मछली में जीवाणुओं से संक्रमण

कारण –   यह रोग ऐरोमोनास और सुडोमोनास जीवाणु के कारण होते हैं|

लक्षण – मछली की चमड़ी या   सुफना में लालपन आना तथा सुफना का खुरखुरा होना आदि संक्रमण और खुले घाव ज्यादातर नई आयात की गई मछलियों में देखे जा सकते है|मधुरिका के साथ-साथ प्राय: अन्य बीमारियां भी प्रभावित करती हैं| 

संक्रमण के कारण – इस सफेद रोग का मुख्य कारण खराब पानी, तापमान में उतार चढ़ाव तथा सही तरीके से मछली पालन न करना है | मछली की संवेदनशील प्रजातियों को ऐकवेरियम में डालने से यह सफेद दाग   से ग्रसित हो जाती है|

कार्यवाही – पानी पुर्णतय: प्रदूषण रहित होना चाहिए ताकि विपत्ति के कारणों को खत्म किया जा सके|

ईलाज – इसका उपचार एन्टीपेरासाईट चिकित्सा पद्धती से कर सकते हैं| उपचार को सही और उपयोगी बनाने के लिए जरूरी हो तो पानी का तापमान बढ़ा सकते हैं| परजीवी के कारण बचे हुए   घावों पर दोबारा संक्रमण हो सकता है|    

मछली में जीवाणुओं से संक्रमण

कारण – ऐरोमोनास और सुडोमोनास जीवाणु के कारण होते हैं|

लक्षण – मछली की चमड़ी या   सुफना में लालपन आना तथा सुफना का खुरखुरा होना आदि संक्रमण और खुले घाव     ज्यादातर नई आयात की गई मछलियों में देखे जा सकते है|मधुरिका के साथ-साथ प्राय: अन्य बीमारियां भी प्रभावित करती हैं|

संक्रमण के कारण – इसका कारण खराब पानी, विशेषकर पानी में मौजूद अमोनिया और 
नाईट्राइट है| यदि अवस्था कमजोर है तो मछली के रखरखाव में आई कमी, एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने और आपसी लड़ाई के कारण उत्पन्न घाव दोबारा जीवाणुओं से संक्रमित हो जाते हैं | 

कार्यवाही – पानी की गुणवत्ता को बढाएं और शीघ्रता से उपचार करें |

ईलाज – इस स्थिति में जल्द से जल्द इसका उपचार शुरू करें| राँक साल्ट की मात्रा 1-3 ग्राम/प्रति लीटर इस्तेमाल करें ताकि नमक की कमी को पूरा किया जा सके | रोग अगर गम्भीर है तो मत्स्यचिकित्सक द्वारा दिए गए परामर्श अनुसार कार्यवाही करें |

मधुरिका रोग

कारण – यह रोग का कारण सेपरोलेगनिया और अचल्य है|

लक्षण – मीठे पानी की मछली की चमड़ी और सुफना में घावों पर रोंवां की बढोत्तरी संक्रमण का करती है|

संक्रमण के कारण – मछली में प्राय: अल्सर, पैरासाईट और सफेद दाग, से बचे घाव दुबारा संक्रमित हो जाते हैं | साफ पानी में इस समस्या की संभावना बहुत कम रहती है|

कार्यवाही – ऐसे स्थिति में तुरंत पानी की गुणवत्ता   बढाएं और जल्द उपचार शुरू करें|

ईलाज – प्राय:एंटी-फंगल चिकित्सा जैसे कि मैथाईलीन ब्लू अधिक प्रभावशाली होती हैं परन्तु इसका पानी की गुणवत्ता पर बुरा असर पड़ सकता है| जब यह बीमारी खुले घाव पर पनपती है तब राँक साल्ट     1-3 ग्राम प्रति लीटर की मात्रा डाल कर नमक की कमी को पूरा किया जाता है| 
काटन वूल (फ्लैक्सी बेक्टर) नामक रोग कुछ इस तरह का ही होता है परन्तु यह वैक्टीरिया के कारण होता है और इसके लिए अलग तरह का उपचार बताया गया है|

फिनराँट रोग 

कारण – यह रोग एरोमोनास, सुडोमोनास या फ्लेक्सिबेक्टर जीवाणुओं के कारण होता है

लक्षण – मछली के सुफना    तितर बितर    हो जाते हैं जिनके उपरी किनारे गुलाबी- सफेद रंग के तथा सुफना के तंतु में खून होता है

संक्रमण के कारण – यह जीवाणु सभी तरह की मछली में पाए जाते हैं | खराब पानी से उत्पन्न विपत्ति संक्रमण का मुख्य कारण होता है | अगर पानी प्रदूषित हो तो मछली के क्षतिग्रस्त सुफ़ना दुबारा संक्रमित हो सकते हैं | मधुरिका भी    कई घाव पर आक्रमण कर सकती है

कार्यवाही – ऐसे स्थिति में तुरंत पानी की गुणवत्ता को बढाएं और क्षतिग्रस्त मछली को अलग कर 
दें|

ईलाज – तुरंत फिनराँट या एंटी बैक्टेरिया उपचार शुरू कर देना चाहिए ताकि रोग को बढने से रोका जा सके इसके अतिरिक्त मछली द्वारा छोड़े गए नमक की कमी को 1-3 ग्राम प्रति लीटर नमक डाल कर पूरा किया जाता है इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि उपचार के दौरान पानी प्रदूषण रहित होना चाहिए|

मछली में स्विमब्लेडर रोग

कारण – इस रोग का कारण जीवाणुओं से   संक्रमण, अनुचित आहार,गैस तथा शारीरिक विलक्षणता है|

लक्षण – मछली को टैंक के उपरी व निचले भाग में तैरने में परेशानी होती है| आमतौर पर इस रोग  से अंडाकार सुनहरी  मछली अधिक प्रभावित होती है|

संक्रमण के कारण – कभी-कभी इस रोग के लिए पानी की   गुणवत्ता में कमी को दोषी माना जाता है| चयन करके पैदा की गई सुनहरी मछलियों में यह रोग आनुवांशिक होता है|

कार्यवाही – ऐसा होने पर पानी की गुणवत्ता बढाए | मछली को सुखी खुराक,   भीगोया हुआ आहार तथा फ्लेक्स कम मात्रा में दें ताकि मछली के पेट में सूजन ना आये | उनके आहार में   डाफनिया का प्रयोग करे जोकि रेचक का काम करता है|

ईलाज – इस रोग के उपचार हेतू मछली के नियमित आहार में परिवर्तन करें   तथा पानी की गुणवत्ता को बढ़ाये| इस स्थिति में विशेष एंटी वैक्टेरिया ईलाज पद्धति का प्रयोग करें | शारीरिक विलक्षणता वाली  सुनहरी मछलियों का उपचार करना मुश्किल  है|

लिम्फोसिस्टीस नामक रोग

 कारण – यह रोग इरीडोवाइरस के कारण होता है|

लक्षण – इस वाइरस के कारण मछली की चमड़ी तथा सुफ़ना पर भूरे- सफ़ेद रंग की सूजन हो जाती हैं| इसका प्रभाव   साफ़ तथा समुद्री पानी की मछलीयों पर पड़ता है और कई बार यह वाइरस चमड़ी के रंग  जैसा हो जाता है| यह सूजन उभरी  हुई कोशिकाओं का झुण्ड होता है|

संक्रमण के कारण – यह एक   वायरल बीमारी है परन्तु इसका मुख्य कारण विपरीत परिस्थितियाँ, रखरखाव में कमी तथा दूषित पानी है| कुछ एक मछलियों में यह वायरस बिना किसी लक्षण के उपस्थित रहता है|

कार्यवाही – इस बीमारी के कारण मछलियों के मरने की बहुत कम सम्भावना होती है यद्यपि घाव दुबारा संक्रमित हो जाते हैं| अक्सर संक्रमित मछली को अलग कर देना चाहिए|

ईलाज – इसके लिए कोई ज्ञात उपचार उपलब्ध नहीं है| कुछ मत्स्य चिकित्सक घाव को ऑपरेशन से निकालने की सलाह देते हैं|