भूमिका

https://static.vikaspedia.in/media/images_hi/agriculture/crop-production/91593e93094d92f92a94d93092393e93293f92f94b902-91593e-938902915941932/92b94293294b902-915940-916947924940/rose.jpg/@@images/f9c1239c-6a61-4d54-b607-0cdafa291555.jpegगुलाब अपनी उपयोगिताओं के कारण सभी पुष्पों में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। आमतौर पर गुलाब का पौधा ऊंचाई में 4-6फुट का होता है। तने में असमान कांटे लगे होते हैं। गुलाब की पत्तियां मिली हुई होती है। बहुत मात्रा में मिलने वाला गुलाब का फूल गुलाबी रंग का होता है। गुलाब का फल अंडाकार होता है। इसका तना कांटेदारपत्तियां बारी-बारी से घेरे में होती है। पत्तियों के किनारे दांतेदार होती है। फल मांसल बेरी की तरह होता है जिसे 'रोज हिपकहते हैं। गुलाब का पुष्पवृन्त कोरिम्बोसपेनीकुलेट या सोलिटरी होता है।

गुलाब एक भारतीय पुष्प है। पूरे भारत में गुलाब के पौधे पाए जाते हैं। गुलाब का वैज्ञानिक नाम रोजा हाइब्रिडा है। देशी गुलाब लाल रंग का होता है। परन्तु कलम करके कई रंगो के गुलाब उगाए जाते हैं। गुलाब एक ऐसा फूल हैजिसके बारे में सब जानते हैं। गुलाब का फूल दिखने में जितना अधिक सुन्दर होता है। उससे कहीं ज़्यादा उसमें औषधीय गुण होते हैं। यह सबसे पुराना सुगन्धित पुष्प हैजो मनुष्य के द्वारा उगाया जाता था। इसके विभिन्न प्रकार के सुन्दर फूल जो कि आर्कषकआकृतिविभिन्न आकारमन को लुभाने वाले रंगों और अपने विभिन्न उपयोगिताओं के कारण एक महत्त्वपूर्ण पुष्प माना जाता है।

गुलाब की उपज भूमि की उर्वरा शक्ति फसल की देखरेख एवं प्रजातियों पर निर्भर करती हैफूलों का गुण हैं खिलनाखिल कर महकनासुगंध बिखेरनासौंदर्य देना और अपने देखने वाले को शांति प्रदान करना। फूलों की इस खूबसूरत दुनिया में गुलाब का एक ख़ास स्थान  है क्योंकि इसे सौंदर्यसुगंध और खुशहाली  का प्रतीक  माना गया है। तभी तो इसे 'पुष्प सम्राटकी  संज्ञा दी गयी है और 'गुले-आप', यानी फूलों की रौनक भी कहा गया है। इस की भीनीभीनी मनमोहक सुगंधसुन्दरतारंगों की विविध किस्मों के कारण हर प्रकृति  प्रेमी इसे अपनाना चाहता है।

भारत में गुलाब हर जगह उगाया जाता है। बागबगीचोंखेतोंपार्कोंसरकारी व निजी इमारतों के अहातों मेंयहाँ तक कि घरों की ग्रह-वाटिकाओं की क्यारियों और गमलों में भी गुलाब उगा कर उस का आनंद लिया जाता है। गुलाब पूरे उत्तर भारत मेंखासकर राजस्थान में तथा बिहार और मध्य प्रदेश में जनवरी से अप्रैल तक खूब खिलता है। दक्षिण भारत में खासतौर पर बंगलौर में और महारास्ट्र और गुजरात में भी गुलाब की भरपूर खेती होती है।

गुलाब को घर पर गमले में खिड़की की मंजूषा मेंरसोई बगीचे की क्यारी मेंआँगन में उगाने के लिए पर्याप्त धूप का होना एक आवश्यक शर्त है। गुलाब को दिन में कम से कम छः से आठ घंटे की खुली धूप होना आवश्यक है। गुलाब के पौधों के लिए पर्याप्त जीवांशयुक्त मिट्टी अच्छी होती है। बहुत चिकनी मिट्टी इसके अनुकूल नहीं होती है। मिट्टी का जल निकास और वायुसंचार सुचारु होना चाहिए। भूमि में हल्की नमी बनी रहना चाहिए।

गुलाब को विश्वभर में पसंद किया जाता है। इस पर व्यापक अनुसंधान एवं विकास कार्य किए गए हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गुलाब प्रेमियों के संगठन हैंजो नई किस्मों के विकासपरिचिन्हनमानकीकरण आदि करते हैं। इसके अनुसार पौधों की बनावटऊँचाईफूलों के आकार आदि के आधार पर इन्हें निम्न वर्गों में बाँटा गया है।

गुलाब का व्यवसाय

गुलाब की खेती व्यावसायिक स्तर पर करके काफी लाभ कमाया जा सकता है। गुलाब की खेती बहुत पहले से पूरी दुनिया में की जाती हैइसकी खेती पूरे भारतवर्ष में व्यवसायिक रूप से की जाती हैगुलाब के फूल डाली सहित या कट फ्लावर तथा पंखुड़ी फ्लावर दोनों तरह के बाजार में व्यापारिक रूप से पाये जाते हैगुलाब की खेती देश व् विदेश निर्यात करने के लिए दोनों ही रूप में बहुत महत्वपूर्ण हैगुलाब को कट फ्लावरगुलाब जलगुलाब तेलगुलकंद आदि के लिए उगाया जाता हैगुलाब की खेती मुख्यतः कर्नाटकतमिलनाडुमहाराष्ट्राबिहारपश्चिम बंगाल ,गुजरातहरियाणापंजाबजम्मू एवं कश्मीरमध्य प्रदेशआंध्रा प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश में अधिक की जाती हैI

फूल के हाट में गुलाब के गजरे खूब बिकते हैं। गुलाब की पंखुडियों और शक्कर से गुलकन्द बनाया जाता है। गुलाब जल और गुलाब इत्र के कुटीर उद्योग चलते है। उत्तर प्रदेश में कन्नौजजौनपुर आदि में गुलाब के उत्पाद की उद्योगशाला चलती है। दक्षिण भारत में भी गुलाब के उत्पाद के उद्योग चलते हैं। दक्षिण भारत में गुलाब फूलों का खूब व्यापार होता है। मन्दिरोंमण्डपोंसमारोहोंपूजा-स्थलों आदि स्थानों में गुलाब फूलों की भारी खपत होती है। यह अर्थिक लाभ का साधन है। वहाँ हजारों ग्रामीण युवा फूलों  को अपनी आय का माध्यम बना लेते हैं।

गुलाब की किस्में

भारत में उगाई जाने वाली गुलाब की परम्परागत किस्में हैंजो देश के अलगअलग इलाकों में उगाई जाते हैंविदेशों से भी अलगअलग किस्में मांगा कर उन का 'संकरण' (2 किस्मों के बीच क्रास) कर  के अनेक नई व उन्नत किस्में तैयार की गयी हैंजो अब अपने देश में बहुत लोकप्रिय हैं।

गुलाब की विदेशी किस्में जर्मनीजापानफ्रासइंग्लैण्डअमेरिकाआयरलैंडन्यूजीलैंड और आस्ट्रेलिया से मंगाई गयी हैं। भारतीय गुलाब विशेषज्ञों ने देशी किस्मों में भी नयी विकसित 'संकर' (हाईब्रिड) किस्में जोड़ कर गुलाब की किस्मों की संख्या में वृद्धि की है। इस दिशा में दिल्ली स्थित भारती कृषि अनुसंधान संस्थान का अनुसंधान कार्य ख़ास उल्लेखनीय है। दक्षिण भारत में भारतीय बागबानी अनुसंधान संसथानबंगलौर ने भी किस्मों के विकास और  वृद्धि में भरपूर कार्य किया है।

मात्र शौक और सजावट के लिये गुलाब का पौधा जब गमले में उगाया जाए तो किस्मों का चुनाव भी उसी के अनुसार किया जाना चाहिए। व्यावसायिक स्तर पर गुलाब की खेती करनी  हो तो वैसी ही किस्मों का चयन करें। इस बारे में प्राय: सभी बड़ी नर्सरियों में पूरी जानकारी मिल सकती है। दिल्ली में हों तो भारतीय कृषि अनुसंधान पूसा के पुष्प विज्ञान विभाग से उचित जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

वैसे तो विश्व भर में गुलाब की किस्मों की संख्या लगभग 20 हजार से अधिक हैजिन्हें विशेषज्ञों ने विभिन्न वर्गों में बांटा है लेकिन तक्तीकी तौर पर गुलाब के मुख्य वर्ग हैंजिन का फूलों के रंगआकारसुगंध और प्रयोग के अनुसार विभाजन किया गया हैजो इस प्रकार  है: हाईब्रिड टीजफ्लोरीबंडापोलिएन्था वर्गलता वर्ग और मिनिएचर वर्ग।

हाईब्रिड टीज वर्ग

यह बड़े आकार के गुलाबों का एक महत्वपूर्ण वर्ग हैजिस में टहनी के ऊपर या सिरे पर एक ही फूल खिलता हैइस वर्ग की अधिकतर किस्में यूरोप और छीन के 'टीगुलाबों के 'संकर' (क्रास) से तैयार की गयी हैइस वर्ग की भारतीय किस्में हैं : डा.होमी भाभाचितवनभीमचित्रलेखाचंद्बंदीकलीगुलजारमिलिंदमृणालिनीरक्त्गंधासोमासुरभीनूरजहाँमदहोशडा. बैंजमन पाल आदि।

हाइब्रिड टी (एचटी),इस वर्ग के पौधे ब़ड़ेऊँचे व तेजी से ब़ढ़ने वाले होते हैं। इस वर्ग की प्रमुख किस्में अर्जुनजवाहररजनीरक्तगंधासिद्धार्थसुकन्या आदि हैं। इनके पुष्प शाखा के सिरे पर ब़ड़े आकर्षक लगते हैं। एक शाखा के सिरे पर एक ही फूल आता है।

फ्लोरीबंडा वर्ग

यह हाईब्रिड टीज और पोलिएन्था गुलाबों के संकर (मिलन) से विकसित किये गए गुलाबों का वर्ग है। इस के फूल उपेक्षाकृत छोटे किन्तु गुच्छों में खिलतें हैं और आकार व वजन में बढ़िया होते हैं। इस वर्ग के फूल गृहवाटिका  की क्यारियों और गमलों में ज्यादा देखने को मिलते हैं। इस किस्म की विशेषता है कि इन के पौधे कम जगह में ही उगा कर पर्याप्त फूल प्राप्त किये जा सकते हैं। ठन्डे मौसम में जब दूसरे  गुलाब नहीं खिलते हैंइस वर्ग के फूल दिल्ली सहित उत्तर भारत के सभी राज्यों में खूब खिलते हैं। इस की मुख्य किस्में हैं : दिल्लीप्रिन्सिसबंजारनकरिश्माचन्द्रमाचित्तचोरदीपिकाकविताजन्तार्मंतरसदाबहारलहरसूर्यकिरणसमरबहिश्तआइसबर्गशबनम आदि।

फ्लोरीबंडाइसके पौधे मध्यम लंबाई वाले होते हैंइनमें फूल भी मध्यम आकार के और कई फूल एक साथ एक ही शाखा पर लगते हैं। इनके फूलों में पंखुड़ियों की संख्या हाइब्रिड टी के फूलों की अपेक्षा कम होती हैं। इस वर्ग की प्रमुख किस्में बंजारनआम्रपालीज्वालारांगोलीसुषमा आदि हैं।

ग्रेन्डीफ्लोरा

यह उपरोक्त दोनों किस्मों के संयोग से तैयार किया गया है। गुलदानों में इस वर्ग के फूलों को अधिक पसंद किया जाता है। बड़े स्तर पर खेती के लिए इस वर्ग का अधिक उपयोग किया जाता है। गोल्ड स्पॉटमांटेजुआक्वीन एलिजाबेथ इस वर्ग की प्रचलित किस्में हैं।

पॉलिएन्था

इस वर्ग के पौधों को घरेलू बगीचों व गमलों में लगाने के लिए पसंद किया जाता है। क्योंकि इनमें मध्यम आकार के फूल अधिक संख्या में साल में अधिक समय तक आते रहते हैं। इस वर्ग की प्रमुख किस्में स्वातिइकोअंजनी आदि हैं।

मिनिएचर वर्ग

इस के पौधेपट्टियां  और फूल सभी छोटे  होते हैं। पौधे कलामों द्वार उगे जाते हैं। यह गमलोंपतियों आदि में उगाने की उपयुक्त किस्म है। गृहवाटिका की क्यारियों के चारों ओर बार्डर लगाने के लिये भी उपयुक्त है। गुलाब के फूल खिलने का मौसम (अक्टूबर से मार्च) में इस किस्म के गुलाब खूब खिलते हैं। विभिन्न रंगों में ये गुच्छों और डंडियों पर अलग भी उगते हैं। बेबी डार्लिंगबेबी गोल्डस्टारग्रीन इसेब्यूटी सीकृतईस्टर मार्निंगसंड्रीलो आदि इस की लोकप्रिय किस्में हैं।

मिनीएचर,जैसा कि इसके नाम से स्पष्ट हैये कम लंबाई के छोटे बौने पौधे होते हैं। इनकी पत्तियों व फूलों का आकार छोटा होने के कारण इन्हें बेबी गुलाब भी कहते हैं। ये छोटे किंतु संख्या में बहुत अधिक लगते हैं। इन्हें ब़ड़े शहरों में बंगलोंफ्लैटों आदि में छोटे गमलों में लगाया जाना उपयुक्त रहता हैपरंतु धूप की आवश्यकता अन्य गुलाबों के समान छः से आठ घंटे आवश्यक है। इस वर्ग की प्रमुख किस्में ड्वार्फ किंगबेबी डार्लिंगक्रीकीरोज मेरिनसिल्वर टिप्स आदि हैं।

लता वर्ग  (क्लैंग्बिंग एंड रैंबलिंग रोज)

इस वर्ग के गुलाब के पौधे लताओं के रोप में बढ़ते हैं और पैराबोला पर या दीवार का सहारा पा कर बढ़ते हैं। ये साल में केवल एक बार खिलते हैं।

ये गुलाब की बेल (लता) वाली किस्में हैं। इन्हें मेहराब या अन्य किसी सहारे के साथ चढ़ाया जा सकता है। इनमें फूल एक से तीन (क्लाइंबर) व गुच्छों (रेम्बलर) में लगते हैं। इस की मुख्य किस्में है सदाबहारसमर स्नोडा.होमी भाभामार्शल नीलदिल्ली वाईट पर्ल आदि।

क्लाइंबर वर्ग की प्रचलित किस्में गोल्डन शावरकॉकटेलरायल गोल्ड और रेम्बलर वर्ग की एलवटाइनएक्सेलसाडोराथी पार्किंस आदि हैं।

गुलाब में जितने रंगों के फूल देखने को मिलते हैं उतने शायद किसी दूसरे फूल में नहीं। यदि सफ़ेद गुलाब हैं तो पीलेलालनारंगीलालरक्त्लालगुलाबी लेवेंडर रंग के दोरंगेतींरंगे और यहाँ तक कि अब तो नीले और काले रंग के गुलाब भी पाए जाते है।

गुलाब की खेती के लिए जलवायु और भूमि

गुलाब की खेती उत्तर एवं दक्षिण भारत के मैदानी एवं पहाड़ी क्षेत्रों में जाड़े के दिनों में की जाती हैदिन का तापमान 25 से 30 डिग्री सेंटीग्रेट तथा रात का तापमान 12 से 14 डिग्री सेंटीग्रेट उत्तम माना जाता हैगुलाब की खेती हेतु दोमट मिट्टी तथा अधिक कार्बनिक पदार्थ वाली होनी चाहिएजिसका पी.एच. मान 5.3 से 6.5 तक उपयुक्त माना जाता हैI

गुलाब की उन्नतशील प्रजातियां

गुलाब की लगभग प्रकार की प्रजातियां पाई जाती है प्रथम संकर प्रजातियां जिसमे कि क्रिमसन ग्लोरीमिस्टर लिंकनलवजानअफकैनेडीजवाहरप्रसिडेंटराधाकृषणनफर्स्ट लव पूजासोनियागंगाटाटा सैंटानरीआर्किडसुपर स्टारअमेरिकन हेरिटेज आदि हैदूसरे प्रकार कि पॉलीएन्था इसमे अंजनीरश्मीनर्तकीप्रीत एवं स्वाती आदितीसरे प्रकार कि फ़लोरीबण्डा जैसी कि बंजारनदेहली प्रिंसेजडिम्पलचन्द्रमासदाबहारसोनोरानीलाम्बरीकरिश्मा सूर्यकिरण आदिचौथे प्रकार कि गैंडीफलोरा इसमे क्वींसमांटेजुमा आदिपांचवे प्रकार कि मिनीपेचर ब्यूटी क्रिकेटरेड फ्लसपुसकलाबेबीगोल्ड स्टारसिल्वर टिप्स आदि और अंत में छठवे प्रकार कि लता गुलाब इसमे काक्लेटब्लैक बॉयलैंड मार्कपिंक मेराडोनमेरीकलनील आदि पाई जाती हैI

गुलाब के खेतों की तैयारी

सुंदरता की दृष्टि से औपचारिक लेआउट करके खेत को क्यारियों  में बाँट लेते है क्यारियों  की लम्बाई चौड़ाई मीटर लम्बी मीटर चौड़ी रखते हैदो क्यारियों  के बीच में आधा मीटर स्थान छोड़ना चाहिएक्यारियों  को अप्रैल मई में एक मीटर की गुड़ाई एक मीटर की गहराई तक खोदे और 15 से 20 दिन तक खुला छोड़ देना चाहिएक्यारियों  में 30 सेंटीमीटर तक सूखी पत्तियो को डालकर खोदी गयी मिट्टी से क्यारियों  को बंद कर देना चाहिए साथ ही गोबर की सड़ी खाद एक महीने पहले क्यारी में डालना चाहिए इसके बाद क्यारियों  को पानी से भर देना चाहिए साथ ही दीमक के बचाव के लिए फ़ालीडाल पाउडर या कार्बोफ्यूरान जी. का प्रयोग करेलगभग 10 से 15 दिन बाद ओठ आने पर इन्ही क्यारियों  में कतार बनाते हुए पौधे व् लाइन से लाइन की दूरी 30 गुने 60 सेंटीमीटर रखी जाती हैइस दूरी पर पौधे लगाने पर फूलों  की डंडी लम्बी व् कटाई करने में आसानी रहती हैI

गुलाब की खेती करने के लिए पौध तैयार करना

आमतौर पर जुलाई-अगस्त में मानसून आते ही  गुलाब लगाया जाता है। सितम्बर-अक्टूबर में तो यह भरपूर उगाया जाता है। गुलाब लगाने की सम्पूर्ण विधि और प्रक्रिया अपनाई जाए तो यह फूल मार्च तक अपने सौंदर्यसुगंध और रंगों से न केवल हमें सम्मोहित करता है बल्कि लाभ भी देता है।

जंगली गुलाब के ऊपर टी बडिंग द्वारा इसकी पौध तैयार होती हैजंगली गुलाब की कलम जून-जुलाई में क्यारियों  में लगभग 15 सेंटीमीटर की दूरी पर लगा दी जाती हैनवम्बर से दिसंबर तक इन कलम में टहनियां निकल आती है इन पर से कांटे चाकू से अलग कर दिए जाते हैजनवरी में अच्छे किस्म के गुलाब से टहनी लेकर टी आकार कालिका निकालकर कर जंगली गुलाब की ऊपर टी में लगाकर पालीथीन से कसकर बाँध देते हैज्यो-ज्यो तापमान बढता है तभी इनमे टहनी निकल आती हैजुलाई अगस्त में रोपाई के लिए पौध तैयार हो जाती हैI

पौधशाला से सावधानीपूर्वक पौध खोदकर सितम्बर-अक्टूबर तक उत्तर भारत में पौध की रोपाई करनी चाहिएरोपाई करते समय ध्यान दे कि पिंडी से घास फूस हटाकर भूमि की सतह से 15 सेंटीमीटर की ऊंचाई पर पौधों की रोपाई करनी चाहिएपौध लगाने के बाद तुरंत सिंचाई कर देना चाहिएI

गुलाब की खेती में खाद और उर्वरकों की आवश्यकता

उत्तम कोटि के फूलों  की पैदावार लेने के हेतु प्रूनिंग के बाद प्रति पौधा 10 किलोग्राम गोबर की सड़ी खाद मिट्टी में मिलाकर सिंचाई करनी चाहिएखाद देने के एक सप्ताह बाद जब नई कोपल फूटने लगे तो 200 ग्राम नीम की खली 100 ग्राम हड्डी का चूरा तथा रासायनिक खाद का मिश्रण 50 ग्राम प्रति पौधा देना चाहिएमिश्रण का अनुपात एक अनुपात दो अनुपात एक मतलब यूरियासुपर फास्फेटपोटाश का होना चाहिएI

गुलाब की देखभाल

गुलाब के लिए सिंचाई का प्रबंधन उत्तम होना चाहिएआवश्यकतानुसार गर्मी में से दिनों के बाद तथा सर्दी में 10 से 12 दिनों के बाद सिंचाई करते रहना चाहिएI

उत्तर प्रदेश के मैदानी भागो में कटाई-छटाई हेतु अक्टूबर का दूसरा सप्ताह सर्वोत्तम होता है लेकिन उस समय वर्षा नहीं होनी चाहिएपौधे में तीन से पांच मुख्य टहनियों को 30 से 40 सेंटीमीटर रखकर कटाई की जाती हैयह ध्यान रखना चाहिए कि जहाँ आँख हो वहाँ से सेंटीमीटर ऊपर से कटाई करनी चाहिएकटे हुए भाग को कवकनाशी दवाओ से जैसे कि कापर आक्सीक्लोराइडकार्बेन्डाजिमब्रोडोमिश्रण या चौबटिया पेस्ट का लेप लगना आवश्यक होता हैI

गमलों के लिये मिट्टी का मिश्रण कुछ इस तरह से रखें। भाग खेत की मिटटीएक भाग खूब सड़ी गोबर की खादएक भाग में सूखी हरी पत्ते की खाद (लीफ मॉल्ड) और लकड़ी  का बुरादा मिला लें। सम्भव हो तो कुछ मात्रा में हड्डी का चुरा भी मिला लें। इस से पौधों और जड़ों का अच्छा विकास होता है।

याद रहे कि गमलों में पौधों का रखरखाव वैसा ही होजैसी कि क्यारियों में होता हैउन की उचित निराईगुडाई में होता है। मसलनपौधों को पूरी खुराक मिलेउन की उचित निराईगुडाई और सिंचाई होकीट व्याधियों से बचाव होगमलों के पौधों को मौसम के अनुसार समय-समय पर पानी दिया जाए और उन की कटाईछंटाई  भी की जाए। सप्ताह में एक बार गमलों की दिशा भी अवश्य बदलें और उन के तले से पानी निकलने का चित्र भी उचित रूप से खुला रखें।

गुलाब में माहूदीमक एवं सल्क कीट लगते हैमाहू तथा सल्क कीट के दिखाई देने पर तुरंत डाई मिथोएट 1.5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में या मोनोक्रोटोफास मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में घोलकर 2 -3 छिड़काव करना चाहिएदीमक के नियंत्रण हेतु सिंचाई करनी चाहिए तथा फोरेट 10 जी. से ग्राम या फ़ालीडाल 2% धुल 10 से 15 ग्राम प्रति पौधा गुड़ाई करके भूमि में अच्छी तरह मिला देना चाहिएI

गुलाब के फूलों की कटाई

सफ़ेदलालगुलाबी रंग के फूलों  की अध् खुली पंखुड़ियों में जब ऊपर की पंखुड़ी नीचे की ओर मुड़ना शुरू हो जायें  तब फूल काटना चाहिएफूलों  को काटते समय एक या दो पत्तियां टहनी पर छोड़ देना चाहिए जिससे पौधों की वहाँ से बढ़वार होने में कोइ परेशानी न हो सकेफूलों  की कटाई करते समय किसी बर्तन में पानी साथ में रखना चाहिए जिससे फूलों  को काटकर पानी तुरंत रखा जा सकेबर्तन में पानी कम से कम 10 सेंटीमीटर गहरा अवश्य होना चाहिए जिससे फूलों  की डंडी पानी में डूबी रहे पानी में प्रिजर्वेटिव भी मिलाते हैफूलों  को कम से कम घंटे पानी में रखने के बाद ग्रेडिंग के लिए निकालना चाहिएयदि ग्रेडिंग देर से करनी हो तो फूलों  को से डिग्रीसेंटीग्रेट तापक्रम पर कोल्ड स्टोरेज रखना चाहिए जिससे कि फूलों  की गुणवत्ता अच्छी रह सकेI

गुलाब के पौधे गृहवाटिका में मिटटी के गमलों में आसानी से उगे जा सकते हैंजो कम से कम 30 सेंटीमीटर घेरे के और उतने ही गहरे हों। मिनिएचर गुलाब के लिये 20 से 25 सेंटीमीटर आकार के गमले पर्याप्त हैं। गमलों को स्वच्छ  वातावरण में रखा जाए। जैसे ही नयी कोपलें और शाखाएं अंकुरित होने लगेंउन्हें  ही सूरज की रोशनी में रखें। दिन भर इन्हें 4-5 घंटे धूप अवश्य मिलनी चाहिए। हाँगरमी की कड़कती धूप में 1-2 घंटे ही पर्याप्त हैं।

जब जहाँ भी चारों ओर गुलाब खिलता है तो सब ओर इस की सुरभि व्याप्त हो जाती है। फरवरी-मार्च में गुलाब अपने पूर्ण यौवन और बहार पर होता है। आओइसे अपनी गृहवाटिका में उगायें और इस के सौंदर्य और महक का आनंद लें।

गुलाब की खेती के लिए आवश्यक सावधानियां

  • बरसात के मौसम में गमलों और क्यारियों में बहुत देर तक पानी भरा न रहने दें।
  • हर सालपौधों की छंटाई करगमले के ऊपर की 2-3 इंच मिट्टी निकाल कर उस में उतनी ही गोबर की सड़ी खाद भर दें।
  • हर 2-3 साल के बाद सम्पूर्ण पौधे को मिट्टी सहित नए गमले में ट्रांसफर कर दें। चाहें तो गमले की मिट्टी बदल कर ताजा मिश्रण भरें।

यह प्रक्रिया सितम्बर-अक्टूबर में करें।

भूमिका

भारत में पुष्प व्यवसाय में गेंदा का महत्त्वपूर्ण स्थान है क्योंकि इसका धार्मिक तथा सामाजिकGendaअवसरों पर वृहत रूप में व्यवहार होता है। गेंदा फूल को पूजा अर्चना के अलावा शादी-व्याहजन्म दिनसरकारी एवं निजी संस्थानों में आयोजित विभिन्न समारोहों के अवसर पर पंडालमंडप-द्वार तथा गाड़ीसेज आदि सजाने एवं अतिथियों के स्वागतार्थ मालाबुकेफूलदान सजाने में भी इसका प्रयोग किया जाता है।

गेंदा के फूल उपयोग मुर्गी के भोजन के रूप में भी आजकल बड़े पैमाने पर हो रहा है। इसके प्रयोग से मुर्गी के अंडे की जर्दी का रंग पीला हो जाता हैजिससे अंडे की गुणवत्ता तो बढ़ती ही हैसाथ ही आकर्षण भी बढ़ जाता है।

गेंदा के औषधीय गुण

अपनी औषधीय गुणों के कारण गेंदा का एक खास महत्व है। गेंदा के औषधीय गुण निम्नलिखित है:

  1. कान दर्द में गेंदा के हरी पत्ती का रस कान में डालने पर दर्द दूर हो जाता है।
  2. खुजलीदिनाय तथा फोड़ा में हरी पत्ती का रस लगाने पर रोगाणु रोधी का काम करती है।
  3. अपरस की बीमारी में हरी पत्ती का रस लगाने से लाभ होता है।
  4. अंदरूनी चोट या मोच में गेंदा के हरी पत्ती के रस से मालिश करने पर लाभ होता है।
  5. साधारण कटने पर पत्तियों को मसलकर लगाने से खून बहना बंद हो जाता है।
  6. फूलों का अर्क निकालकर सेवन करने से खून शुद्ध होता है।
  7. ताजे फूलों का रस खूनी बवासीर के लिए बहुत उपयोगी होता है।

भूमि

गेंदा की खेती के लिए दोमटमटियार दोमट एवं बलुआर दोमट भूमि सर्वोत्तम होती है जिसमें उचित जल निकास की व्यवस्था हो।

भूमि की तैयारी

भूमि  को समतल करने के बाद एक बार मिट्टी पलटने वाले हल से तथा 2-3 बार देशी हल या कल्टीवेटर से जुताई करके एवं पाटा चलाकरमिट्टी को भुरभुरा बनाने एवं कंकर पत्थर आदि को चुनकर बाहर निकाल दें तथा सुविधानुसार उचित आकार की क्यारियां बना दें।

व्यवसायिक किस्में

अधिक उपज लेने के लिए परम्परागत किस्मों की जगह केवल सुधरी किस्में ही बोनी चाहिए। गेंदा की कुछ प्रमुख उन्नत किस्में निम्न है:

  1. अफ्रीकन गेंदा: इसके पौधे अनेक शाखाओं से युक्त लगभग मीटर तक ऊँचे होते हैंइनके फूल गोलाकारबहुगुणी पंखुड़ियों वाले तथा पीले व नारंगी रगं का होता है। बड़े आकार के फूलों का व्यास 7-8 सेमी. होता है। इसमें कुछ बौनी किस्में भी होती हैजिनकी ऊंचाई सामान्यतः 20 सेमी. तक होती है।

अफ्रीकन गेंदा के अंतर्गत व्यवसायिक दृष्टिकोण से उगाये जाने वाले प्रभेद-पूसा नांरगीपूसा बंसन्तुअफ्रीकन येलो इत्यादि है।

2. फ्रांसीसी गेंदा: इस प्रजाति की ऊंचाई लगभग 25-30 सेंमी. तक होती है इसमें अधिक शाखाएं नहीं होती है किन्तु इसमें इतने अधिक पुष्प आते हैं कि पूरा का पूरा पौधा ही पुष्पों से ढँक जाता है। इस प्रजाति के कुछ उन्नत किस्मों में रेड ब्रोकेटकपिड येलोबोलरोबटन स्कोच इत्यादि है।

खाद एवं उर्वरक

गेंदा की अच्छी उपज हेतु खेत की तयारी से पहले 200 किवंटल कम्पोस्ट प्रति हेक्टयेर की दर से मिट्टी में मिला दें। तत्पश्चात 120-160 किलो नेत्रजन, 60-80 किलो फास्फोरस एवं 60-80 किलोग्राम पोटाश का प्रयोग प्रति हेक्टेयर की दर से करें। नेत्रजन की आधी मात्रा एवं फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा खेत की अंतिम जुताई के समय मिट्टी  में मिला दें। नेत्रजन की शेष आधी मात्रा पौधा रोप के 30-40 दिन के अंदर प्रयोग करें।

प्रसारण

गेंदा का प्रसारण बीज एवं कटिंग दोनों विधि से होता है इसके लिए 300-400 ग्राम बीज प्रति हेक्टेयर के आवश्यकता होती है जो 500 वर्ग मीटर के बीज शैय्या में तैयार किया जाता हीबीज शैय्या में बीज की गहराई सेमी. से अधिक नहीं होना चाहिए। जब कटिंग द्वारा गेंदा का प्रसारण किया जाता है उसमें ध्यान  रखना चाहिए कि हमेशा कटिंग नये स्वस्थ पौधे से लें जिसमें मात्र 1-2 फूल खिला होकटिंग का आकार इंच (10 सेंमी.) लंबा होना चाहिए। इस कटिंग पर रुटलेक्स लगाकर बालू से भरे ट्रे में लगाना चाहिए। 20-22 दिन बाद इसे खेत में रोपाई करना चाहिए।

रोपाई

गेंदा फूल खरीफरबीजायद तीनों सीजन में बाजार की मांग के अनुसार उगाया जाता है। लेकिन इसके लगाने के उपयुक्त समय सितम्बर-अक्तूबर है। विभिन्न मौसम में अलग-अलग दूरी पर गेंदा लगाया जाता है जो निम्न है:

खरीफ (जून से जुलाई)  - 60 x 45 सेमी.

रबी (सितम्बर-अक्तूबर) – 45 x 45 सेमी.

जायद (फरवरी-मार्च) – 45 x 30 सेमी.

सिंचाई

खेत की नमी को देखते हुए 5-10 दिनों के अंतराल पर गेंदा में सिंचाई करनी चाहिए। यदि वर्षा हो जाए तो सिंचाई नहीं करना चाहिए।

पिंचिग

रोपाई के 30-40 दिन के अंदर पौधे की मुख्य शाकीय कली को तोड़ देना चाहिए। इस क्रिया से यद्यपि फूल थोड़ा देर से आयेंगेपरन्तु प्रति पौधा फूल की संख्या एवं उपज में वृद्धि होती है।

निकाई-गुडाई

लगभग 15-20 दिन पर आवश्यकतानुसार निकाई-गुड़ाई करनी चाहिए। इससे भूमि में हवा का संचार ठीक रगं से होता है एवं वांछित खरपतवार नष्ट हो जाते हैं।

फूल की तोड़ाई

रोपाई के 60 से 70 दिन पर गेंदा में फूल आता है जो 90 से 100 दिनों तक आता रहता है। अतः फूल की तुड़ाई साधारनतया सांयकाल में की जाती है। फूल को थोड़ा डंठल के साथ तोड़ना श्रेयस्कर होता है।

फूलों की पैकिंग

फूल का कार्टून जिसमें चारों तरफ एवं नीचे में अखबार फैलाकर रखना चाहिए एवं ऊपर से फिर अखबार से ढँक कर कार्टून बंद करना चाहिए।

कीड़े

लीफ हापररेड स्पाइडरइसे काफी नुकसान पहुंचाते हैं। इसके रोकथाम के लिए मैलाथियान 0,1% का छिड़काव करें।

बीमारी

गेंदा में मोजेकचूर्णी फफूंद एवं फुटराट मुख्य रूप से लगता है। मोजेक लगे पौधे को उखाड़कर मिट्टी तले दबा दें एवं गेंदा में कीटनाशक दवा का छिड़काव करें जिससे मोजेक के विषाणु स्थानांतरित करने वाले कीट का नियंत्रण हो इसका विस्तार एवं दूसरे पौधे में न हो। चूर्णी फुफुन्द के नियंत्रण हेतु 0.२% गंधक का छिड़काव करें एवं फुटराट के नियंत्रण हेतु इंडोफिल एम -45 0.25% का २-बार छिड़काव करें।

उपज

80-100 किवंटल फूल/हेक्टेयर।

परिचय

जरबेरा अपनी सुन्दरता के कारण दस महत्वपूर्ण कर्त्तन फूलों में एक अलग स्थान रखता है। व्यापारिक फूलों में इसे बहुत ही पसंद किया जाता है। विभिन्न रंगों में पाए जाने के कारण इसे क्यारियोंगमलों और रॉक गार्डेन में लगाया जाता है।

उत्पत्ति

जरबेरा बहुवर्षीयतना रहित पौधा है। इस फूल का उत्पत्ति स्थान दक्षिण अफ्रीका और एशिया महाद्वीप माना जाता है। यह एस्टेरेसी कुल का पौधा है। जरबेरा वंश में 40 जातियाँ पाई जाती हैंजिनमें सिर्फ जरबेरा जेमीसोनी जाति को ही फूलों के लिए लगाया जाता है। यह एस्टेरेसी कुल का पौधा है।

किस्म

व्यापारिक स्तर से विश्व में निम्नलिखित किस्मों को लगाया जाता है – डस्टी (लाल)फ्लेमिन्गो (पेल रोज)फ्रेडेजी (गुलाबी)फ्रेडकिंग (पीला)फ्लोरिडा (लाल)मारोन क्लेमेंटीन (नारंगी)नाड्जा (पीला)टेराक्वीन (गुलाबी)युरेनस (पीला)वेलेन्टाइन (गुलाबी)वेस्टा (लाल) इत्यादि।

मिट्टी एवं जलवायु

फूलों की अच्छी पैदावार के लिए जल निकास वाली उपजाऊहल्की और उदासीन से हल्की क्षारीयhttps://static.vikaspedia.in/media/images_hi/agriculture/crop-production/91d93e930916902921-915947-93293f90f-90592894193690293893f924-91594393793f-924915928940915/91d93e930916902921-92e947902-92b94293294b902-915940-916947924940/Jarbera.jpgमिट्टी उपयुक्त होती है। मिट्टी का पी. एच. मान 5.0 से 7.2 रहने पर फूल अधिक खिलते हैं तथा फूल के डंठल लम्बे निकलते हैं।

जरबेरा उष्ण और समशीतोष्ण जलवायु में खुली जगहों पर लगाया जाता हैपरन्तु शीतोष्ण जलवायु में इसे हरित घर में लगाया जाता है। यह पौधा ठंडे मौसम में धूप पसंद करता है तथा गर्मी के मौसम में हल्की छाया की जरूरत होती है। जाड़े में खराब रोशनी से फूल कम खिलते हैं।

पौध रोपण

जरबेरा के पौधे को से 1.2 मीटर चौड़ी तथा 20 सें. मी. ऊँची क्यारियों में 30 30 सें.मी. की दूरी पर रोपना चाहिए। पौधा रोपने के पहले क्यारियों की लम्बाई अपनी आवश्यकता अनुसार रखकर उसमें प्रचुर मात्रा में कार्बनिक खाद या पत्ती खादया केचुआ खाद इत्यादि मिलाना चाहिए तथा उस बेड को रासायनिक दवा से उपचारित कर ही उसमें पौधे को लगाना चाहिएनहीं तो रोग लगने की संभावना बढ़ जाती है। जून-जुलाई में पौधा लगाने से फूल अधिक खिलते हैं।

खाद एवं उर्वरक

जल निकास वाले माध्यम में जरबेरा को जमीन और गमले में लगा सकते है। खाद एवं उर्वरक का प्रयोग समय-समय पर करने से पौधे विकास और वृद्धि के साथ फूल उत्पादन भी अच्छा करते है। खाद एवं उर्वरक का उपयोग मिट्टी जाँच के आधार पर करना चाहिए।

अच्छे फूल उत्पादन के लिए 1000 वर्ग मीटर जगह में 13 कि.ग्रा. यूरिया, 25 कि.ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट और 10 कि. ग्राम म्यूरेट ऑफ़ पोटाश प्रत्येक महीना के हिसाब से वानस्पतिक वृद्धि के लिए महीना तक देते रहते है। वानस्पतिक वृद्धि पूर्ण होने के बाद 13 कि.ग्राम यूरिया, 25 कि.ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट तथा 13 कि.ग्रा. म्यूरेट ऑफ़ पोटाश इतनी ही जगह में महीना तक प्रत्येक महीना देते हैं। सूक्ष्म पोषक तत्व में बोरोनजिंककैल्सियममैग्निशियम का प्रयोग करने पर फूल की गुणवत्ता अच्छी होती है।

प्रसारण

जरबेरा का प्रसारण बीज एवं वानस्पतिक विधि द्वारा किया जाता है। बीज से प्रसारण में फूलों की गुणवत्ता में परिवर्तन होने के कारण इसका प्रसारण वानस्पतिक विधि के विभाजनकर्त्तन या उत्तक संवर्धन से करने पर मातृ पौधे जैसे फूलों का उत्पादन होता है।

(1) बीज द्वारा: फूलों में बीज बनने की प्रक्रिया 10 से 12 बजे सुबह परागण द्वारा उष्ण एवं धूपयुक्त जगहों पर होती है। अप्राकृतिक ढंग से परागण से अधिक मात्रा में बीज बनते हैं। बीज को जल्द से जल्द निकाल कर अंकुरण कराने पर अंकुरण अच्छा होता है। बीज के अंकुरण में 5-6 सप्ताह का समय लगता हैजो डेढ़ से दो साल में फूल देते हैं।

(2) विभाजन: जब पौधे गुच्छे में हो जाते हैं तब बरसात के मौसम में पौधे का विभाजन कर पौधे बनाए जाते हैं।

(3) कर्त्तन: जरबेरा के पौधे को सप्ताह पूर्व ही सिंचाई बंद कर उसकी जड़ों को काट देना चाहिए। तनों को ऐसा काटना चाहिए कि उसमें कलियाँ हों। उस कटे हुए भाग में रुटेक्स दवा का प्रयोग कर 25-300 सेंटीग्रेड तापमान तथा 80% आर्द्र वाली जगह पर लगा देना चाहिए। पौधे बनने में से महीने लगते हैं। इस प्रक्रिया से मातृ पौधे से 40-50 पौधे 2-3 महीने में बनाए जा सकते हैं।

(4) सूक्ष्म प्रसारण: उत्तक संवर्धन द्वारा रोग मुक्त पौधे तैयार किए जाते हैं। पौधे के अग्र भागकलियोंफूलों के उत्तक से उत्तक संवर्धन द्वारा प्रयोगशाला में नये पौधे तैयार किये जाते हैं।

सिंचाई

जरबेरा गहरी जड़ वाला पौधा होने के कारण इसमें हल्की सिंचाई की आवश्यकता हमेशा रहती हैं। किसी भी अवस्था में सिंचाई की कमी उसकी वृद्धिगुणवत्ता तथा फूल के उत्पादन को प्रभावित करती है। जाड़े में 10-12 दिनों के अंतराल पर तथा गर्मियों में 6-7 दिनों के अंतराल पर हल्की सिंचाई करते रहनी चाहिए। हरित घर में लगे पौधे की सिंचाई टपकन विधि से आवश्यकता अनुसार करते रहनी चाहिए।

गमले में जरबेरा

गमले में जरबेरा लगाने के लिए 20-25 सें.मी. का गमला लेना चाहिए। गमले में 70% गोबर खाद या केचुआ खाद या कोको पीट तथा 30% मिट्टी होने से पौधे स्वस्थ होते हैं तथा अधिक फूल देते हैं। समय-समय पर 200 मि. ग्राम नाइट्रोजन, 100 मि. ग्राम फास्फोरस और 300 मि. ग्राम पोटाश प्रति लीटर पानी में घोलकर सिंचाई करने से अधिक फूल खिलते हैं।

उपज

जरबेरा पौधा लगाने के तीन महीना बाद फूल खिलना शुरू हो जाता है। हरित घर में प्रति वर्ग मीटर में प्रति वर्ष 200-250 फूल का उत्पादन होता है। खुली जगहों पर 120-150 फूल/वर्ग मीटर/ वर्ष खिलते हैं। फूलों को सुबह या शाम के समय काटना चाहिए।

फूलदान जीवन

जरबेरा के कटे फूलों को फूलदान के पानी में 7% सुक्रोज, 25 मि. ग्राम सिल्वर नाइट्रेट और 200 मि. ग्रा. 8- हाइड्रोक्सिक्युनोलाइन साइट्रेट प्रति लीटर पानी में मिलाकर रखने से उन्हें सप्ताह तक ताजा रखा जा सकता है।

बीमारियाँ एवं रोकथाम

जरबेरा में रोग लगने से उपज प्रभावित होती है। कुछ मुख्य रोग और उसके उपचार निम्नलिखित है:

(1) जड़ गलन: यह रोग मिट्टी जनितपिथियम इरेगुलेरिया फफूंद के कारण होता है। इस रोग में पौधे की वृद्धि रुक जाती है तथा पौधे मर जाते हैं। कॉपर ऑक्सिक्लोराइट दवा के ग्राम/ली. पानी में बने घोल को जड़ों के आस पास देने से रोग को रोका जा सकता है।

(2) ब्लाइट: यह बीमारी ग्रेमोल्ड के नाम से जानी जाती है। यह रोग बोटराइटिस सिनेरिया फफूंद के कारण होता है जो नई कोशिकाओं को मार देता है। यह रोग घने पौधा लगाने तथा जल निकास की असुविधा होने पर ज्यादा लगता है। बेनलेट या वेविस्टीन दवा का ग्राम/ली. पानी में बने घोल का छिड़काव करना लाभप्रद होता है।

(3) पाउडरी मिल्ड्यू: यह रोग इरिस्फी चिचोरेसिएरम और ओडियम क्रायसिफोडिस फफूंद के कारण होता है। इस रोग में पत्तियों पर सफेद पाउडर जैसा दाग हो जाता है। इसकी रोकथाम के लिए फूल खिलने के पहले 2.5 ग्राम सल्फेक्स या मि.ली. डायकोफाल दवा का प्रतिलीटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए।

(4) पर्णदाग: यह रोग फाइलोस्टिकटा जरबेरी और अल्टेनेरिया स्पेसिज फफूंद के कारण होता है। इस रोग में पत्तियों पर भूरे तथा काले रंग का दाग होने लगता है। इस रोग की रोकथाम के लिए वेविस्टीन दवा का ग्राम/ली. पानी में घोल कर छिड़काव करना चाहिए।

(5) टोबैको रेटल वायरस: यह रोग ट्राइकोडोरस जाति के निमेटोड से फैलता है। इस रोग में पीले या काले गोल दाग पत्तियों पर दिखाई देते हैं। इस रोग की रोकथाम के लिए एल्डीकार्ब या फ्यूराडान दवा का 500 ग्राम/एकड़ की दर से प्रयोग करना चाहिए।

कीट एवं रोकथाम

(1) सफेद मक्खी: यह नन्हा कीट पत्तियों का रस चूसता है। पत्तियों पर हरापन रहित दाग पड़ जाते हैं और पौधे की वृद्धि रुक जाती है। इस कीट की रोक थाम के लिए रोगर दवा का 1.5 मि.ली./ली. पानी में घोल कर छिड़काव करना चाहिए।

(2) लीफ माइनर: यह नन्हा कीट पत्तियों के बीच सुरंग बनाकर जाली के समान कर देता है। इस कीट का प्रकोप होने पर क्लोरोडेन या टोक्साफेन दवा का 1.5 मि.ली./ली. पानी में घोल कर 10 दिनों के अंतराल पर छिड़काव करना चाहिए।

(3) माहू: यह कीट पौधे के ऊपर के भाग से रस चूस कर नुकसान पहुँचाता है जिससे पौधे कमजोर होकर मर जाते हैं। इसकी रोकथाम के लिए मैलाथियान दवा का 1.5 मि.ली./ली. पानी में घोल कर छिड़काव करना चाहिए।

(4) माइज: यह छोटा सूक्ष्म कीट पत्तियों का रस चूसकर पत्तियों को रंगहीन तथा खराब बना देता है। मि.ली. कैलाथेन दवा का प्रति ली. पानी में घोल कर छिड़काव करना चाहिए।

 

स्त्रोत: रामकृष्ण मिशन आश्रमदिव्यायन कृषि विज्ञान केंद्रराँची।

झरबेरा फूल की कटाई और ग्रेडिग

 

उन्नत किस्में

गैलार्डिया की दो प्रमुख जातियां है।

पिक्ता

इसमें बड़े आकार के सिंगल फूल आते है।

लोरेन्जिया

इसमें फूल चटकदार पंखुड़ियों वालेविखंडित कोरो व एक ही फूल में कई आकर्षित रंगों के डबल फूल आते है। लोरोंजियाना की प्रमुख किस्में सनसाइनस्ट्रान और गेटी डबल मिक्सड है। एक अन्य संकर किस्म ट्रेटा पिक्ता हाल ही में विकसित की गई है। इसमें फूल डबल आकार में बड़े और पंखुड़ियों चटकदार चमकीली लाल रंग की पीले किनारों वाली होती है।

जलवायु

गैलार्डिया की अच्छी उपज के लिए खुली व धूपवार जलवायु उत्तम है।

पौध तैयार करना

प्रति एकड़ की रोपाई के लिए 300 ग्राम बीजों की आवश्यकता होती है। बीज  बोने के लिए नर्सरी अलग तैयार की जाती है। समतल या ऊँची उठी हुई (लगभग 15 से.मी. ऊंची) क्यारियां जिनकी चौड़ाई फीट और लंबाई 10 फीट होती है। एज एकड़ के लिए ऐसी क्यारियों की आवश्यकता होती है।  प्रत्येक क्यारियों में 30 किलो (लगभग धमेला/ टोकनी/तगारी) गोबर खाद मिला दें। क्यारियों के चारों और कीटनाशक पाउडर चीटियों की रोकथाम के लिए डालना चाहिए। बीज बोने के पूर्व किसी फफूंदनाशक दवा जैसे थाइरम. बैविस्टीन आदि से उपचारित करना चाहिए। बीज की बोआई लाईन से करनी चाहिए। बोवाई के बाद उपर से हल्की मिट्टी व गोबर खाद से से ढक देना चाहिए। जब  बीज जमना शुरू न कर दें हजारे से ही पानी देना चाहिए। बीज जमने के बाद खुला पानी दिया जा सकता है।

गैलार्डिया गर्मीबरसात व सर्दी तीनों ही मौसमों से आसानी से उगाया जा सकता है। फ़रवरीमार्च ने बुवाई करने में फूल गर्मियों मेंमई में बुवाई करने पर बरसात में और सिंतबर – अक्टूबर  में बुवाई करने पर सर्दियों में फूल आते हैं।

भूमि की तैयारी

खेत में गहरी जुताई मोल्ड बोल्ड से करफिर हैरो और अंत में रोटोवेटर चलाकर खेत को भुरभुरा  बना लिया जाना चाहिए। रोटोवेयर चलाने से पहले खेत में ट्रैकर ट्राली प्रति एकड़ गोबर खाद में मिला देना चाहिए।

खाद एवं उर्वरक

गोबर खाद

टन/एकड़

यूरिया

80  किलो/एकड़

सुपर फास्फेट

160 किलो/एकड़

म्यूरेट ऑफ़ पोटाश

40 किलो/एकड़

 

फास्फोरस एवं पोटाश को जुताई के समय खेत में दे देना चाहिए। गोबर की खाद सुपर फास्फेट व म्यूरेट ऑफ़ पोटाश की संपूर्ण मात्रा व यूरिया की आधी मात्रा रोपाई के पूर्व डाले व यूरिया की शेष आधी मात्रा 45 दिन पश्चात खड़ी फसल में देवें। यूरिया डालने के बाद सिंचाई करें। पौधा प्राय: 28-30 दिन में जब पौधा 3-4 पत्तियां हो तब मुख्य खेत में पौध लगाने योग्य हो जाते हैं। पौध की रोपाई 60 सेमी लाईन और 45 सेमी पौधे से पौधे की दूरी रखकर करनी चाहिए।

सिंचाई

गैलार्डिया में सही समय पर सिंचाई करने पर फूल बड़े तथा अधिक मात्रा में मिलते हैं। सर्दियों में 12 से 15 दिन बाद व गर्मियों में से दिन बाद सिंचाई करते रहने चाहिए।

निंदाई – गुड़ाई – सी फसल में 2-3 बार गुड़ाई कर खरपतवार को निकाल देना चाहिए। गुड़ाई करते समय पौधे के चारों और मिट्टी चढ़ा देना चाहिए।

तुड़ाई – पौधों की रोपाई से 3-4 महीने बाद फूल खिलने शुरू होते हैं। फूलों की तुड़ाई समय पर करते रहना चाहिए। हर चौथे रोज फूलों की तुड़ाई करें। जिससे आगे निरंतर फूल बनते रहे।

पौध संरक्षण

पौध गलन

नर्सरी की क्यारियों में बीज पास – पास लगाने और अत्यधिक पानी भरे रहने से पौध नीचे से गलने लगती है। बीज की बोआई के पूर्व बीजोपचार व क्यारियों को फार्मेलिन के घोल से स्टरलाइज्ड कर दिया जाय तो इस रोग से बचा जा सकता है।

पत्तियों पर धब्बा या झुलसा

पत्तियों पर भूरे रंग का गोल धब्बे दिखाई देते हैं इनके उपचार के लिए डायथेन एम – 45 दवा का 2.5 ग्राम प्रति लिटर पानी में घोलकर 15 -15 दिन के अंतर पर छिड़काव करें।

भभूतिया रोग

सफेद पाउडर के समान पत्तियों पर धब्बे दिखाई देते हैं। केराथेन फफूंदनाशक मिली प्रति लिटर पानी में घोलकर 15–15 दिन के अंतर पर छिड़काव करें।

मौसमी फूल वे होते हैं जिनका जीवनक्रम एक ही मौसम का होता है। किसी भी उद्यान को थोड़े समय में ही मौसमी पुष्पों से रंग-बिरंगा व सुंदर बनाया जा सकता है। सालों भर होने वाले फूलों के पौधों की अपेक्षा मौसमी फूलों के पौधों से लगातार दो या तीन माह में ही फूलों से आच्छादित एक भरा-पूरा उद्यान सफलतापूर्वक बनाया जा सकता है। मौसमी पुष्पों का सबसे बड़ा गुण यह है कि वे आसानी से उगाये जा सकते हैं। मौसमी फूल मुख्यत: शीत ऋतु, ग्रीष्म एवं वर्षा ऋतु में लगाए जाते हैं। इन्हें सीधे बीज से या बिचड़े तैयार कर लगाया जाता है। बीज से लगाये जाने वाले मौसमी फूलों के बीज सीधे क्यारियों में गिरा देते हैं और अंकुरण के बाद अतिरिक्त पौधों को सावधानीपूर्वक निकाल देते हैं।
बिचड़े तैयार करने के लिए 1 मीटर चौड़ी और 3 से 5 मीटर लम्बी पौधशाला तैयार करते हैं। भली प्रकार से मिट्टी तैयार करके उसमें भरपूर जैविक खाद देते हैं। सिंचाई करके पर्याप्त नमी होने पर बीज डालकर हल्के से मिट्टी में मिला देते हैं और बालू एवं छनी हुई पत्ती की खाद के मिश्रण से हल्का ढँक देते हैं। अंकुरण के बाद नियमित सिंचाई करते हैं। बिचड़े जब लगभग चार सप्ताह के हो जायें तब इन्हें क्यारियों में रोपना चाहिए। रोपाई हमेशा दोपहर के बाद करनी चाहिए एवं रोपाई के बाद नियमित सिंचाई करते रहनी चाहिए। क्यारियों को तैयार करते समय प्रति 10 वर्गमीटर के लिए 20-50 किलो गोबर की खाद, 500 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट, 165 ग्राम म्यूरिएट ऑफ़ पोटाश, 275 ग्राम यूरिया देना चाहिए। इन उर्वरकों को मिट्टी में अच्छी प्रकार से मिलाकर क्यारियों को तैयार करना चाहिए। बिचड़े लगाने के बाद नियमित निकाई-गुड़ाई करनी चाहिए एवं एक दो माह के अंतर पर यूरिया का उपरिवेशन करना चाहिए। अच्छे फूल और अधिक पुष्पण प्राप्त करने के लिए मुरझाये फूलों को तोड़कर छंटाते रहना चाहिए।
शीतकालीन मौसमी फूल
शरदऋतु के फूलों की संख्या अन्य ऋतुओं की अपेक्षा अधिक होती है। वास्तव में देखा जाए तो जाड़ों में ही फूलों की बहार रहती है। शीतकालीन मौसमी फूल सितंबर-अक्टूबर में लगाये जाते हैं तथा नवंबर-दिसंबर से मार्च तक फूलते हैं। झारखंड में उगाए जाने वाले शीतकालीन मौसमी फूल इस प्रकार हैं:
स्वीट एलाइसम, एंटरहिनम, कैलेंडुला, एस्टर, कार्न फ्लावर, स्वीट सुलतान, क्राईसेंथेमस, कॉसमास, डहलिया, लार्कस्पर, डायन्थस, कार्नेशन, स्वीट विलियम, कैलिफोर्निया पॉपी, कैन्डीटफ्ट, स्वीटपी, पेटूनिया, पॉपी, फ्लाक्स इत्यादि।
ग्रीष्मकालीन मौसमी फूल
इस ऋतु में अपेक्षाकृत कम मौसमी फूल पाए जाते हैं। अधिकतर पौधों के बिचड़े तैयार कर लगाये जाते हैं। गर्मी के फूलों वाले ये पौधे वसंत ऋतु में लगाये जाते हैं तथा अप्रैल से जून-जुलाई तक फूलते हैं। इस ऋतु के प्रमुख मौसमी फूल इस प्रकार हैं:
एमारैंथस, कास्मिया, कोचिया, क्लियोम, गोम्फ्रेना, जिनिया, गैलार्डिया, टोरेनिया, पोर्टुलाका, सिलोशिया, सूर्यमुखी, इत्यादि।
वर्षाकालीन मौसमी फूल
इस ऋतु में ग्रीष्म ऋतु के ही अधिकतर मौसमी फूल लगाये जाते हैं। ये फूल जून-जुलाई में लगाये जाते हैं और वर्षा ऋतु में खिलते हैं। इस ऋतु के प्रमुख मौसमी फूल इस प्रकार हैं:
एमारैंथस, कास्मिया, कोलियस, कैलियोपासिस, गोम्फ्रेना, गैलार्डिया, टोरेनिया, बालसम, इत्यादि।
पौधा लगाने की विधि
इस वार्षिक पौधों को लगाने की दो विधियाँ प्रचलित हैं – एक जिसमें एक क्यारी में एक ही रंग एवं एक ही प्रकार के फूल लगाते हैं और दूसरी जिसमें विभन्न रंगों के मिश्रित फूलों को एक ही क्यारी में ऊँचाई के अनुसार लगाते हैं। इसमें बड़े पौधों को पीछे, बीच में मध्यम ऊँचाई के तथा सामने सबसे छोटे पौधों को लगाया जाता है। क्यारियों में लंबे, मध्यम एवं छोटे पौधों का अनुपात क्रमश: 5:3:2 या 6:3:1 रखते हैं। क्यारियों को लम्बाई के हिसाब से तैयार करते हैं। परन्तु, इसकी चौड़ाई लगभग 1-1.5 मीटर रखते हैं।
(क) पौधशाला में बीज डालना – मौसमी फूलों के बीज साधारणतया छोटे होते हैं। अत: इसकी अच्छी देखभाल के लिए उचित स्थान पर लगाते हैं। बीजों को मात्रा के अनुसार गमलों में, बक्सों में या ऊँची क्यारियों में लगाते हैं। नर्सरी के लिए क्यारियों को जमीन से 10-15 सें.मी. ऊँचाई पर बनाते हैं। क्यारियों की चौड़ाई लगभग 1 मीटर रखते हैं जिससे कि घास निकालने, पानी डालने एवं पौधों की सघनता को कम करने में सुविधा होती है। नर्सरी के लिए क्यारियों की लम्बाई लगभग 2-3 मीटर रखनी चाहिए। मिट्टी को तैयार करते वक्त 10-15 किलो प्रति वर्ग मीटर क्षेत्र में गोबर की सड़ी हुई खाद या कम्पोस्ट डालना चाहिए। मिट्टी जनित रोगों की रोकथाम हेतु प्रति लीटर पानी में 2 ग्राम की दर से बने ब्रासीकाल या कैप्टान के घोल को मिट्टी में मिलाना चाहिए। बीज को पंक्ति में 5-6 सें.मी. की दूरी पर तथा 0.5 सें.मी. गहराई पर लगाना चाहिए। सामान्यत: बीजों के आकार पर उसकी गहराई निर्भर करती है। बीजों को लगाने के उपरांत महीन छिद्र वाली चलनी से छानी हुई कम्पोस्ट या खाद को उसके ऊपर डालते हैं। दिन में दो-तीन बार पानी का छिड़काव करना चाहिए। अच्छे अंकुरण के लिए क्यारियों को अखबार के पन्ने या हल्के कपड़े से ढँककर अँधेरा करते हैं। क्यारियों के बाहरी किनारों पर फालीडाल डस्ट या लिन्डेन डस्ट का छिड़काव करते हैं जिससे चीटियाँ बीजों को नहीं खा पाती हैं। जब बीजों से अंकुरण होने लगता है तब उसके ऊपर रखे अखबार या कपड़े को हटा देते हैं। बिचड़े लगभग एक महीने में रोपने योग्य हो जाते हैं तथा उस समय तक तीन-चार पत्तियाँ आ जाती हैं।
(ख) जमीन तैयार करना एवं बिचड़ा लगाना – खेतों की अच्छी तरह से जुताई करने के बाद प्रति 10 वर्ग मीटर के लिए 20-50 किलोग्राम गोबर की सड़ी खाद, 500 ग्राम सिगल सुपर फास्फेट, 165 ग्राम म्यूरिएट ऑफ़ पोटाश और 275 ग्राम यूरिया मिलाना चाहिए। बिचड़ों को उखाड़ने के पहले हल्की सिंचाई कर देते हैं जिससे कि ये क्यारी में जल्दी लग जाएँ। बिचड़ों को शाम के समय ही उखाड़ना चाहिए। लम्बे, मध्यम एवं बौने पौधों को क्रमश: 30-40 सें.मी., 15-20 सें.मी. एवं 10-12 सें.मी. की दूरी पर लगाते हैं। बिचड़ों को लगाने के तुरन्त बाद पानी डालना चाहिए।
उन्नत किस्में
(1) एक्रोक्लाइनम – गोलिएथ, एल्बो, रोज, रोज ऐन्ड वाइट।
(2) एजरेटम – ब्लू मेरी, मिडगेट ब्लू, फेयरी पिंक, परफेक्सन, समर स्नो, ब्लू बेडर, ब्लू मॉन्क।
(3) एन्टरहिनम – टॉम थम्ब, मैजिक कार्पेट, ग्लेशियर, हाइनुन, रोजावेल वालकेनो, केवेलियर, गार्डमेन, कमान्डर, सनलाइट, टेम्पल, टिंकल बेल, जुलीआना, मैक्सिमम आर्किड, मैक्सिमम स्कारलेट, मैक्सिमम येल्लो।
(4) आर्कटॉटिस – सटन ट्रिम्फ
(5) कैलेन्डुला – गोल्ड स्टार, याशिमा, मुराजी, पैसिफिक व्यूटी, गोल्डेन जेम, ऑरेन्ज जेम, लेमन जेम, क्राइसेंथा, ऑरेन्ज, क्रीम ब्यूटी, गोल्ड फिंक, रेडियो, क्रिस्टेड, येल्लो कोलोसाल, गोल्डेन इम्पेरर, लेमन कोरोनेट, ऑरेन्ज कोरोनेट।
(6) एस्टर – पूर्णिया, वायलेट कुसन, कामिनी, फूल गणेश, वाइट शशांक, फूल गणेश वायलेट, फूल गणेश पिंक, फूल गणेश पर्पल, कॉमेट, अमेरिकन ब्यूटी, क्वीन ऑफ़ द मार्केट, अर्ली बर्ड, ब्लू वंडर, बकेट पाउडर पफ, बकेट मिड ब्लू।
(7) स्वीट सुल्तान – एल्बा, फेबोरीटा, ओडेरेटा, ग्रेसियोसा, स्पलेंडन्स सुआवियोलेन्स।
(8) एनुअल क्राइसेन्थिमम – मैनिंग स्टार, इवनिंग स्टार, इस्टर्न स्टार, बलेन्का, ग्लेरिया, इसाबेल, रोमियो, येल्लो स्टोन, निविया, एल्वो, गोल्डेन क्राउन, टेट्रा कॉमेट, मैरी इक्लिप्स, जॉन ब्राइट, नार्दन स्टार।
(9) कॉसमॉस – फिस्ता, ऑरेन्ज फ्लेम, ऑरेन्ज रफेल, मैंडरीन।
(10) कास्मिया – प्यूरिटी, डेजलर, ग्लोरिया, पिंक सेन्सेशन, रैडियेन्स, भरसेल्लेस।
(11) लार्कस्पर – ब्लू बेल, ब्लू स्पाइरी, लीलेक स्पाइरी, कार्मीनकिंग, डेजलर, लिलेक इम्प्रुव्ड, लॉस एंजेल, मिस कैलिफोर्निया, रोजावोंडा, वाइट किंग, रीगल, एल्टी, फ्लेमेन्गो।
(12) डायंथस – पिंक फ्लेस, स्नो स्टॉर्म, फायर स्टॉर्म, ओरिएंटल कार्पेट, ब्लू पीटर, सेलमोन क्वीन, रोड वेडगर, मिस मिवाको, न्यू मिकाडो, स्कारलेट क्वीन, रीच क्रिमसन, ब्रेभो, ब्लेक प्रिंस, फायर बाल, पिंक ब्यूटी, सेलमोन किंग, स्नो ड्रिफ्ट, स्नोवाल।
(13) कैंडीटफ्ट – आइसबर्ग, इम्प्रेस, वाइट पेनिकल, सैम्पर वायरेन्स वाइट, जाइंट हायसेंथ फ्लावर, वाइट स्पाइरल।
(14) डाइमाफोर्थिका – सैल्मोन ब्यूटी, बफ ब्यूटी, वाइट ब्यूटी, आरेन्ज इंम्प्रुव्ड, ऑरेन्ज ग्लोरी, लासबेगम, ऑरेन्ज ग्लोरी।
(15) हेलीक्राईसम – फायर वाल, ल्युटम, परपुरम, रोजम, टाल डबल, ड्वार्फ डबल, मॉनस्ट्रोसम, बकेट मिक्स, स्वीस जाइंट मिक्स।
(16) हॉलीहॉक – दीपिका, दुल्हन, गौरी, पुसा हालीहॉक श्वेता, पूसा हालीहॉक कृष्णा, पूसा हॉली हॉक लालिमा, पूसा हॉली हॉक गुलाबी, पाउडर पफ।
(17) गजेनिया – मिनिस्टर, सन साइन, डेब्रेक ब्राइट ऑरेन्ज, डेब्रेक ब्राइट येल्लो, डेब्रेक गार्डेन सन।
(18) ल्यूपिन – एल्बस, जाइंट किंग, टेक्सानस, डार्कब्लू, अजुरी ब्लू, पिक्सी डिलाइट, रोजस।
(19) जिप्सोफिला – सिंगल वाइट, डबल वाइट, पैसफिक, अर्ली स्नोबाल, रीपेन्स रोजिया।
(20) शार्ली पॉपी – शार्ली, स्वीट ब्रीयर, अमेरिकन लिगन।
(21) लाइनेरीया – नार्थ लाइट, फेयरी वकेट, इक्सेल्सर।
(22) पैंजी – यूनिवसल, हैपी फेस, क्रिस्टल, सुपर मैजेस्टी, मैजेस्टी, सुपर स्वीस जाइंट, मास्टर पीस, एपेनग्लो, ब्लेक प्रिंस, यल्लोक्वीन, पर्पल क्वीन।
(23) पिटुनिया – रोयाल्टी, ब्रुपीस रोयल्टी, पीचरेड, स्नोवाल, फायर चीफ, लेडीबर्ड, बींगो, डजलर, क्रिम स्टार, पर्पल प्रिंस, सुपर फ्रिल्स, रामोना, पॉपकार्न।
(24) फ्लाक्स – ट्विंकल, आर्टशेड, एलवा, ब्रिलिएंट, कोकसिनिया, वरमिलन, ग्लोव ब्यूटी, ग्लैमर, टेट्रा रेड।
(25) पोर्टुलाका – मैजिक कार्पेट, सनीशेड, डबल रेड, ज्वेल।
(26) साल्विया – सटन फायर बाल, हुसार, पायरेट, आर्ली बोनफायर, रेड पीलर, हाट जाज, सैल्मोन पीग्मी, पनोरमा, अमेरिका, संत जॉन फायर, फायर ड्वार्फ, भापलेट क्वीन।
(27) स्वीट पी – गैन्डीफ्लोरा, लीटिल स्वीट हॉट, स्पेन्सर, फ्रिल्ड, मल्टीफ्लोरा।
(28) भेनेडियम – चेयरफूल ऑरेन्ज, चेयरफूल बाइट।
(29) स्वीट एलाइसम – ओरीएन्टल नाइट, लीटील जेम, लीलेक क्वीन, रोयाल कार्पेट, स्नो कार्पेट, पिंक हिटर, वायलेट क्वीन, स्नोक्लोथ, टेट्रा स्नोड्रिफ्ट।
(30) नस्ट्रेशियम – डबल ड्वार्फ ज्वेल, वाइट बर्ड, ग्लेम।
(31) अमरैन्थस – अमर किरण, अमर मैजिक, अमर पोएट, अमर पार्वती, अमर सुकिरण, अमर तीरंगा, फ्लेम, पीग्मी टॉच, रेड फ़ॉक्स, मोल्टेन फायर।
(32) बालसम – रोज फलावर, रोयाल बालसम, टॉल डबल, टॉम थम्ब, डबल कैमेलिया फ्लावरर्ड, एसेन्ट, सुपर इल्फीन।
(33) गैलार्डिया – इंडियन चीफ, लॉलीपॉप यल्लो, लॉलीपॉप ऑरेन्ज, सनसाइन स्ट्रेन, डबल टेट्रा फिस्टा, ब्रमेन, बारगेन्डी, ग्लोबीन, सनगुनिया।
(34) गोम्फ्रेना – लीलीपुट बुडी, ड्वार्फ बुडी पर्पल, क्रिजी, ड्वार्फ वाइट।
(35) सिलोसिया – रेड फ़ॉक्स, एप्रीकाट ब्रान्डी, फायर ग्लो, गोल्डेन फेदर, पम्पास पल्म, मौग्नीफिका, सिल्वर फेदर, लीलीपुट, ज्वेल बाक्स, इम्प्रेस, फेन्सी पल्म।
(36) तोरीनिया – पान्डा, डचेस बागेन्डी, डचेस पिंक।
(37) टीथोनिया – रेड टॉच, यल्लो टॉच, टाल आरेन्ज, ड्वार्फ आरेन्ज, गोल्ड फिंगर।
(38) जिनिया – पोलर वियर, र्स्कालेट फ्लेम, गोल्डेन बाल, सैल्मोन ब्यूटी, कैन्डीकेन, लीलीपुट।
(ग) पौधों का प्रबंधन – ये पौधे बहुत ही कोमल होते हैं अत: इनकी उचित देखभाल की जरूरत होती है। क्यारियों से समय-समय पर घास निकालते एवं मिट्टी हल्की करते रहना चाहिए। समय-समय पर उचित मात्रा में पानी देना चाहिए। गर्मी में 4-5 दिनों पर, जाड़े में 10-12 दिनों पर एवं बरसात में अगर कम पानी हो तब सिंचाई करते हैं। हल्की मिट्टी में पानी की जरूरत ज्यादा होती है। बिचड़ों को लगाने के एक महीने बाद 100 ग्राम यूरिया की दूसरी मात्रा का उपनिवेश करना चाहिए।
(घ) बीज संग्रहण एवं संरक्षण – वार्षिक पौधों के बीज संग्रहण एवं संरक्षण में विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। पौधों के बीजों की शुद्धता को बनाये रखने के लिए यह ध्यान रखना चाहिए कि फूल स्वयं परागित, आंशिक परपरागित या पूर्णत: परपरागित हैं या नहीं। स्वपरागित पौधों यथा-लूपिन, स्वीट पी, साल्विया में दूरी रखने की जरूरत नहीं है। आंशिक परपरागित पौधों, जैसे कि एंटीरहीनम, लार्कस्पर, लाइनेरिया, फ्लाक्स एवं पैन्जी में दूरी 50-100 मीटर से ज्यादा रखते हैं। आंशिक परपरागित पौधों में बालसम, जीनिया, गोम्फ्रेना, कॉक्सकंब, सूर्यमुखी, पोर्टुलाका, गैलार्डिया, स्वीट एलासम, कैलेन्डुला, कॉर्नफ्लावर, स्वीट सुल्तान, गुलदाउदी, कॉसमॉस, डहलिया आदि भी आते हैं। बीज का संग्रहण उचित परिपक्वता होने पर उसकी फली फटने से पहले करना चाहिए। बीज को उचित कीटनाशकों से उपचारित करने के बाद हवा बंद डब्बों या थैलों में रखना चाहिए।
कीट तथा बीमारियाँ – फूलों में अधिकतर माहू (एफिड) तथा सुंडी (केटरपीलर) से अधिक क्षति पहुंचती है। इनके प्रकोप को कम करने के लिए जुताई के समय 5 प्रतिशत लिन्डेन के पाउडर का छिड़काव करना लाभदायक है। अन्य कीड़ों के नियंत्रण के लिए मैलाथियान (2 मिली0 दवा एक लीटर पानी में) के घोल का छिड़काव लाभदायक रहता है। नर्सरी में प्राय: आर्द्रगलन बीमारी आती है। यदि उपर्युक्त विधि के अनुसार बीज की बोआई की जाए तो बीमारी आने की संभावना कम हो जाती है। इस बीमारी के प्रकोप से पौधे नीचे से गल कर सूख जाते हैं। नियंत्रण के लिए 2 ग्राम कैप्टान या वेवस्टीन दवा का एक लीटर पानी में बने घोल का छिड़काव बहुत उपयोगी है। कभी-कभी ब्लाइट के प्रकोप से कारनेसन के पौधे सूखने लगते हैं। नियंत्रण के लिए फाइटोलोन या बोर्डो मिश्रण (5:4:50) के घोल का छिड़काव लाभदायक है। बोर्डो मिश्रण का तात्पर्य क्रमश: कॉपर सल्फेट, चूना एवं पानी के मिश्रण से है। बालसम तथा एस्टर के पौधे पाद विगलन की बीमारी के कारण सूख जाते हैं। चेस्टनट (अमोनियम कार्बोनेट -2 भाग, कॉपर सल्फेट-2 भाग मिलाकर 24 घंटे रखकर) 28-35 ग्राम के दो गैलन पानी में बने घोल का छिड़काव या जड़ में डालने से लाभ होता है। एस्टर में वायरस की बीमारी आती है। उसके लिए वायरसरहित किस्मों का ही प्रयोग करना चाहिए।
जाड़े में लगाये जाने वाले फूलों की सूची
क्र.सं. फूल का नाम पौधे की ऊँचाई
(सें.मी.) प्रसारण विधि बोआई/ रोपाई की दूरी
(सें.मी.) फूलने का समय
(माह) फूलों का रंग अभ्युक्ति
1 एक्रोक्लाईनम 40-70 बीज 15-20 3 गुलाबी एवं सफेद फूल इकहरे दोहरे, आंतरिक सज्जा हेतु।
2 हॉली हॉक 120-180 बीज 30-45 3-4 सफेद, गुलाबी, पीला, लाल प्रदर्शनी एवं बार्डर में पीछे लगाने हेतु।

3 स्वीट एलाईसम 10-30 बीज/बिचड़ा 15 1.5-2 सफेद, बैंगनी, गुलाबी क्यारी एवं गमले में।

4 एन्टरहिनम 15-120 बिचड़ा 20-40 2.5-4 सफेद, पीला, गुलाबी क्यारी, गमले एवं गुलदस्ते में।
5 आर्कटोटिस 35-40 बिचड़ा 30-40 3-4 सफेद, हल्का पीला क्यारी एवं गुलदस्ते।
6 कैलेन्डुला 30-50 बिचड़ा 20-30 2-3 पीला, नारंगी गमले, क्यारी एवं गुलदस्ते।

7 एस्टर 40-50 बिचड़ा 20-40 3-4 सफेद, गुलाबी, नीला क्यारी, गमले, गुलदस्ते।

8 कार्नफ्लावर 60-90 बिचड़ा/बीज 20-25 3.3.5 सफेद, गुलाबी, बैंगनी, नीला
क्यारी, गुलदस्ते।
9 स्वीट सुल्तान या कार्नफ्लावर 45-60 बिचड़ा/बीज 30 3-3.5 सफेद, पीला, बैंगनी क्यारी, गमले, सुंगधित, गुलदस्ते।

10 एनुअल क्राईसैन्थेमम 45-75 बिचड़ा/बीज 30-45 3 सफेद, पीला क्यारी एवं खुले फूल

11 कॉसमॉस 60-150 बिचड़ा/बीज 30-45 2-3 सफेद, गुलाबी, लाल, पीला एवं बैंगनी गुलदस्ते के लिए सालो भर उगाने योग्य।
12 डहलिया 30-150 बीज, कर्त्तन एवं कंद 30-45 3.3.5 सफेद, पीला, लाल, कत्थई मिश्रित क्यारी, गमला, गुलदस्ता।
13 लार्कस्पर 30-100 बिचड़ा/बीज 20-30 3.3.5 नीला, सफेद, गुलाबी, पीला एवं बैंगनी गमला, क्यारी एवं गुलदस्ता।
14 डायंथस 30-40 बिचड़ा/बीज 30-40 3-4 सफेद, लाल, गुलाबी, पीला एवं बैंगनी क्यारी एवं गुलदस्ता।
15 कार्नेशन 45-75 बिचड़ा/बीज 30-40 3-4 सफेद, गुलाबी, पीला, लाल मिश्रित सुगंधित फूल, क्यारी गुलदस्ते।
16 जिप्सोफिला 60-90 बीज 20-30 3 सफेद, गुलाबी, पीला क्यारी एवं खुले फूल।
17 हेलिक्राईसम 70-90 बीज 30-40 3-3.5 पीला क्यारी एवं खुले फूल
18 कैंडीटफ्ट 30-40 बीज 15-20 2-2.5 सफेद, गुलाबी गमले एवं बॉर्डर में लगाने के लिए।
19 स्वीट पी 30-150 बीज 30-100 3 सभी रंग एवं मिश्रित बॉर्डर एवं प्रदर्शनी हेतु, सहारा की आवश्यकता।
20 लाईनेरीया 30-40 बीज 15-20 3 सभी रंगों एवं दोहरे रंग में गमले एवं क्यारी
21 मेसेम्व्रेन्थम (आइस प्लान्ट) 10-20 बिचड़ा/बीज 15-20 3 सभी रंग एवं मिश्रित धूप वाले स्थानों में।
22 पिटुनिया 30-45 बीज/बिचड़ा 20-25 3 लाल, सफेद, गुलाबी, बैंगनी गमले एवं क्यारी
23 फ्लाक्स 30-45 बीज/बिचड़ा 20-25 3-3.5 सभी रंग बार्डर, गमले एवं बास्केट।
24 कैलिफोर्निया पॉपी 30-45 बीज/बिचड़ा 20 3-3.5 पीला, नारंगी समूह में लगाने के लिए।
25 शार्ली पॉपी 45-60 बीज/बिचड़ा 20-30 2-2.5 सफेद, लाल, गुलाबी समूह में लगाने के लिए।
26 अफ़्रीकी गेंदा 60-120 बीज/बिचड़ा 30-45 3 पीला, नारंगी क्यारी एवं खुले फूल, गमलों एवं माला एके लिए।
27 फ्रेंच गेंदा 30-40 बीज/बिचड़ा 20-30 2.5.-3 लाल, पीला, नारंगी क्यारी एवं खुले फूल, गमलों एवं माला के लिए।
28 सालविया 45-60 बीज/बिचड़ा 30 3 लाल, सफेद, गुलाबी क्यारी एवं रॉकरी।
29 नास्टरशियम 30-45 बीज 20 2.5.-3 पीला, नारंगी, लाल बेड एवं रॉकरी।
30 वरबीना 25-40 बीज 20-25 2.5.-3 नीला, बैंगनी, लाल गमला, क्यारी, झूलते बक्से एंव रॉकरी।
31 पैन्जी 20 बीज/बिचड़ा 25-30 2.5.-3 मिश्रित रंग एवं सभी रंग धूपदार स्थान, गमला एवं क्यारी।
32 गजेनिया 25-40 बिचड़ा 20-30 3 लाल, पीला, गुलाबी क्यारी एवं गमले में।
33 क्लीयोम 50-100 बिचड़ा 50-75 2-3 गुलाबी, लाल, बैंगनी, सफेद क्यारियों एवं बोर्डर में।
34 सिनरेरिया 30-45 बिचड़ा 30-45 2-3 गुलाबी, बैगनी, लाल गमले एवं क्यारियों में लगाने हेतु।
35 एजरेटम 20-30 बिचड़ा 20-30 2 बैंगनी, सफेद क्यारियों एवं गमले में लगाने हेतु।
36 डाइमाफोर्थिका 30-40 बिचड़ा 30-45 3 सफेद, गुलाबी, पीला क्यारियों एवं गमले में लगाने हेतु।
37 ल्यूपिन 40-50 बिचड़ा 30-45 2-3 सफेद, बैंगनी, गुलाबी गमले एवं क्यारियों में लगाने हेतु।
38 पोटुलाका 10-20 बीज 10-20 2 पीला, गुलाबी, बैगनी क्यारियों में लगाने हेतु।
गर्मी वाले मौसमी फूल
क्र.सं. फूल का नाम पौधे की ऊँचाई
(सें.मी.) प्रसारण विधि बोआई/ रोपाई की दूरी
(सें.मी.) फूलने का समय
(माह) फूलों का रंग अभ्युक्ति
1 अमरैंथस 60-75 बिचड़ा 30-40 3 गुलाबी, सफेद एवं लाल मुख्यत: रंग बिरंगे पत्तियों के लिए, गमले एवं आंतरिक सज्जा हेतु।
2 गैलार्डिया 30-45 बिचड़ा/बीज 20-25 3-3.5 लाल, पीला प्रत्येक ऋतु में उगाने योग्य, गर्मी को सहने योग्य।
3 गोम्फ्रेना (बटन फ्लावर) 30-60 बिचड़ा 25-30 2-2.5 गुलाबी, सफेद, बैंगनी उपरोक्त सभी।
4 पोर्टुलाका 10-25 कटिंग 15-20 2-2.5 सभी रंगों में एवं मिश्रित रंग गमलों में झूलते बक्सों एवं झुंड में लगाने हेतु।
5 कोचिया 60-75 बिचड़ा 30-45 - हरी महीन पत्तियों की शोभा गमलों के लिए।
6 जिनिया 40-90 बिचड़ा 30-45 2-3 नीला छोड़कर सभी रंग कड़े पौधे जो आसानी से लम्बी अवधि तक उगाये जा सकते है।
7 सिलोसिया 45-75 बिचड़ा 50-90 2-3 लाल, गुलाबी, पीला, नारंगी झुण्ड में लगाने के लिए, बहुत बठोर एवं लम्बी अवधि हेतु।
8 सूर्यमुखी 45-150 बीज 45-90 2-3 पीला, नारंगी, ताम्र खुले धूपदार स्थानों में लगाने के लिए एवं सालों भर उगाने योग्य।
वर्षा वाले मौसमी फूल
क्र.सं. फूल का नाम पौधे की ऊँचाई
(सें.मी.) प्रसारण विधि बोआई/ रोपाई की दूरी
(सें.मी.) फूलने का समय
(माह) फूलों का रंग अभ्युक्ति
1 गोम्फ्रेना (बटन फ्लावर) 30-60 बिचड़ा 25-30 2-2.5 गुलाबी, सफेद प्रत्येक ऋतु में उगाने योग्य एवं सूखा सहने की क्षमता।
2 गैलार्डिया 45-60 बिचड़ा 20-25 3-3.5 पीला, नारंगी, भूरा उपरोक्त
3 बालसम 30-60 बीज 20-30 2-2.5 सभी रंगों में कम समय में पहले फूल आने वाले बहुत कोमल पौधे।
4 कैलियोपसिस 45-60 बिचड़ा 30-40 3-3.5 मिश्रित रंग सभी मौसमों के लिए।
5 टीथोनिया 70-150 बीज 30-40 3-3.5 नारंगी, सिंदुरी बीज को सीधे खेतों में लगाते है।
6 विन्का रोजिया (सदाबहार) 60-75 बीज 30-50 3-3.5 सफेद, गुलाबी सालों भर उगाने योग्य।
7 कोलियस 40-90 बीज 30-50 3-3.5 मिश्रित रंग सुंदर आकर्षक मिश्रित रंगों वाले पत्ते।
8 तोरीनीया 20-30 कटिंग/बिचड़ा/ बीज 20 2-3 सफेद, बैगनी, गुलाबी क्यारियों में झुंड में लगाने हेतु।