाई कर किया जाता है. इसके लिए पौधों की पहली गुड़ाई बीज रोपाई के लगभग 25 दिन बाद कर देनी चाहिए. और दूसरी गुड़ाई पहली गुड़ाई के 20 दिन बाद करनी चाहिए.

पौधों में लगने वाले रोग और उनकी रोकथाम

ढैंचा के पौधे में काफी कम ही रोग देखने को मिलते हैं. लेकिन किट की सुंडियों के आक्रमण की वजह से इसके पौधों कम पैदावार देते हैं. दरअसल इसके पौधे पर कीटों का लार्वा ( सुंडी ) इसकी पत्तियों और कोमल शाखाओं को खाकर पौधे का विकास रोक देती हैं. जिसकी वजह से इसकी पैदावार कम प्राप्त होती है. इस तरह के रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर नीम के काढ़े या सर्फ के घोल का छिडकाव करना चाहिए.

फसल की कटाई और कढ़ाई

ढैंचा की पैदावार

ढैंचा के पौधे बीज रोपाई के लगभग 130 से 150 दिन बाद कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं. इसके पौधे जब सुनहरी पीले रंग के दिखाई दे तब इसकी फलियों की शाखाओं को काट लिया जाता है. और इसके बाकी बचे भाग को किसान भाई उखाड़कर ईंधन के रूप में उपयोग में लेते हैं. इसकी फलियों को कुछ दिन तेज़ धूप में सुखाकर उनसे मशीन की सहायता से बीज को निकाल लिया जाता है. उसके बाद इसके बीजों को बाज़ार में बेच दिया जाता है.

पैदावार और लाभ

ढैंचा की विभिन्न किस्मों की औसतन पैदावार 25 टन के आसपास पाई जाती है. जिसके बीजों को बाज़ार में बेचने पर किसान भाइयों की अच्छी खासी कमाई हो जाती है.