A. प्रजनन सम्बंधित बीमारियाँ

1. डिस्टोकिया
  • परिपक्तव गर्भ के बाद गाय को बछड़े का जन्म देने में कठिनाई हो तो इस अबस्था को डिटोसिए कहतें हैं।
NADIS - National Animal Disease Information Service
डिस्टोकिया

वर्गीकरण: –

a. मटेरनल डिस्टोकिया   : –

कारण :                                          

  • मादा पशु के जननांग मार्ग की असामान्य स्थिति के कारण
  • संकीर्णसर्विक्स , सर्विक्स का फैलने में विफलता                                                       
  • गर्भाशय का मुड़ जाना, गर्भाशय के संकुचन की कमी या अनुपस्थिति                                               
  • गर्भाशय हर्निया                                            

कारण: –

  • भ्रूण की असमान्य  स्थिति
  • भ्रूणका बड़ा आकार
  • भ्रूणकी विकासात्मक असामान्यताएं
  • जुड़वांभ्रूण
  • भ्रूण केरोग जैसे हीड्रोसेफलस , ड्रॉप्सी
  • भ्रूण की असामान्य  स्थिति ।   
Dystocia in cow - YouTube
डिस्टोकिया मैनुअल सुधार

   लक्षण:

  • यदि पानी की थैली दो घंटे तक दिखाई देती है और गाय कोशिश नहीं कर रही है।
  • यदि गाय 30 मिनट से अधिक समय से प्रयास कर रही है और कोई प्रगति नहीं कर रही है।
  • यदि प्रगति की अवधि के बाद गाय ने 15-20 मिनट की अवधि के लिए प्रयास करना छोड़ दिया है।
  • यदि गाय या बछड़ा थकान और तनाव के लक्षण दिखा रहा है जैसे कि बछड़े की सूजी हुई जीभ या गाय के मलाशय से गंभीर रक्तस्राव।
  • यदि यह प्रतीत होता है कि डिलीवरी असामान्य है, उदाहरण के लिए, एक पिछड़ा हुआ बछड़ा, केवल एक पैर, आदि।
  • यदि उपयुक्त में से कोई भी स्थिति हो तो आपको पशुचिकित्सक की सहायता से बच्चे को बहार निकलने का शीघ्र प्रयास करनी चाहिए।

उपचार :

  • भ्रूणकी स्थिति, आसन और प्रस्तुति का मैनुअल सुधार ।
  • जबरन कर्षणद्वारा भ्रूण की निकासी ।
  • एपिडोसिन की इंजेक्शन, गर्भाशय ग्रीवा अधूर फैला है तो ।
  • ऑक्सीटोसिन की  इंजेक्शन , अगर गर्भाशय के संकुचन कमजोर या अनुपस्थित  रहे हैं।
  • फोइटोटोमी

बचाव :

  • उचित उम्र में नस्ल।
  • गर्भवती पशुओं को पर्याप्त पोषण प्रदान करें।
  • गर्भावस्था के दौरान पर्याप्त व्यायाम दें।
  • गर्भावस्था केदौरान लंबी दूरी के परिवहन से बचें ।
  • गर्भवती जानवरों में रोलिंग, संघर्ष, गिरने और कूदने से बचें।
  • भ्रूण केसामान्य निष्कासन तक आंशिक जानवरों की देखभाल और ध्यान ।

2. अनेस्ट्रोस

              गाय या भैस काऑस्ट्रस चक्र/ गर्मी में नहीं आना।

  कारण: –

  1. गैर-कार्यात्मक ओवरी और ऑस्ट्रस की अनुपस्थिति ।
  2. इन्फरटाइल ओवरी या फॉलिकल विकसित न होना
  3. फिजियोलॉजिकल – यौवन से पहले, गर्भावस्था के दौरान, पारचुरीसन के बाद
  4. हार्मोनल परसिस्टेंट कॉर्पसल्यूटियम
  5. पैथोलॉजिकल-  पयोमेट्रा या मैट्रिटिस, परसिस्टेंट कॉर्पस ल्यूटियम

उपचार : –

  • इन्फरटाइल ओवरीके लिए:-
  • प्रजना@ 2 टैब / दिन 3 दिनों के लिए
  • प्रोलूटनडिपोट @ 250 मिलीग्राम I / M केवल एक बार।
  • परसिस्टेंट कॉर्पस ल्यूटियम के लिए:-
  • प्रोस्टाग्लैंडीन – लुटलाइस @ 25 मिलीग्राम I / M
  • गर्भाशय के संक्रमण की जाँच करने के लिएपैरेंट्रल और अंतर्गर्भाशयी मार्ग द्वारा एंटीबायोटिक्स ।

3. रिपीटब्रीडिंग

  • सामान्यऑस्ट्रस चक्र वाली गाय लेकिन 3 से 4 लगातार सेवाओं के भीतर गर्भ धारण करने में विफल ।

कारण : –

  • जेनिटल पथ में आनुवंशिक / शारीरिक दोष।
  • शुक्राणु असामान्यताएं
  • ओवम की असामान्यताएं
  • शुक्राणु या ओवा का बुढ़ापा
  • हार्मोनल शिथिलता
  • मादा पशु के जेनिटल पथ का संक्रमण
  • पोषण संबंधी कारक
  • प्रबंधकीय कारक- लंबी दूरी के परिवहन का तनाव, सहीसमय में गर्मी का पता लगाने में विफलता , वीर्य का अनुचित रखाओ,जमे हुए वीर्य का अनुचित थाविंग    , अनुचित एआई, गर्भाधान का अनुचित समय।

उपचार: –

  • एस्ट्रल संबंधी निर्वहन स्पष्ट नहीं है, तो एंटीबायोटिक दवाओं के साथ अंतर्गर्भाशयी चिकित्सा, AI या प्राकृतिक सर्विस के 6 घंटा पहले ।

4. ओवेरियन सिस्ट 

      ओवेरियन सिस्ट दो प्रकार का है : –
1. फॉलिकुलर सिस्ट

लक्षण: –  

  • लघुओस्ट्रस चक्र                                                                                                                       
  • लगातारओस्ट्रस गतिविधि                                                
  • अंडाशय पर पतले कई सिस्ट होते है

2. ल्यूटल सिस्ट

LORI.bovine
ल्यूटल सिस्ट

लक्षण: –

  • कोई ऑस्ट्रस चक्र नहीं
  • अंडाकार ऑस्ट्रस पर मोटी दीवार वाली एकल पुटी

4. योनि और गर्भाशय का प्रोलैप्स: –  

Approaches to correcting uterine prolapse in cows | Vet Times
गर्भाशय का प्रोलैप्स

            पारचुरीसन से पहले या बाद में देखा जाता है, जेनिटल अंगों का विचलन।

कारण: –

  • प्रोजेस्टेरोन का निम्न स्तर।
  • मूत्रजननांगी संक्रमण जैसे गर्भाशयग्रीवाशोथ और योनिशोथ  ।
  • डिस्टोकिया।
  • चोट लगना।
  • प्लासेंटा का प्रतिधारण।

लक्षण: –

  • वल्वा के बाहर गर्भाशय, सर्विक्स और/या योनि का झूलना ।
  • निरंतर तनाव।
  • प्रोलैप्सड जगहपर घाव या चोट।
  • बेचैनी।
  • शरीर के तापमान में वृद्धि।
  • गंभीर मामलों में भूख और मौत का नुकसान।

उपचार: –

  • एंटीसेप्टिक समाधान के साथ प्रोलैप्सड द्रव्यमान का धुलाई।
  • प्रोलैप्सड भाग पर एंटीसेप्टिक मरहम लगाना।
  • ठंड फ़ोमेंटेशन द्वारा फैला हुआ भाग को कम करना।
  • मैन्युअल रूप से प्रोलैप्सड भाग को उसके अपने जगह पे स्थानांतरित करना ।
  • यदि एंटीपार्टम प्रोलैप्स , प्रोजेस्टेरोन  का इंजेक्शन हर 10 वें दिन दें।
  • अगर प्रसव के बाद प्रोलैप्स हो जाता है, तो अंतर्गर्भाशयी एंटीबायोटिक चिकित्सा दें।

प्रोफिलैक्सिस: –

  • जलन या खिंचाव के कारणों को खत्म करें।
  • प्रसव के समय अनावश्यक कर्षण से बचें।
  • प्लेसेंटा को हटाने के लिए वजन लागू न करें।

6) प्लासेंटा का प्रतिधारण (ROP):-

Retention of Placenta in Cattle - Prof. U. K. Atheya, Dairy Animal ...
प्लासेंटा का प्रतिधारण

      प्रसव के 12 घंटे के बाद भी जड़ का न गिरना।

कारण : –

  • गर्भपात
  • डिस्टोकिया
  • समय से पहले डिलीवरी
  • व्यायाम की कमी
  • ऑक्सीटोसिन और / या एस्ट्रोजन जैसे हार्मोन की कमी
  • ब्रुसेलोसिस, ट्राइकोमोनीसिस जैसे संक्रमण
  • कैल्शियम या फास्फोरस की पोषण की कमी

लक्षण: –

  • प्रसव के 12 घंटे के बाद भी प्लेसेंटा के निष्कासन की विफलता
  • तनाव
  • सड़ा महक का निर्वहन
  • बुखार
  • भूख में कमी
  • सुस्ती और अवसाद

उपचार : –

  • प्लेसेंटा को मैन्युअल रूप से निकालें
  • ऑक्सीटोसिनइंजेक्शन IM, प्रसव के लगभग 12 घंटे बाद
  • 1-2 दिनों के लिए2-4 फ़्यूरिया बोलस इंट्रायूटरिन रखें
  • रेप्लेंटापाउडर @ 50 ग्राम / दिन, मौखिक रूप से 3-4 दिनों के लिए
  • कम से कम3 दिनों के लिए एंटीबायोटिक दवाओं के पेरेंटल थेरेपी

प्रोफिलैक्सिस: –

  • उचित उम्र में नस्ल
  • प्रसव के समयचोट या बिना जरूरी कर्षण से बचें
  • पर्याप्त पोषण प्रदान करें
  • संक्रामक रोगों पर नियंत्रण
B) गाय एवं भैंस का बैक्टीरियल रोग
  1. हेमोरेजिक सेप्टिसीमिया: – ( पर्यायवाची – गलघोंटू, पेस्टेलेरोसिस, शिपिंग बुखार, घाटसर्प )
  • मवेशी, भैंस, भेड़, बकरी की एक संक्रामक बीमारी।
  • आमतौर पर चरम पर्यावरणीय परिस्थितियों, कुपोषण और लंबी दूरी के परिवहन के दौरान होता है।
  • आमतौर पर बरसात के मौसम के दौरान होता है।
Recent Trends in Spontaneous Cases of Hemorrhagic Septicemic ...
हेमोरेजिक

कारण : –  पास्चरेला मल्टोसीदा

संचरण  –  1) दूषित खाना और पानी का अंतर्ग्रहण

                  २) साँस लेने  से

Buffalo death triggers panic in Odisha's Kendrapara | Cities News ...
भैस में गलाघोटू

लक्षण: –

  • तेज बुखार (106-107 एफ)
  • नाक से लगातार बहाव
  • सांस लेने में कठिनाई / खर्राटे
  • गला सूजन ( सबमांडिबुलरएडिमा )
  • तेज़ नाड़ी और हृदय की गति
  • लगातार लार औरआँख से पानी निकलना
  • 10-72 घण्टे के भीतररिकम्बेन्सी और मृत्यु।

Haemorrhagic Septicaemia in Buffaloes and its Therapeutic ...

उपचार : – 

  • उपचार रोग की प्रारंभिक अवस्था में दिए जाने पर प्रभावी।
  • उपचार और परामर्श के पशुचिकित्सक की सलाह अवश्य लें

नियंत्रण :-

  • प्रभावित पशुओं का अलगाव और उपचार।
  • मृत जानवरों को जलाना या दफनाना।
  • दूषित खाना और चारे का उचित निपटान।
  • मवेशियों के शेड में कीटाणुशोधन।
  • चरम मौसम के लिए लंबी दूरी के परिवहन और जोखिम से बचें।
  • मानसून से पहले हर साल टीकाकरण @ 5 मिलीलीटर SC।

2)  ब्लैक क्वार्टर : – (पर्यायवाचीलंगड़ा बुखार, काला पैरफरया )

  • मवेशी, भैंस, भेड़ और बकरियों की, संक्रामक और अत्यधिक घातक बीमारी।
  • शरीर की अच्छी स्थिति में 6-24 महीने के बीच के युवा मवेशी ज्यादातर प्रभावित होते हैं।
  • मिट्टी जनित संक्रमण।
  • बरसात के समय होता है।

AN OUTBREAK OF BLACK QUARTER IN A BUFFALO HERD IN THE SOUTHERN ...

कारण : –

  • क्लोस्ट्रीडियमचौवोई

संचरण : –

  • दूषित खाने का अंतर्ग्रहण
  • घाव का दूषित होना

Clostridium chauvoei - AB's Veterinary Microbiology

लक्षण: –

  • बुखार (106- 108 एफ)
  • प्रभावित पैर में सुस्ती
  • कूल्हे, पीठ, कंधे पर क्रेपिटेटिंग सूजन
  • सूजन शुरुआती दौर में गर्म और दर्दनाकहोती है जबकि बाद में ठंड और दर्द रहित होती है
  • सांस लेने में कठिनाई

Black leg

उपचार: –

  • उपचार और परामर्श के पशुचिकित्सक की सलाह अवश्य लें

प्रोफिलैक्सिस: –

  • संक्रमित जानवरों का अलगाव।
  • शव  को गढ्ढे में चूना डालके गाड़ दे ।
  • उपयोग करने से पहले सर्जिकल उपकरणों का उचित कीटाणुशोधन।
  • प्रभावित क्षेत्र में चराई करने की अनुमति न दें।
  • वर्षा ऋतु से पहले प्रत्येक वर्ष टीकाकरण @ 5 मिली SC।

3) एंथ्रेक्स : – (पर्यायवाची – स्प्लीनीक बुखार, वूल सॉर्टर रोग, फांशी, कलपुली )

Anthrax

  • मवेशी, भैंस, भेड़, बकरी की संक्रामक बीमारी।
  • मनुष्य में फैलने वाली बीमारीयानी ज़ूनोटिक रोग।
  • यह मिट्टी जनित संक्रमण है।
  • यह आमतौर पर प्रमुख जलवायु परिवर्तन के बाद होता है।

कारण : – बेसिलस एंथ्रेसिस       . 

संचरण:

  • आमतौर पर दूषित खाना और पानी के अंतर्ग्रहण से फैलता है।
  • स्वांस और मक्खियों द्वारा काटने काटने से भी।

लक्षण: –

  • शरीर केतापमान में अचानक वृद्धि । ( 104-108 एफ)।
  • डिस्पेनिया(सांस लेने में कठिनाई)
  • गुदा, नथुने, वल्वा आदि जैसे प्राकृतिक छेद से रक्तस्राव ।
  • अचानक मौत।

उपचार : – 

  • प्रारंभिक अवस्था में दिए जाने पर प्रभावी।
  • उपचार और परामर्श के पशुचिकित्सक की सलाह अवश्य लें

नियंत्रण:-

  • प्रभावित जानवरों की पहचान और अलगाव।
  • संक्रमित क्षेत्र से स्वच्छ क्षेत्र में जानवरों को ले जाने से रोका जाना चाहिए।
  • मृत जानवरों का गहरा दफन।
  • दूषित चारे को जलाकर नष्ट करें।
  • 10% कास्टिक सोडा या फॉर्मेलिन या फिनाइल का उपयोग करके मवेशियों के पूरे कीटाणुशोधन।
  • कभी भी पोस्टमार्टम न करवाएं जिस जानवर की मौत एंथ्रेक्स से हुई हो।
  • मानसून की शुरुआत से पहले हर साल टीकाकरण @ 1 मिलीलीटर SC।

4. ब्रूसेलोसिस: – (पर्यायवाचीबैंग रोग, संक्रामक गर्भपात)

Brucellosis in Cattle (Contagious abortion, Bang's disease ...

  • यौन परिपक्व घरेलू जानवरों की संक्रामक बीमारी।

कारण : – ब्रुसेला अबोर्टस 

संचरण: –

  • गर्भस्थ भ्रूण केनिर्वहन के साथ दूषित खाना और पानी की अंतर्ग्रहण ।
  • साँस लेना
  • योनि से सहवास के दौरान ।
  • अविकसित त्वचा या कंजाक्तिवा

Gram-stained smear of B. abortus strain 99 in Brucella agar after ...

लक्षण: –

  • मुख्य रूप से गर्भावस्था के अग्रिम चरण के दौरान गर्भपात।
  • प्लासेंटा का प्रतिधारण।
  • अपारदर्शी योनि स्राव।
  • बांझपनयानी कम गर्भाधान दर।

उपचार : – कोई उपचार नहीं

नियंत्रण:-

  • वर्ष में कम से कमएक बार पूरे झुंड का ब्रुसेलोसिस  परीक्षण करें ।
  • संक्रमित या वाहक जानवरों का वध।
  • कृत्रिम गर्भादान  को अपनाना।
  • गर्भस्थ भ्रूण, प्लेसेंटा और गर्भाशय के निर्वहन का उचित निपटान ।
  • संक्रमित परिसर की कीटाणुशोधन।
  • झुंड में पेश करने से पहले नए खरीदे गए जानवरों का 30 दिनों केअंतराल पर ब्रूसेलोसिस के लिए परीक्षण किया जाना चाहिए ।
  • गर्भवती पशुओं को नहीं खरीदना चाहिए।
  • टीकाकरण @ 5 मिलीलीटरSC ।
C) वायरल बिमारियाँ

1) रिंडरपेस्ट: ( समानार्थी– मवेशी प्लेग, गोजातीय टाइफसबल्कंडी )

  • जुगाली करने वालों और सूअरों की अत्यधिक संक्रामक वायरल बीमारी।
  • विदेशी, क्रॉसब्रेड और युवा मवेशी अतिसंवेदनशील होते हैं।
  • ज्यादातर बारिश के मौसम में होता है।
  • रोग अब भारत से लगभग मिटा दिया गया है।

कारण : – पैरामाइक्सोवायरस

संचरण: –

Rinderpest - Wikipedia

  • साँस लेना
  • दूषित खाना और पानी की अंतर्ग्रहण।

लक्षण: –

  • बुखार आमतौर पर 3 दिनों तक रहता है।
  • कंजक्टिवा गहरे लाल रंग का हो जाता है
  • मौखिक बलगम झिल्ली पर नेक्रोटिक अल्सर या कटाव।
  • लlर निकालना
  • शूटिंग दस्त
  • पेट में दर्द
  • 6- 12 घंटे के भीतर मौत।

उपचार: –

  • बहुत कमकारगर  है, हालांकि प्रभावित जानवरों के बीच मृत्यु दर को कम करने में उपचार फायदेमंद साबित हो सकता है।
  • उपचार और परामर्श के पशुचिकित्सक की सलाह अवश्य लें

नियंत्रण:-

  • बीमार पशुओं की अलगाव और पहचान।
  • प्रभावित क्षेत्र से घरेलू पशुओं के आयात पर पूर्ण प्रतिबंध।
  • मृत जानवरों का निपटान।
  • दूषित शेड और परिसर की कीटाणुशोधन।
  • टीकाकरण @ 1 मिलीलीटर SC प्रत्येक वैकल्पिक वर्ष।

2) खुरपकामुँहपका रोग (FMD): – ( पर्यायवाची शब्दअपथुस ज्वरखुरकुट )

Foot-and-mouth disease - Wikipedia

  • क्लोवेन फूटेड जानवरोंयानी मवेशी, भैंस, भेड़, बकरी, सुअर की अत्यधिक संक्रामक बीमारी ।
  • सर्दियों के अंत मेंयानी फरवरी और मार्च में होता है ।

  कारण: –

  • पिकोर्नावायरस ( एपथोवायरस )
  • वायरस के सात प्रमुख उपभेद – ओ, ए, सी, एशिया -1, सैट -1, सैट – 2, सैट – 3
  • भारत में- ओ, ए, सी, एशिया- 1

संचरण: –

  • आमतौर पर दूषित खाना और पानी के माध्यम से फैलता है।
  • वायु जनित संक्रमण भी हो सकता है।
  • माँ से बछड़े को संक्रमण हो सकता है।

PDF) Foot and Mouth Disease: A Threat to Livestock Health ...

लक्षण: –

  • 24- 48 घंटे तकबुखार (104-106 F)।
  • जीभ, दंत पैड और मौखिक श्लेष्मा पर छाले /वेसिक्लस और अल्सर।
  • वेसिक्लस और अल्सर उंगलिओं के बीच में और कोरनेट पर।
  • लंगड़ापन।

उपचार: –

  • कोई विशिष्ट उपचार नहीं है,रिकवरी में तेजी लाने और जटिलताओं से बचने के लिए उपचार किया जा सकता है।
  • उपचार और परामर्श के पशुचिकित्सक की सलाह अवश्य लें

नियंत्रण:-

  • पता लगाने के तुरंत बाद प्रभावित जानवरों का अलगाव।
  • पशु के चलने पर प्रतिबंध।
  • दूषित बिस्तर और चारे को जलाया जाना चाहिए।
  • कैटल शेड को 1- 2% कास्टिक सोडा या फॉर्मेलिन से साफ और कीटाणुरहित करना चाहिए।
  • परिचारिकाओं के सभी बर्तन और कपड़े की पूरी तरह से कीटाणुशोधन।
  • जानवरों को आम चरागाह में चरने या तालाबों और नदियों का पानी पीने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
  • बछड़ों को प्रभावित माताओं को चूसने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
  • टीकाकरण @ 3 मिलीलीटर SC – रक्षाएफएमडी

3: रेबीज – (पर्यायवाचीहाइड्रोफोबिया, पागलपनपिसाल्न )

  • सभी गर्म खून वाले जानवरों की अत्यधिक घातक वायरल बीमारी।
  • मनुष्य में फैलने वाली बीमारी ।

Rabies alert issued after Mercer County cow bites owner - WFMJ.com

कारण : – रबदो वायरस

संचरण: –

  • लगभग हमेशा पागल जानवरों के काटने से।
  • संक्रमित जानवरों की ताजा लार द्वारा त्वचा के घावों का दूषण से ।

लक्षण: –

क) उग्र रूप:

  • व्यवहार में परिवर्तन।
  • बेचैनी और उत्तेजना।
  • यौन उत्तेजना
  • ध्वनि और चलन के प्रति संवेदनशील।
  • चेतन या निर्जीव वस्तुओं को काटने की प्रवृत्ति।
  • बार बार लार निकलना
  • कर्कश शोर के साथ लगातार और जोर से भौंकना / रंभाना ।
  • मवेशियों में 2-4 दिन और कुत्तों में 8-10 दिन के भीतर मौत हो जाती है।

बी) पैरालिटिक / डंब फॉर्म:

  • घटती संवेदना।
  • निचले जबड़े का झूलनाऔर जीभ के फलाव।
  • चलने में असमर्थ
  • लार का गिरना।
  • रंभाना / भौंकने का बेजोड़ प्रयास।
  • भोजन और पानी को निगलने में असमर्थता।
  • प्रगतिशील पैरालिसिस।
  • 6-7 दिनों के भीतर मौत।

क्लीनिकल रेबीज के लिए कोई उपचारात्मक उपचार नहीं, कुत्ते के काटने के बाद उपचार दिया जाना चाहिए:उपचार: –

  • उपचार और परामर्श के पशुचिकित्सक की सलाह अवश्य लें

नियंत्रण:-

  • पागल जानवरों की पहचान और विनाश।
  • आवारा कुत्तों का विनाश।
D) प्रोटोजोआ से होने वाली बिमारियाँ

1) ट्रिपैनोसोमियासिस (सरा )

File:Trypanosoma-evansi-rat-blood-Giemsa-stain.jpg - Wikimedia Commons

  • प्रोटोजोआ से होने वाला रोग जो मवेशियों, भैंस, भेड़, बकरी, घोड़े, ऊँट में पाया जाता है।
  • मानसून और बारिश के मौसम में सबसे आम है।

संचरण : – मुख्य रूप से टेबेनस  प्रजाति की मक्खियों के काटने से ।

लक्षण: –

क) तीव्र रूप: –

  • बुखार
  • गोल घूमने की क्रिया
  • समन्वय में न होना
  • कठोर वस्तुओं के विरुद्ध सिर दबाना।
  • अंधापन
  • आक्षेप और मृत्यु

ख) क्रोनिक रूप: –

  • रुक-रुककर बुखार आना
  • अपर्याप्त भूख
  • दूध उत्पादन में गिरावट
  • शरीर के वजन में कमी
  • खून की कमी

उपचार: –

  • उपचार और परामर्श के पशुचिकित्सक की सलाह अवश्य लें

नियंत्रण:-

  • मक्खियों का नियंत्रण।
  • स्वच्छता के उपाय।
  • प्रभावित पशुओं का पता लगाने, अलगाव और उपचार।

2) थैलेरिओसिस: – (पर्यायपूर्वी तट बुखार, टिक बुखार)

  • विदेशी और क्रॉसब्रेड मवेशियों के महत्वपूर्ण प्रोटोजोआ रोग।
  • ज्यादातर गर्मियों और बरसात के मौसम के दौरान मनाया जाता है।
  • युवा बछड़ों को अतिसंवेदनशील होते हैं।

Infection dynamics of Theileria annulata over a disease season ...

कारण : – थिलेरिआ अनुलाटा  या थिलेरिआ परवा

संचरण: – टिक के द्वारा

 लक्षण:

Collection and Processing of Lymph Nodes from Large Animals for ...

  • तेज बुखार कई दिनों तक बना रहता है।
  • सतहीलिम्फोड्स की सूजन / वृद्धि ।
  • खून की कमी
  • पीलिया
  • 7- 10 दिनों के भीतर मृत्यु

Bovine theileriosis in Australia: a decade of disease

उपचार: – उपचार और परामर्श के पशुचिकित्सक की सलाह अवश्य लें

Malignant Catarrhal Fever « Disease Images « CFSPH

नियंत्रण:-

  • जानवरों के शरीर पर और मवेशियों के शेड में कीटनाशकों के छिड़काव से टिक्स का नियंत्रण।
  • टीकाकरण @ 3 मिली SC हर तीन साल में।

3) बबेसिओसिस : – (पर्यायवाचीटिक बुखारपीरोप्लास्मोसिस , रेड वाटर)

  • विदेशी और क्रॉसब्रेड मवेशियों में अधिक आम है।

      कारण : – बबेसिआ बीजेमिना या बबेसिआ बोविस

Babesiosis - Circulatory System - Veterinary Manual

संचरण: – टिक काटने के माध्यम से

लक्षण : –

  • उच्च बुखार
  • कॉफी केरंग का मूत्र यानी हीमोग्लोबिनुरिया
  • पीलिया
  • डिस्पेनोआ(मुश्किल साँस लेना)

Babesiosis - YouTube

उपचार : – उपचार और परामर्श के पशुचिकित्सक की सलाह अवश्य लें

नियंत्रण:

  • कीटनाशकों के छिड़काव से टिक्कों का नियंत्रण।
  • टीका

5) कोक्सिडीओसिस :-

Coccidiosis affecting young calves in North Dakota | Canadian ...

  • बछड़ों, भेड़ के बच्चे , बकरी के बच्चों, पिल्ले में होता है ।

कारण : – एमीरिया प्रजाति

लक्षण:

  • डयरियाया पेचिश
  • मलमें रक्त और बलगम होता है।
  • मलमें  उसीस्ट का मिलना ।

उपचार: – उपचार और परामर्श के पशुचिकित्सक की सलाह अवश्य लें

6) ट्राइकोमोनिएसिस रोग

InPouch® TF-Bovine - Prepared Media Broth for Tritrichomonas ...

  • गोजातीय में होता है

कारण: – ट्राइकोमोनास फ़ीटस

संचरण : – सहवास द्वारा

लक्षण: –

  • प्रारंभिक गर्भपात
  • श्लेष्मकयोनि स्राव
  • पयोमेट्रा
  • अपरा का प्रतिधारण

4) एनाप्लाज्मोसिस (रिकेट्सियल रोग)

Anaplasmosis - Wikipedia

  • बकरी, भेड़, गोजातीय में होता है।
  • टिक के द्वारा होता है ।

कारण : – एनाप्लास्मा मार्जिनेले

लक्षण:

  • लगातार बुखार
  • आँख से आँशु निकलना
  • नाक बहना
  • स्प्लीन और लीवर के आकार में वृद्धि
  • पीलिया

उपचार: – उपचार और परामर्श के पशुचिकित्सक की सलाह अवश्य लें

E( अन्तः परजीवी से होने वाली बिमारियाँ
1. नेमाटोड या गोल कीड़े: –

Parasite Facts - Sirona Animal Health

  • वे दोनों छोरों पर लम्बी, बेलनाकार और पतला होते हैं।
  • जुगाली करने वालों में पाए जाने वाले गोल कीड़े हैं: –
  • पेट के कीड़े –  हेमोंकस, ओस्टरटेजीआ, ट्रीकोस्ट्रॉन्गीलस
  • छोटे आंत के कीड़े – निओएस्केरिसया टोक्सोकारा , कूपेरिआ   
  • बड़ी आंत के कीड़े – ट्रिचोरिस, ओसोफैगोस्टोमम

संचरण : – अंडे या संक्रामक लार्वा का अंतर्ग्रहण

लक्षण: –

  • शरीर के वजन कानुकसान
  • सूखे और खुरदरे बाल
  • खराब विकास दर
  • पॉट- बेली
  • लगातार दस्त होना
  • खून की कमी
  • पाइका

Internal Parasites | Zoetis AU

उपचार: – उपचार और परामर्श के पशुचिकित्सक की सलाह अवश्य लें

नियंत्रण:-

  • प्रभावित पशुओं का अलगाव और उपचार
  • पशु शेड की सफाई
  • चारा और पानी गोबर से दूषित नहीं होना चाहिए
  • युवा और बूढ़े जानवरों को एक साथ न रखें
  • रोटेशनल चराई को प्रोत्साहित करना होगा
  • डीवॉर्मिंगकिया जाना चाहिए कम से कम  एक वर्ष में दो बार (मानसून से पहले और बाद)
  • नियमित अंतराल पर झुंड के मल के नमूनों की जांच

2) सिस्टोड्स या टैपवार्म –

Be vigilant when it comes to tapeworms | Manitoba Co-operator

  • वे समतल, खंडित या टेप जैसेकीड़े होते हैं । इनकी लंबाई 2 मिमी से 20 मीटर तक होती है।

कारण: –

  • जुगाली करने वालों में पाए जाने वाले सामान्य टैपवॉर्म  जो मोनीजिया प्रजातियां हैं
  • आंत में परिपक्व टैपवार्म पाए जाते हैं
  • संचरण: – ओरिबाटिड माइट्स
  • लक्षण: –
  • शरीर के वजन में कमी
  • अवरुद्ध विकास
  • रुखड़ा शरीर का चमड़ा
  • मटके जैसा  पेट
  • दस्त और कब्ज
  • खून की कमी
  • मल में टैपवार्म खंडों का उत्सर्जन
  • उपचार: – उपचार और परामर्श के पशुचिकित्सक की सलाह अवश्य लें
  • नियंत्रण:-
  • ओरिबाटिड माइट्स नियंत्रित करने के लिए कीटनाशक का छिड़काव 
  • सूर्योदय से पहले और सूर्यास्त के बाद दूशित चारे  की चरा ई से बचे
  • नियमित रूप से डीवॉर्मिंग  करना
  • स्वच्छता की स्थिति बनाए रखें

Flatworm Diseases - Advanced | CK-12 Foundation

3) ट्रेमाटोड्स या लीवर फ्लूक्स/बोतल जॉ

Lifecycle of Liver Fluke | SCOPS

  • वे सपाट, चौड़ा पत्ती जैसे कीड़े होते हैं

कारण: –

  • फासिओलाहेपेटिका या फासिओला जाइज़ैंटिका
  • घोंघे मध्यवर्ती मेजबान हैं

संचरण : – दूषित चरागाह और पीने के पानी के अंतर्ग्रहण के माध्यम से फैलता है

Thermography -TrueRifeScan Clinic - Liver fluke: Symptoms and ...

लक्षण: –

  • वजन में कमी
  • भूख में कमी
  • दुर्बलता
  • बोतल जबड़ा (ठुड्डी के नीचे सूजन)
  • खून की कमी
  • क्रोनिक दस्त
  • 2- 3 महीने के भीतर मृत्यु

उपचार: – उपचार और परामर्श के पशुचिकित्सक की सलाह अवश्य लें

नियंत्रण:-

  • प्रभावित पशुओं का उपचार
  • घोंघे का नियंत्रण
  • कम झूठ बोलने वाले या दलदली क्षेत्रों जैसेनदी के किनारे, तालाब आदि में चराई से बचें
  • साल में दो बारफ्लुकीसाइड्स का उपयोग

Toxocara (syn . Neoascaris) vitulorum | SpringerLink

F) बाह्य परजीवी से होने वाली बीमारिआं

 बाह्य परजीवी पशुओं के निम्नलिखित समूहों में विभाजित किया जा सकता है: –

  1. जू        

                  Head Lice Pictures: What Do Lice Look Like?                    

2. टिक    

                Tick Fevers of Cattle  

3.  फ्लीस

Pale Giant Horse-fly (Tabanus bovinus) ?? | Facebook Not 100… | Flickr

4. माइट्स                                                                                                                                                                                                        

       Mites of livestock - Wikipedia  Lice infestations on cattle | Agriculture and Food   

लक्षण: –

  • जलन
  • बालों का झड़ना
  • बेचैनी
  • खून की कमी
  • शरीर के वजन में कमी
  • दूध और मांस उत्पादन में कमी
  • विकास दर में कमी

उपचार: – उपचार और परामर्श के पशुचिकित्सक की सलाह अवश्य लें

नियंत्रण:-

  • प्रभावित पशुओं का अलगाव और उपचार
  • मवेशियों में कीटनाशक का छिड़काव नियमित अंतराल पर करें
  • पशु शेड की दीवार की दरारें बंद करें
  • स्वच्छता की स्थिति बनाए रखें

डायरिया

कारणः

  1. सड़ा हुआ हरा चारा, फफुंदी लगा पशु आहार या अनाज खिलाने से
  2. गंदा पानी पिलाने से, पेट में कीड़ा होने से
  3. पेट में किसी प्रकार के इन्फेक्शन के कारण

लक्षणः

  1. बार-बार पतला पैखाना (गोबर) करना एवं उसमें दुर्गन्ध या बदबु आना
  2. निर्जलीकरण (डीहाइड्रेशॅन) होना
  3. बुखार आना, खाना पीना छोड़ देना
  4. शरीर कमजोर हो जाना, दूध कम हो जाना

समाधानः

  1. शुरूआत के समय भात के माड़ को पतला करके उसमें हल्का नमक डालकर बार-बार पिलाना चाहिए
  2. निर्जलीकरण को दूर करने के लिए ओ आर एस का घोल पिलाना।
  3. दस्त बन्द नहीं होने पर पशु चिकित्सक से सम्पर्क करें

चोट/घाव में कीड़े

समस्याः

  1. घाव में कीड़े।
  2. सामान्य चोट, चोट की जगह पर मक्खियों का अंडे देना।
  3. कीड़ों की वजह से छोटी सी चोट का बड़ा घाव बनना।
  4. घाव में बैक्टीरिया के इन्फेक्शन की वजह से मवाद का पैदा होना।

लक्षणः

  1. चोट लगने या कट जाने के पश्चात ध्यान नहीं देने से घाव हो जाता है तथा घाव में कीड़े पड़ जाते हैं।
  2. पुराने घाव में मक्खी बैठती है तथा अण्डा देती है और कीड़ा बन जाता है।
  3. घाव में इन्फेक्शन की वजह से मवाद (पीला पस) का पैदा होना।

समाधानः

  1. जहाँ घाव हो जाता है वहाँ फूल जाता है, नोचते रहता है।
  2. जानवर घाव को चाटते रहते हैं और घाव धीरे-धीरे बड़ा होने लगता है।
  3. पक्षी द्वारा घाव में खोंचड़ मारने से भी घाव बड़ा हो जाता है।
  4. चोट या कट जाने पर तुरंत लाल पोटाश से धो कर टिंचर आयोडिन लगा देना चाहिए ताकि घाव बड़ा न हो।
  5. पशु चिकित्सक से सम्पर्क करें।

थनैला बीमारी

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समस्याः

यह थनों का संक्रामक रोग है, जो जानवरों को गंदे, गीले और कीचड़ भरे स्थान पर रखने से होता है। थन में चोट लगने, दूध पीते समय बछड़े/बछिया का दाँत लगने या गलत तरीके से दूध दूहने से इस रोग की संभावना बढ़ती है। यह रोग ज्यादा दूध वाली गायों/भैंसों में अधिक होता है।

लक्षणः

  1. थन में सूजन तथा दर्द होता है और कड़ा भी हो जाता है।
  2. दूध फट जाता है या मवाद निकलता है। कभी-कभी दूध पानी जैसा पतला हो जाता है।

रोकथाम:

इस बीमारी का टीका न होने के कारण रोकथाम के लिए ध्यान देना पड़ता हैः

  • थनों को बाहरी चोट लगने से बचाएँ।
  • पशु-घर को सूखा रखें, समय-समय पर चूने का छिड़काव करें और मक्खियों को नियंत्रित करें। दूध दूहने के लिए पशु को दूसरे स्वच्छ स्थान पर ले जायें।
  • दूध-दूहने से पहले थनों को खूब अच्छी तरह से साफ पानी से धोना न भूलें। दूध जल्दी से और एक बार में ही दूहें, ज्यादा समय न लगाएँ। दूध दूहने से पूर्व साबुन से अपने हाथ अवश्य धो लें।
  • थनैला बीमारी से ग्रस्त थन का दूध अंत में एक अलग बर्त्तन में दूहें तथा उसे उपयोग में न लायें।
  • घर में स्वस्थ पशुओं का दूध पहले और बीमार पशु का दूध बाद में दूहें।
  • दूध दूहने के पश्चात थन को कीटाणुनाशक घोल से धोयें या स्प्रे करें।
  • दूध दूहने के बाद थन नली कुछ देर तक खुली रहती है व इस समय पशु को फर्श पर बैठ जाने से रोग के जीवाणु थन नली के अन्दर प्रवेश कर बीमारी फैलाते हैं। अतः दूध दूहने के तुरंत बाद दुधारू पशुओं को पशु आहार दें जिससे कि वे कम से कम आधा घंटा फर्श पर न बैठें।
  • दूधारू पशुओं के दूध समय-समय पर (कम से कम माह मे एक बार) ‘मैस्टेक्ट’ कागज से जाँच करते रहें। पशु के रोग से प्रभावित थन में दवा लगायें।
  • दूध सूखते ही थनैला रोग से बचने वाली दवा थनों में अवश्य लगायें।

उपचारः

  • उपचार और परामर्श के लिए चिकित्सक से तत्काल सलाह लेनी चाहिए।
  • थनैला ग्रसित पशु के दूध, उपचार के दौरान तथा उपचार समाप्त होने के कम से कम चार दिन तक किसी प्रकार के उपयोग में नहीं लाना चाहिए, न तो समिति में देना चाहिए क्योंकि इस दूध को पीने से मनुष्य में गले एवं पेट की बिमारियाँ हो सकती हैं।