जापानी पुदीना(मेन्था) की खेती

परिचय

मेन्था की उत्पत्ति स्थान चीन माना जाता है। चीन से यह जापान ले जाया गया, वहां से यह संसार के विभिन्न देशों में पहुंचा। मेन्था भारत में जापान से लाया गया है। इसलिए इसे जापानी पुदीना भी कहते हैं। यह फैलने वाला, बहुवर्षीय शाकीय पौध है, जिसकी ऊंचाई 1 मीटर तक हो जाती है। पत्तियों के किनारे कटे-फटे होते हैं, जिन पर सफेद रोंये पाये जाते हैं। इसमें पुष्प सफेद या हल्के बैंगनी रंग के गुच्छों में आते हैं। इसकी जड़े गूदेदार सफेद रंग की होती है जिन्हें भूस्तारी (स्टोलन) कहते हैं। मेन्था का प्रसारण इन्हीं भूस्तारी से होता है। मेन्था लेमिएसी कुल का अत्यंत उपयोगी औषधीय पौधा है। इसका वानस्पतिक नाम मेन्था आर्वेन्सिस है। इसके ताजा शाक से तेल निकाला जाता है। ताजा शाक में तेल की मात्रा लगभग 0.8-100 प्रतिशत तक पायी जाती है। इसके तेल में मेंथॉल, मेन्थोन और मिथाइल एसीटेट आदि अवयव पाये जाते हैं। लेकिन मेन्थाल तेल का मुख्य घटक है। तेल में मेन्थाल की मात्रा लगभग 75-80 प्रतिशत होती है। इसके तेल का उपयोग कमरदर्द, सिरदर्द, श्वसन विकार के लिए औषधियों के निर्माण में किया जाता है। इसके अतिरिक्त इसके तेल का उपयोग सौन्दर्य प्रसाधनों, टुथपेस्ट, शेविंग क्रीम लोशन, टॉफी, च्यूंगम, कैन्डी, आदि बनाने में भी किया जाता है। इस प्रकार से कई प्रकार के उद्योगों में काम आने के कारण इसकी मांग बढ़ रही है।

वितरण

मेन्था की खेती विश्व के कई देशों में की जा रही है। मुख्य रूप से भारत, चीन, जापान, ब्राजील और थाइलैण्ड में इसकी खेती की जा रही है। भारत में इसकी खेती, जम्मू कश्मीर, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तरांचल, मध्य प्रदेश, छतीसगढ़ और उत्तर प्रदेश में विशेष रूप से की जा रही है। राजस्थान में भी इसकी खेती संभव है।

जलवायु

पुदीना की खेती पर जलवायु का विशेष प्रभाव पड़ता है। अगर जलवायु अनुकूल नहीं है तो पैदावार के साथ-साथ तेल की गुणवत्ता पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। इसकी खेती के लिए समशीतोष्ण जलवायु उपयुक्त समझी जाती है। ऐसे क्षेत्र जहां सर्दी के मौसम में पाला और बर्फ पड़ने की संभावना रहती है। वहां इसकी खेती संभव नहीं हैं, क्योंकि इससे पौधे की बढ़वार कम हो जाती है तथा पौधों की पत्तियों मे तेल और मेन्थॉल की मात्रा भी प्रभावित होती है।

कैसी हो मिट्टी

मेन्था की खेती कई प्रकार की मृदाओं, जिसकी जल धारण क्षमता अच्छी हो, में की जा सकती है। लेकिन बलुई दोमट मृदा जिसका पी-एच मान 6.0-7.0 हो, इसकी खेती के लिए सर्वोत्तम होती है। ऐसी मृदा जिसमें जीवांश पदार्थ प्रचुर मात्रा में हों, उसमें अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। इसकी खेती के लिए उचित जल निकास वाली मृदा का ही चुनाव करें। जहां पानी भरता हो ऐसी मृदा इसकी खेती के एि बिल्कुल उपयुक्त नहीं है।

खेत की तैयारी

खेत की पहली गहरी जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें, इसके बाद दो जुताइयां हैरो से करें । अन्तिम जुताई से पहले 20-25 टन प्रति हे0 के हिसाब से अच्छी प्रकार से सड़ी हुई गोबर की खाद खेत में मिलाएं तथा पाटा लगाकर खेत को समतल कर लें। ध्यान रहे कि गोबर की खाद अच्छी प्रकार से सड़ी हो, अन्यथा दीमक लगने का भय रहेगा।

उन्नत किस्में

अच्छी पैदावार प्राप्त कने के लिए उन्नत किस्मों का ही चुनाव करें, लेकिन जो किस्म आप ले रहे हैं। उसके बारे में पूरी जानकारी प्राप्त कर प्रामाणिक संस्था से खरीदें। अगर किस्म के चुनाव में चूक हो गयी तो निश्चित रूप से पैदावार कम मिलेगी। मेन्था की एम. ए. एस. 1 हाइब्रिड-77, कालका, गोमती, हिमालय, कोशी और शिवालिक आदि उन्नत किस्में विकसित की जा चुकी हैं।

कटाई से पहले

  1. क्षेत्र के अनुसार प्रस्तावित उन्नत किस्म का चुनाव करें।
  2. भूस्तारी (स्टोलन) हमेशा रोगरहित खेत से लें ।
  3. फसल चक्र अपनाएं
  4. हरी खाद के सूखें अवशेष जो सड़ नहीं सकते उन्हें खेत से बाहर निकालें
  5. अच्छी प्रकार से सड़ी हुई गोबर की खाद का ही उपयोग करें।
  6. भूस्तारी (स्टोलन) को बुआई से पहले फफूदनाशक दवा से उपचारित अवश्य करें।
  7. भूस्तारी (स्टोलन) 5 से0मी0 से अधिक गहराई पर न बोयें।
  8. फसल की कटाई उपरांत बचे हुए अवशेष जला दें।
  9. खाद और पानी समय पर दें।
  10. खेत को खरपतवार रहित रखें।
  11. कटाई हमेशा समय पर करें अन्यथा तेल के उत्पादन पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा
  12. हमेशा उन्नत कृषि तकनीक अपनाएं कटाई के बाद
  • फसल की कटाई के बाद शाक को अधिक समय तक धूप में न सुखाएँ
  • वैसल में शाक की निर्धारित मात्रा पूरी भरें।
  • शाक को वैसल में अच्छी तरह दबाकर भरें।
  • तेल निकालते समय पानी का उचित प्रबन्ध हो ।
  • वायलर में पानी की मात्रा बराबर रखें।
  • कन्डेन्सर में पानी बराबर बढ़ता रहे।

बुआई का समय और विधि

मैदानी क्षेत्रों में इसकी बुआई 15 जनवरी से 15 फरवरी के मध्य करें। इससे पहले या बाद में बुआई करने पर अंकुरण पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। पहाड़ी क्षेत्रों में इसकी बुआई मार्च-अप्रैल में की जा सकती है। बुआई हमेशा लाइनों में 45 x 60 से0मी0 की दूरी पर करें ।

बुआई

मेन्था का प्रसारण भूस्तारी के द्वारा होता है। बुआई के लिए भूस्तारी ऐसे खेत से लें जो रोगरहित हो। मेन्था की बुआई दो प्रकार से की जा सकती है-

1)खेत में सीधे भूस्तारियों द्वारा

इस विधि में पहले से तैयार खेत में लाइनें बनाकर सीधे भूस्तारियों को लाइनों में 4-5 से0मी0 की गहराई पर बो देते हैं। भूस्तारी की लम्बाई लगभग 5-6 से0मी0 होनी चाहिए, जिसमें कम से कम 3-4 आंखें (गाउँ) होनी चाहिये । बुआई से पहले भुस्तारियों को 0.2 प्रतिशत बाविस्टीन के घोल में डुबोयें, जिससे फफूदी न लगे। बुआई के तुरन्त बाद सिंचाई करें। अनुकूल परिस्थितियां होने पर 15-25 दिनों में पूरा अंकुरण हो जाता है। एक हेक्टेयर क्षेत्र में सीधी बुआई के लिए 4-5 क्विंटल भूस्तारियों की आवश्यकता होगी, यह मात्रा भूस्तारियों की मोटाई और बोने की दूरी के आधार पर घट बढ़ सकती है।

2)पौधे लगाकर बुआई करना

यह विधि उन क्षेत्रों के लिए उपयोगी है जहां रबी में कोई अन्य फसल ली गयी हो, उसी खेत में मेन्था की बुआई करनी हो यह पहाड़ी क्षेत्रों के लिए उपयोगी है, क्योंकि जनवरी-फरवरी में वहां तापमान बहुत कम रहता है। कम तापमान होने से अंकुरण कम होता है। इस विधि में रोगरहित खेत से भूस्तारियों को खोदकर उनके छोटे-छोटे टुकड़े कर लेते हैं तथा नर्सरी में लगाकर पौधे तैयार करते हैं। 30-40 दिन बाद पौधे रोपने लायक हो जाते हैं। उस समय नर्सरी में सिंचाई करके पौधे नर्सरी से जड़ समेत उखाड़ कर चयनित खेत में लाइनों में मार्च-अप्रैल में रोप देते हैं। रोपने के बाद खेत में सिंचाई कर देते हैं। लेकिन ध्यान रहे कि देर से बुआई नहीं करें अन्यथा उत्पादन पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा।

उपरोक्त दोनों विधियों में सीधे भूस्तारियों द्वारा बुआई करना अधिक लाभकारी है।

खाद और उर्वरक

अच्छी पैदावार प्राप्त करने के लिए 15-20 टन प्रति हैक्टर अच्छी प्रकार से सड़ी हुई गोबर की खाद खेत की तैयारी के समय मिट्टी में मिलाएं तथा इसके अतिरिक्त 120-130 कि0ग्रा0 नाइट्रोजन, 50-60 कि0ग्रा0 फास्फोरस तथा 40-60 कि0ग्रा0 पोटास प्रति हैक्टर की दर से खेत में डालें। इसमें फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा तथा नाइट्रोजन की कुल मात्रा का 1/5 भाग बुआई से पहले तथा अन्तिम जुताई के समय खेत में मिलाएं। नाइट्रोजन की शेष मात्रा बाद में खड़ी फसल में दें। इसमें लगभग 20-25 कि0ग्रा0 बुआई के 35-40 दिन बाद इतनी ही मात्रा बुआई के 75-80 दिन बाद खड़ी फसल में दें, शेष मात्रा प्रथम कटाई और दूसरी कटाई के बाद खेत में डालें । लेकिन ध्यान रहे कि नाइट्रोजन देने के बाद सिंचाई अवश्य करें।

सिंचाई

प्रथम सिंचाई बुआई के तुरन्त बाद करें। बाद में 15-20 दिन के अन्तराल पर सिंचाई करें लेकिन भूमि की किस्म के आधार पर सिंचाई का समय आगे पीछे हो सकता है। गर्मी के मौसम (अप्रैल-जून) में सिंचाई 8-10 दिन के अंतराल पर करें। नमी के अभाव में उत्पादन प्रभावित हो सकता है। कटाई केबाद सिंचाई अवश्य करें।

तेल कैसे निकलें

मेन्था का तेल आसवन संयंत्र के द्वारा निकाला जाता है। इस संयंत्र से तेल निकालने के लिए वैसल (गोल आकार का पात्र) में ताजे शाक को भर दिया जाता है। शाक को वैसल के अन्दर अच्छी तरह से दबाकर भर देते है। यह वैसल माइल्ड स्टील (एम.एस.) या स्टेनलेस स्टील (एम.एस.) के हो सकते हैं। इसमें एस. एस. के वैसल एम.एस. की अपेक्षा महंगे होते हैं। लेकिन तेल की गुणवत्ता की दृष्टि से एस. एस. के वैसल अच्छे होते हैं। यह वैसल एक पाइप के द्वारा बॉइलर से जुड़ा रहता है। बॉइलर के ऊपरी भाग में पानी भरा रहता है तथा निचले भाग में आग जलायी जाती है, आग से यह पानी गर्म होकर भाप बनती है। यह भाप पाइप के द्वारा वैसल में प्रवेश करती है। इस भाप के द्वारा मेन्था का तेल पत्तियों और तनों से उड़कर वाष्प के रूप में इकट्ठा होता है। यह वाष्प वैसल से कन्डेन्सर में एक पाइप के द्वारा आती है। कन्डेन्सर में लगातार ठंडा पानी एक अन्य पाइप के द्वारा बहता रहता है। जो कन्डेन्सर को ठंडा रखता है। कन्डेन्सर में वाष्प ठंडी होती है, जिससे तेल और पानी अलग-अलग हो जाते हैं। कन्डेन्सर से पानी मिश्रित तेल एक नली के द्वारा एक स्टील के पात्र में एकत्रित होता है। चूंकि तेल पानी से हल्का होता है। अतः तेल पानी की ऊपरी सतह पर तैरता है। जो एक नली के द्वारा बाहर आता रहता है, जिसे एल्यूमीनियम के पात्र में इकट्ठा कर लिया जाता है। इस विधि से तेल निकालने में 4-6 घंटे लगते हैं। मेन्था की फसल से शाक और तेल के उत्पादन की मात्रा जलवायु, भूमि की उर्वरता, सिंचाई, कटाई का समय, तेल निकालने की विधि आदि पर निर्भर करती है।

भण्डारण

मेन्था के तेल को प्लास्टिक के डिब्बे या एल्युमीनियम के कनस्तरों (पात्र) में भण्डारण करें । भण्डारण करते समय इस बात का ध्यान रखें कि डिब्बे/पात्र में हवा नहीं रहे अन्यथा तेल खराब होने की संभावना रहती है। अतः अधिक समय के लिए तेल को भण्डारित करने के लिए डिब्बे को अच्छी पकार से बन्द करें ताकि इनमें हवा नहीं रहे तथा 2 ग्राम प्रति लीटर के हिसाब से सोडियम सल्फेट भण्डारित तेल में डालें ।

निराई-गुड़ाई

बुआई के बाद सिंचाई करने पर खरपतवार काफी मात्रा में उगते हैं उस समय खेत को खरपतवार रहित रखें अन्यथा उपज पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। आवश्यकतानुसार निराई-गुड़ाई अवश्य करें। विशेष रूप से प्रथम कटाई के बाद कुदाली या फावड़े से खुदाई करें। फसल बड़ी हो जाने पर खरपतवारों का प्रभाव बहुत अधिक नहीं होता है।

प्रमुख कीट

मेन्था की फसल को निम्न कीट नुकसान पहुंचाते है

दीमक

दीमक द्वारा मेन्था की फसल को काफी नुकसान पहुंचाया जाता है। विशेष रूप से जब गोबर की खाद और हरी खाद भली प्रकार से सड़ी नहीं हो तथा सिंचाई का उचित प्रबंध न हो उस समय इसका प्रभाव और अधिक बढ़ जाता है। दीमक मेन्था के पौधे के तने को जो कि जमीन से लगा होता है उस भाग के सेल्युलोस को काटकर अन्दर घुस जाती है तथा अन्दर तने के भीतरी भाग को काटकर चबाती है, जिससे तने के ऊपरी भाग को भोजन नहीं मिल पाता है और धीरे-धीरे पौधा सूख जाता है।

रोकथाम

1)अच्छी प्रकार से सड़ी हुई गोबर की खाद खेत में डालें।

2)हरी खाद के सूखे अवशेष जो खेत में सड़ नहीं सकते, उन्हें खेत से बाहर निकालें ।

3)सिंचाई की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित करें।

4) दीमक का प्रकोप होने पर क्लोरोपाइरीफॉस 20 ई.सी. 4 लीटर/हेक्टेयर के हिसाब से खेत  में सिंचाई के पानी के साथ डालें।

रोयेंदार सुंडी

रोयेंदार सुंडी का प्रकोप काफी क्षेत्रों में मेन्था की फसल पर देखा गया है। यह सुंडी पीले भूरे रंग की होती है। जिन पौधों पर इनका प्रभाव होता है, उनकी पत्तियां कागज की तरह सफेद जालीदार हो जाती हैं। पत्तियों के हरे भाग को इन सूड़ीयों के द्वारा खा लिया जाता है, जिससे पत्तियों के भोजन बनाने की क्षमता खत्म हो जाती है। पत्तियों का नुकसान होने के कारण तेल का उत्पादन भी कम होता है।

रोकथाम

इस सुंडी की रोकथाम के लिए फसल की प्रारंम्भिक अवस्था में 2 मि. लीटर/लीटर (१ ली./हैक्टर) की दर से इण्डोसल्फान (0.07 प्रतिशत) का छिड़काव करना चाहिए।

काला कीट

यह जापानी पुदीने पर लगने वाला प्रमुख काले रंग का बीटल या भुंग होता है। पूर्ण विकसित यह काला कीट 5 से 7 सें.मी. लम्बा होता है। इसके पंख नीले काले तथा बहुत कड़े होते हैं। इसके शरीर के ऊपरी भाग पर हल्क नीले रंग की गोल-गोल बिन्दियां होती है। इस कीट का प्रकोप विशेष रूप से पौधे की प्रारंभिक अवस्था में होता है और यह कीट पौधों की कोमल पत्तियों को खाता है। जैसे-जैसे पत्तियां निकलती हैं, यह कीट पत्तियों को खाता रहता है। कभी-कभी पौधे पर एक भी पत्ती नहीं रहती है, जिससे तेल के उत्पादन में कमी आती है।

रोकथाम

इस कीट की रोकथाम के लिए इण्डोसल्फान (0.07 प्रतिशत) 2 मि.ली. प्रति लीटर (1 ली. /हैक्टर) पानी में घोलकर खड़ी फसल पर छिडकाव करें।

सफेद मक्खी

जापानी पुदीने में इस कीट का प्रकोप विशेष रूप से मई में होता है। यह आकार में 1-1.5 मि.मी. लम्बी दूधियां सफेद रंग की होती है। यह मक्खी मेन्था के पौधों की निचली पत्तियों पर आक्रमण करके पौधों से रस-चुसती है, जिसके कारण पौधे की वृद्धि रूक जाती है। इस मक्खी के द्धारा एक विशेष प्रकार का पदार्थ भी विसर्जित किया जाता है, जिसे हनीडिव कहते हैं। इस पदार्थ पर सूटीमोल्ड नामक कवक विकसित हो जाता है। जो कि पौधों की प्रकाश संश्लेषण की क्रिया को प्रभावित करता है, जिससे पत्तियां भोजन नहीं बना पाती हैं तथा पौधे की बढ़वार और उत्पादन में कमी आती है।

रोकथाम

इस मक्खी की रोकथाम के लिए आक्सीडिमेटान मिथाइल 1 मि.ली./ली. (500 मि.ली.है.) या डाइमिथोएट-1 मि.ली./ली. (500 मि.ली. है.) की दर से पानी में मिलाकर खड़ी फसल पर छिड़काव करना चाहिए ।

कटाई

मेन्था से अच्छा उत्पादन प्राप्त करने के लिए इसकी कटाई पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। अगर कटाई सही समय पर नहीं होती है, तो निश्चित रूप से तेल का उत्पादन तो कम होगा ही साथ ही साथ तेल की गुणवत्ता पर भी विपरीत प्रभाव पड़ेगा । इसकी कटाई का उचित समय फूल आने की अवस्था होती है। फूल आने के बाद कटाई करने पर तेल और मेन्थाल दोनों की मात्रा घटने लगती है।

देर से कटाई करने पर पंत्तियां गिर जाती हैं। मेन्था में कुल तेल का लगभग 85 प्रतिशत भाग पत्तियों में पाया जाता है। अतः पत्तियां गिरने से तेल का उत्पादन स्वतः ही कम हो जाता है। पहली कटाई बुआई के लगभग 100-110 दिन में करें । दूसरी कटाई प्रथम कटाई के लगभग 70-80 दिन के अंतराल पर करें। इस समय फूल आने की अवस्था होती है। कटाई करने से लगभग 15 दिन पहले सिंचाई हो तो कटाई नहीं करें । कटाई धारदार हंसिए या दरांती से करें । पौधे को भूमि से लगभग 8-10 सें.मी. उपर से काटें। कटाई के बाद फसल को 3-4 घंटे के लिए खेत में छोड़ दें। कटाई के बाद शाक को काटकर अधिक समय के लिए संग्रह नहीं करें अन्यथा पत्तियां सड़नी शुरू हो जायेंगी, जिससे तेल की गुणवत्ता प्रभावित होगी। कटाई से पहले खेत को खरपतवार रहित करें।

उपज

मेन्था के उत्पादन पर मृदा, जलवायु, उन्नत किस्म और वातावरण का विशेष प्रभाव पड़ता है। इसके उत्पादन की उन्नत कृषि तकनीक अपनाने परएक हैक्टर में लगभग 250-300 क्विंटल ताजा शाक तथा लगभग 200-250 लीटर तेल प्राप्त होता है। मेन्था आयल की कीमत में काफी उतार-चढ़ाव है। गत मौसम में तेल की दर 600/- से 1700/किलोग्राम तक रही है।

 

 

मेंथा की खेती बदायूं, रामपुर, मुरादाबाद, बरेली, पीलीभीत, बाराबंकी, फैजाबाद, अम्बेडकर नगर, लखनऊ आदि जिलों में किसानों द्वारा बड़े पैमाने पर की जाती है। विगत कुछ वर्षों से मेंथा इन जिलों में जायद की प्रमुख फसल के रूप में अपना स्थान बना रही है। इसके तेल का उपयोग सुगन्ध के लिए व औषधि बनाने में किया जाता है।

भूमि एवं भूमि की तैयारी

मेंथा की खेती क लिए पर्याप्त जीवांश अच्छी जल निकास वाली पी०एच० मान 6-7.5 वाली बलुई दोमट व मटियारी दोमट भूमि उपयुक्त रहती है। खेत की अच्छी तरह से जुताई करके भूमि को समतल बना लेते हैं। मेंथा की रोपाई के तुरन्त बाद में खेत में हल्का पानी लगाते हैं जिसके कारण मेन्था की पौध ठीक लग जाये।

संस्तुत प्रजातियाँ

  • मेन्था स्पाइकाटा एम०एस०एस०-1 (देशी पोदीना)
  • कोसा (समय व देर से रोपाई हेतु उत्तम) (जापानी पोदीना)
  • हिमालय गोमती (एम०ए०एच०-9)
  • एम०एस०एस०-1 एच०वाई-77
  • मेन्था पिप्रेटा-कुकरैल

मेन्था की जड़ों को पौधशाला में लगाने का समय

मेन्था की जड़ों की बुवाई अगस्त माह में नर्सरी में कर देते हैं। नर्सरी को ऊँचे स्थान में बनाते है ताकि इसे जलभराव से रोका जा सके। अधिक वर्षा हो जाने पर जल का निकास करना चाहिए।

बुवाई/रोपाई का समय

समय से मेन्था की जड़ों की बुवाई का उचति समय 15 जनवरी से 15 फरवरी है। देर से बुवाई करने पर तेल की मात्रा कम हो जाती है व कम उपज मिलती है। देर बुवाई हेतु पौधों को नर्सरी में तैयार करके मार्च से अप्रैल के प्रथम सप्ताह तक खेत में पौधों की रोपाई अवश्य कर देना चाहिए। विलम्ब से मेंथा की खेती के लिए कोसी प्रजाति का चुनाव करें।

भूस्तरियो (सकर्स) का शोधन

रोपार्इ के पूर्व भूस्तरियों को 2 ग्राम कार्बेन्डाजिम प्रति लीटर पानी के घोल बनाकर 5 मिनट तक डुबोकर शोधित करना चाहिए।

बुवाई की विधि

जापानी मेंथा की रोपाई के लिए लाइन की दूरी 30-40 सेमी० देशी पोदीना 45-60 सेमी० तथा जापानी पोदीना में पौधों से पौधों की दूरी 15 सेमी० रखना चाहिए। जड़ों की रोपाई 3 से 5 सेमी० की गहराई पर कूंड़ों में करना चाहिए। रोपाई के तुरन्त बाद हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए। बुवाई/रोपाई हेतु 4-5 कुन्तल जड़ों के 8-10 सेमी० के टुकड़े उपयुक्त होते हैं।

उर्वरक की मात्रा

सामान्यतः उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण की संस्तुतियों के आधार पर किया जाना लाभदायक होता है। सामान्य परिस्थितियों में मेंथा की अच्छी उपज के लिए 120-150 किलोग्राम नाइट्रोजन 50-60 किग्रा० फास्फोरस 40 किग्रा०पोटाश तथा 20 किग्रा० सल्फर प्रति हे० की दर से प्रयोग करना चाहिए। फास्फोरस, पोटाश तथा सल्फर की पूरी मात्रा तथा 30-35 किग्रा० नाइट्रोजन बुवाई/रोपाई से पूर्व कूंड़ों में प्रयोग करना चाहिए। शेष नाइट्रोजन को बुवाई/रोपाई के लगभग 45 दिन, पर 70-80 दिन पर तथा पहली कटाई के 20 दिन पश्चात् देना चाहिए।

सिंचाई एवं खरपतवार नियंत्रण

मेंथा में सिंचाई भूमि की किस्म तापमान तथा हवाओं की तीव्रता पर निर्भर करती है। मेंथा में पहली सिंचाई बुवाई/रोपाई के तुरन्त बाद कर देना चाहिए। इसके पश्चात् 20-25 दिन के अन्तराल पर सिंचाई करते रहना चाहिए व प्रत्येक कटाई के बाद सिंचाई करना आवश्यक है। खरपतवार नियंत्रण रसायन द्वारा खरपतवार नियंत्रण के लिए पेन्डीमेथलीन 30 ई०सी० के 3.3 लीटर प्रति हे० को 700-800 लीटर पानी में घोलकर बुवाई/रोपाई के पश्चात् ओट आने पर यथाशीघ्र छिड़काव करें।

फसल सुरक्षा

कीट
दीमक

दीमक जड़ों को क्षति पहुंचाती है, फलस्वरूप जमाव पर बुरा असर पड़ता है। बाद में प्रकोप होने पर पौधें सूख जाते है। खड़ी फसल में दीमक का प्रकोप होने पर क्लोरपाइरीफास 2.5 लीटर प्रति हे० की दर से सिंचाई के पानी के साथ प्रयोग करें।

बालदार सूंड़ी

यह पत्तियों की निचली सतह पर रहती है और पत्तियों को खाती है। जिससे तेल की प्रतिशत मात्रा कम हो जाती है। इस कीट से फसल की सुरक्षा के लिए डाइकलोर वास 500 मिली० या फेनवेलरेट 750 मिली० प्रति हे० की दर से 600-700 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। झुन्ड में दिये गये अण्डों एवं प्रारम्भिक अवस्था में झुण्ड में खा रही सूंड़ियों को इक्कठा कर नष्ट कर देना चाहिए। पतंगों को प्रकाश से आकर्षित कर मार देना चाहिए।

पत्ती लपेटक कीट

इसकी सूड़ियां पत्तियों को लपेटते हुए खाती हैं। इसकी रोकथाम के लिए मोनोक्रोटोफास 36 ई०सी० 1.0 लीटर प्रति हे० की दर से 600-700 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।

रोग जड़गलन

इस रोग में जड़े काली पड़ जाती है। जड़ों पर गुलाबी रंग के धब्बे दिखाई देते हैं। बुवाई/रोपाई से पूर्व भूस्तारियों का शोधन 0.1% कार्बेन्डाजिम से इस रोग का निदान हो जाता है। इसके अतिरिक्त रोगमुक्त भूस्तारियों का प्रयोग करें।

पर्णदाग

पत्तियों पर गहरे भूरे रंग के धब्बे दिखाई पड़ते हैं। इससे पत्तियां पीली पड़कर गिरने लगती हैं। इस रोग के निदान के लिए मैंकोजेब 75 डब्लू पी नामक फफूंदीनाशक की 2 किग्रा० मात्रा 600-800 लीटर में मिलाकर प्रति हे० की दर से छिड़काव करें।

कटाई

मेंथा फसल की कटाई प्रायः दो बार की जाती है। पहली कटाई के लगभग 100-120 दिन पर जब पौधों में कलियां आने लगे की जाती है। पौधों की कटाई जमीन की सतह से 4-5 सेमी० ऊॅंचाई पर करनी चाहिए। दूसरी कटाई, पहली कटाई के लगभग 70-80 दिन पर करें। कटाई के बाद पौधों को 2-3 घन्टे तक खुली धूप में छोड़ दें तत्पश्चात् कटी फसल को छाया में हल्का सुखाकर जल्दी आसवन विधि द्वारा यंत्र से तेल निकाल लें।

उपज

दो कटाइयों में लगभग 250-300 कुन्तल शाक या 125-150 किग्रा० तेल प्रति हे० प्राप्त होता है।

प्रभावी बिन्दु

  • फास्फोरस के लिए सिंगल सुपर फास्फेट का प्रयोग करें अथवा डी०ए०पी० के साथ 200-250 किग्रा० जिप्सम प्रति हे० की दर से प्रयोग कर तेल की मात्रा बढ़ाई जा सकती है।
  • जड़ों को शोधित करके ही बुवाई/रोपाई करें।

 

मेंथा की खेती बदायूं, रामपुर, मुरादाबाद, बरेली, पीलीभीत, बाराबंकी, फैजाबाद, अम्बेडकर नगर, लखनऊ आदि जिलों में किसानों द्वारा बड़े पैमाने पर की जाती है। विगत कुछ वर्षों से मेंथा इन जिलों में जायद की प्रमुख फसल के रूप में अपना स्थान बना रही है। इसके तेल का उपयोग सुगन्ध के लिए व औषधि बनाने में किया जाता है।

भूमि एवं भूमि की तैयारी

मेंथा की खेती क लिए पर्याप्त जीवांश अच्छी जल निकास वाली पी०एच० मान 6-7.5 वाली बलुई दोमट व मटियारी दोमट भूमि उपयुक्त रहती है। खेत की अच्छी तरह से जुताई करके भूमि को समतल बना लेते हैं। मेंथा की रोपाई के तुरन्त बाद में खेत में हल्का पानी लगाते हैं जिसके कारण मेन्था की पौध ठीक लग जाये।

संस्तुत प्रजातियाँ

  • मेन्था स्पाइकाटा एम०एस०एस०-1 (देशी पोदीना)
  • कोसा (समय व देर से रोपाई हेतु उत्तम) (जापानी पोदीना)
  • हिमालय गोमती (एम०ए०एच०-9)
  • एम०एस०एस०-1 एच०वाई-77
  • मेन्था पिप्रेटा-कुकरैल

मेन्था की जड़ों को पौधशाला में लगाने का समय

मेन्था की जड़ों की बुवाई अगस्त माह में नर्सरी में कर देते हैं। नर्सरी को ऊँचे स्थान में बनाते है ताकि इसे जलभराव से रोका जा सके। अधिक वर्षा हो जाने पर जल का निकास करना चाहिए।

बुवाई/रोपाई का समय

समय से मेन्था की जड़ों की बुवाई का उचति समय 15 जनवरी से 15 फरवरी है। देर से बुवाई करने पर तेल की मात्रा कम हो जाती है व कम उपज मिलती है। देर बुवाई हेतु पौधों को नर्सरी में तैयार करके मार्च से अप्रैल के प्रथम सप्ताह तक खेत में पौधों की रोपाई अवश्य कर देना चाहिए। विलम्ब से मेंथा की खेती के लिए कोसी प्रजाति का चुनाव करें।

भूस्तरियो (सकर्स) का शोधन

रोपार्इ के पूर्व भूस्तरियों को 2 ग्राम कार्बेन्डाजिम प्रति लीटर पानी के घोल बनाकर 5 मिनट तक डुबोकर शोधित करना चाहिए।

बुवाई की विधि

जापानी मेंथा की रोपाई के लिए लाइन की दूरी 30-40 सेमी० देशी पोदीना 45-60 सेमी० तथा जापानी पोदीना में पौधों से पौधों की दूरी 15 सेमी० रखना चाहिए। जड़ों की रोपाई 3 से 5 सेमी० की गहराई पर कूंड़ों में करना चाहिए। रोपाई के तुरन्त बाद हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए। बुवाई/रोपाई हेतु 4-5 कुन्तल जड़ों के 8-10 सेमी० के टुकड़े उपयुक्त होते हैं।

उर्वरक की मात्रा

सामान्यतः उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण की संस्तुतियों के आधार पर किया जाना लाभदायक होता है। सामान्य परिस्थितियों में मेंथा की अच्छी उपज के लिए 120-150 किलोग्राम नाइट्रोजन 50-60 किग्रा० फास्फोरस 40 किग्रा०पोटाश तथा 20 किग्रा० सल्फर प्रति हे० की दर से प्रयोग करना चाहिए। फास्फोरस, पोटाश तथा सल्फर की पूरी मात्रा तथा 30-35 किग्रा० नाइट्रोजन बुवाई/रोपाई से पूर्व कूंड़ों में प्रयोग करना चाहिए। शेष नाइट्रोजन को बुवाई/रोपाई के लगभग 45 दिन, पर 70-80 दिन पर तथा पहली कटाई के 20 दिन पश्चात् देना चाहिए।

सिंचाई एवं खरपतवार नियंत्रण

मेंथा में सिंचाई भूमि की किस्म तापमान तथा हवाओं की तीव्रता पर निर्भर करती है। मेंथा में पहली सिंचाई बुवाई/रोपाई के तुरन्त बाद कर देना चाहिए। इसके पश्चात् 20-25 दिन के अन्तराल पर सिंचाई करते रहना चाहिए व प्रत्येक कटाई के बाद सिंचाई करना आवश्यक है। खरपतवार नियंत्रण रसायन द्वारा खरपतवार नियंत्रण के लिए पेन्डीमेथलीन 30 ई०सी० के 3.3 लीटर प्रति हे० को 700-800 लीटर पानी में घोलकर बुवाई/रोपाई के पश्चात् ओट आने पर यथाशीघ्र छिड़काव करें।

फसल सुरक्षा

कीट
दीमक

दीमक जड़ों को क्षति पहुंचाती है, फलस्वरूप जमाव पर बुरा असर पड़ता है। बाद में प्रकोप होने पर पौधें सूख जाते है। खड़ी फसल में दीमक का प्रकोप होने पर क्लोरपाइरीफास 2.5 लीटर प्रति हे० की दर से सिंचाई के पानी के साथ प्रयोग करें।

बालदार सूंड़ी

यह पत्तियों की निचली सतह पर रहती है और पत्तियों को खाती है। जिससे तेल की प्रतिशत मात्रा कम हो जाती है। इस कीट से फसल की सुरक्षा के लिए डाइकलोर वास 500 मिली० या फेनवेलरेट 750 मिली० प्रति हे० की दर से 600-700 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। झुन्ड में दिये गये अण्डों एवं प्रारम्भिक अवस्था में झुण्ड में खा रही सूंड़ियों को इक्कठा कर नष्ट कर देना चाहिए। पतंगों को प्रकाश से आकर्षित कर मार देना चाहिए।

पत्ती लपेटक कीट

इसकी सूड़ियां पत्तियों को लपेटते हुए खाती हैं। इसकी रोकथाम के लिए मोनोक्रोटोफास 36 ई०सी० 1.0 लीटर प्रति हे० की दर से 600-700 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।

रोग जड़गलन

इस रोग में जड़े काली पड़ जाती है। जड़ों पर गुलाबी रंग के धब्बे दिखाई देते हैं। बुवाई/रोपाई से पूर्व भूस्तारियों का शोधन 0.1% कार्बेन्डाजिम से इस रोग का निदान हो जाता है। इसके अतिरिक्त रोगमुक्त भूस्तारियों का प्रयोग करें।

पर्णदाग

पत्तियों पर गहरे भूरे रंग के धब्बे दिखाई पड़ते हैं। इससे पत्तियां पीली पड़कर गिरने लगती हैं। इस रोग के निदान के लिए मैंकोजेब 75 डब्लू पी नामक फफूंदीनाशक की 2 किग्रा० मात्रा 600-800 लीटर में मिलाकर प्रति हे० की दर से छिड़काव करें।

कटाई

मेंथा फसल की कटाई प्रायः दो बार की जाती है। पहली कटाई के लगभग 100-120 दिन पर जब पौधों में कलियां आने लगे की जाती है। पौधों की कटाई जमीन की सतह से 4-5 सेमी० ऊॅंचाई पर करनी चाहिए। दूसरी कटाई, पहली कटाई के लगभग 70-80 दिन पर करें। कटाई के बाद पौधों को 2-3 घन्टे तक खुली धूप में छोड़ दें तत्पश्चात् कटी फसल को छाया में हल्का सुखाकर जल्दी आसवन विधि द्वारा यंत्र से तेल निकाल लें।

उपज

दो कटाइयों में लगभग 250-300 कुन्तल शाक या 125-150 किग्रा० तेल प्रति हे० प्राप्त होता है।

प्रभावी बिन्दु

  • फास्फोरस के लिए सिंगल सुपर फास्फेट का प्रयोग करें अथवा डी०ए०पी० के साथ 200-250 किग्रा० जिप्सम प्रति हे० की दर से प्रयोग कर तेल की मात्रा बढ़ाई जा सकती है।
  • जड़ों को शोधित करके ही बुवाई/रोपाई करें।

अदरक की वैज्ञानिक खेती

भूमिका

अदरक प्रमुख मसालों में एक है इसकी खेती नगदी फसल के रूप में की जाती हैं। अदरक का वानस्पतिक नाम 'जीन्जीबरओफीसीनेली है। अदरक के भूमिगत रूपांतरित तन अर्थात प्रकद का उपयोग किया जाता हैं। इन प्रकदो को फसल के खोदाई के बाद हरा तथा सुखाकर दानों ही रूपों में उपयोग करते हैं। ताजा अदरक व्यंजनों को खूशबूदार तथा चटपटा बनाने एवं मुरब्बा बनाने के काम आते है। चाय का स्वाद बढ़ाने के लिये विशेष तौर पर सर्दियों में अदरक का उपयोग किया जाता है। अदरक का उपयोग मसालों के रूप में सलाद, अचार, मुरब्बा, चटनी आदि के रूप में किया जाता हैं। पकी गांठों को सुखाकर उनसे सोंठ तैयार किया जाता है। जिसका काफी मात्रा देशों में नियति किया जाता है। सबसे अधिक अदरक का उत्पादन भारत वर्ष में होता है। सभी देशों को मिलाकर जितना अदरक का उत्पादन होता है उसमें भारत वर्ष अकेले 33 प्रतिशत अदरक का उत्पादन करता है ।

औषधीय गुण

अदरक का प्रयोग सब्जियों को चटपटा बनाने के साथ गुणकारी बनाने में किया जाता हैं। यह घबराहट, थकान, प्यास आदि को शांत करके शरीर में ताजगी और ढंडक भरती है। कफ से ग्रस्ति लोगो के लिये अदरक काफी कारगर औषधि के रूप में उपयोग होता है । अदरक के उपयोग से छाती पर जमा सारा बलगम निकालकर बाहर करती है, अतः खांसी नहीं बनने पाती है। सिरदर्द, कमर के दर्द, पेट दर्द, बेचैनी, घबराहट आदि छोटे-मोटे रोगों के लिये यह रामबाण औषधि है। अदरक को चुसते ही मुंह में लार ग्रन्थि अपना काम शुरू कर देती है। इसमें कठ की खशखशाहट दूर होती है।

स्त्रियों के लिये भी अदरक वरदान है। जिन युवतियों को मासिक धर्म, गर्भाधान, प्रसव के बाद स्तन में दूध न उतरने की शिकायत रहती है, उनके लिये अदरक कीमती दवा से भी बड़ा काम करती है।

जलवायु

अदरक की अच्छी अपज के लिए थोड़ी गर्म तथा नम जलवायु होनी चाहिए। अदरक की अच्छी ऊपज  के लिए 20 से 30 डिग्री से0 तापमान उपयुक्त होता है। इससे ज्यादा होने पर फसल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। कम तापमान के कारण (10' से0 से कम) पत्तों तथा प्रकन्दों को नुकसान पहुँचता है। बोआई के अंकुर फूटने तक हल्की नमी, फसल बढ़ते समय मध्यम वर्षा तथा फसल के उखाड़ने के एक माह पहले शुष्क मौसम होना चाहिए।

भूमि

अदरक की अधिक ऊपज  के लिए हल्की दोमट या बलूई दोमट भूमि उयुक्त होती है। 60 से 7.5 पी0 एच0 मान वाली भूमि में अदरक की अधिक पैदावार होती है। अदरक के खेती के लिए ऊँची जमीन एवं जल निकासी की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए। भारी एवं क्षारीय भूमि में अदरक का उत्पादन अच्छा नहीं होता है। अदरक उत्पादन के लिए फसल चक्र अपनाना अति आवश्यक है।

भूमि की तैयारी

अदरक की खेती के लिए एक बार मिट्टी पलटने वाली हल से जुताई करने के बाद, चार बार देशी हल या कल्टीवेटर से जुताई करते हैं। प्रत्येक जुताई के बाद पाटा अवश्य लगाना चाहिए। जिससे मिट्टी भूरभूरी हो जाए। अंतिम जुताई से 3 से 4 सप्ताह पूर्व खेत में 250 से 300 क्विंटल सड़ा हुआ गोबर का खाद देते है। गोबर का खाद देने के बाद एक या दो बार खेत की जुताई कर गोबर के खाद को मिट्टी में मिला देते हैं।

बोआई की विधि

अदरक की बोआई तीन विधियों के द्वारा की जाती है।

कयारी विधि

इस विधि में 120 मीटर चौड़ी तथा 30 मीटर लम्बी उभारयुक्त क्यारियाँ जो जमीन की सतह से 15-20 से0मी0 ऊँची हो। प्रत्येक क्यारी के चारो तरफ 50 से0मी0 चौड़ी नाली बनानी चाहिए। क्यारी में 30-20 से0मी0 दूरी पर 8-10 से0मी0 की गहराई में बीज की बोआई करनी चाहिए। यह विधि जहाँ पानी लगता है वैसे जगह पर इस विधि से बोआई करनी चाहिए।

मेड़ विधि

इस विधि में 60 से0मी0 की दूरी पर तैयार खेत में 20 से0मी0 दूरी पर बीज की बोआई करने के बाद मिट्टी चढ़ाकर मेड़ बनावें। इस बात का ध्यान होना चाहिये कि बीज 10 से0मी0 गहराई में हो जिससे बीजों का अंकुरण अच्छा हों यह विधि जहाँ पर जल जमाव की संभावना होती है वैसी जगह इस विधि से अदरक की खेती की जाती हे ।

समतल विधि

यह विधि हल्की एवं ढ़ालू भूमि में अपनाई जाती है। इस विधि में 30 से0मी0 पंक्ति एवं 20 से0मी0 गांठ से गांठ या पौधे की दूरी तथा 8-10 से0मी0 की गहराई में बोआई की जाती है। जहाँ पर जल जमाव की संभावना नहीं होती है वैसे जगह पर इस विधि से खेती करते हैं।

अदरक की उन्नत किस्में

बिहार की लिए नदिया, सुप्रभा, सुरूचि, सुरभी जोरहट, रीयो-डी जेनेरियो, मननटोडी एवं मरान उपयुक्त किस्में हैं।

नदिया - यह किस्म बिहार के लिये उपयुक्त है यह 8 से 9 माह में तैयार हो जाती है इसकी ऊपज  क्षमता 200 से 250 क्विंटल प्रति हेक्टर होती है।

मरान - यह एक अच्छी किस्म है इसकी ऊपज  क्षमता 175 से 200 क्विंटल प्रति हेक्टर होता है साथ ही इस किस्म में मृदु विगलन रोग नहीं लगता है।

जोरहट -यह असम की लोकप्रिय किस्म है इसकी ऊपज  क्षमता 200-225 क्विंटल प्रति हेक्टर है यह 8 से 10 माह में तैयार हो जाती है।

सुप्रभा - यह किस्म 225 से 230 दिन में तैयार हो जाती है। इस किस्म में अधिक किलें (टोलरिंग) निकलते हैं प्रकद का सिरा मोटा, छिलका सफेद एवं चमकदार होता है। इस किस्म की ऊपज  क्षमता छिलका 200-230 क्विंटल प्रति हेक्टर है। यह किस्म प्रकन्द विगलन रोग के प्रति सहनशील है।

सुरूचि - यह किस्म हल्के सुनहले रंग की होती है एवं 230-240 दिन में तैयार हो जाती है। इस किस्में  की ऊपज  200-225 क्विंटल प्रति हेक्टर है। यह किस्म प्रकन्द विगलन रोग के प्रति निरोधक है ।

सुरभि - इसके गांठ काफी आकर्षक होते हैं। यह 225-235 दिन में तैयार हो जाती है। इसकी ऊपज  क्षमता 200-250 क्विंटल प्रति हेक्टर है। यह किस्म भी प्रकन्द विगलन बीमारी के प्रति सहनशील है।

खाद एवं उर्वरक

अदरक लम्बी अवधि के फसल है तथा ज्यादा खाद चाहने वाली होती है। अत: अधिक ऊपज  के लिये गोबर की सडी खाद 250—300 क्विंटल / हेक्टर नेत्रजन, फास्फोरस वा पोटाश कृमश: 80—100, 50-60 एवं 100 किलोग्राम/ हेक्टर की दर से खेत में डालें। गोबर खाद रोपाई से 20-30 दिन पहले तथा फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा खेत तैयार करते समय जबकि नेत्रजनित खाद को तीन बराबर भाग में बाँटकर, पहला भाग रोपाई से 40 से 45 दिन बाद या दो से अधिक पत्तियाँ होने के बाद, दूसरा भाग 80 से 90 दिन बाद तथा तीसरा भाग 100 से 120 दिन बाद देना चाहिए। नेत्रजनित उर्वरक का प्रयोग करते समय खेत में भरपूर नमी होनी चाहिए। बिहार में जिंक, बोरान (सुहागा) एवं लोहा की मिट्टी में कमी पायी गई है अतः मिट्टी का परीक्षण कराने पर सूक्षम तत्वों की कमी हो तो मिट्टी में रोपाई के पहले जिक सल्फेट एवं बोरेक्स का कमश: 20-25 एवं 10-12 किलो प्रति हेक्टर दें। लोहा के कमी की अवस्था में 0.5 से 0.8 प्रतिशत का घोल बनाकर उसमें 25 से 30 बुन्द नींबू का रस डालकर दो छिड़काव करे। पहला छिड़काव रोपाई से 60 दिन के बाद तथा दूसरा रोपाई से 90 दिन के बाद करें।

कन्द (गांठ) की बोआई

बीज प्रकन्द मध्यम आकार के जिनका भार 20–25 ग्राम तथा 2–3 आँखो वाली ही, कन्द का चुनाव करना चाहिए। बीज प्रकन्द स्वस्थ, बीमारी वा कीट रहित होनी चाहिये । प्रति हेक्टर 18-20 क्विंटल कन्द की जरूरत होती है। कन्दो को इण्डोफिल एम-45 का 25 ग्राम एवं स्ट्रेप्टो-साइक्लिन ¼ ग्राम प्रति लीटर पानी के मिश्रित घोल में या रीडोमिल के 2 से 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी के दर से घोल बनाकर आधा घंटे तक उपचारित करें। तत्पश्चात छाया में सुखाकर रोपाई करें। जिन इलाकों में सूत्रकृमि का प्रकोप हो वहाँ पर नीम की खल्ली 25 क्विंटल या थिमेट 10 जी0 12 किलोग्राम प्रति हेक्टर की दर से खेत की तैयारी करते समय डालें। रोपाई 30 × 20 से0मी0 की दूरी एवं 8-10 से0मी0 गहराई पर करे। रोपाई का उचित समय 15 से 31 मई है। लेकिन विशेष परिस्थिति में इसकी रोपाई 20 जून तक की जा सकती है।

झपनी

रोपाई के बाद शीशम की हरी पत्ती या अन्य चीजों की मोटी तह बिछाकर ढ़क देना चाहिए। इससे मिट्टी में नमी बनी रहती है तथा कन्दों का अंकुरण सामान्य रूप में होता है तथा तेज धूप से अंकुरण का बचाव होता है। साथ ही खरपतवार कम निकलते हैं एवं ऊपज  भी अधिक प्राप्त होती है।

सिंचाई

अदरक बरसात वाली फसल है इसलिए इसकी सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है लेकिन अक्टूबर-नवम्बर माह में वर्षा नहीं होने की परिस्थिति में सिंचाई करना आवश्यक हो जाता है क्योंकि अक्टूबर-नवम्बर माह में अदरक का गांठ बनता तथा उसका विकास होता है इसलिए अक्बूबर-नवम्बर माह में खेतों अधिक नमी होनी चाहिए।

फसल-प्रबंधन

रोपाई के दो से तीन माह बाद क्यारियों में निकाई-गुड़ाई कर मिट्टी चढ़ानी चाहिये। अदरक में खरपतवारनाशक दवाईयों का जयादा इस्तेमाल नहीं किया जाता है क्योंकि लम्बे समय की फसल होने के कारण रोपाई से पहले या तुरन्त बाद के छिड़काव से अच्छे परिणाम नहीं मिले हैं।

अदरक की फसल सामान्यतः 8-9 महीनों में तैयार होती हैं जब पौधे की पत्तियाँ पीले पड़नी शुरू हो जाये तब खुदाई करनी चाहिए। जिन इलाकों में पाला नहीं पड़ता है वहां इसे कुछ दिन बाद भी खुदाई की जा सकती है। खुदाई के बाद इसे 2-3 दिन तक छाया में सुखायें। एक हेक्टर क्षेत्र में औसत 100 से 150 क्विंटल पैदावार होती है। कुछ किसान को अच्छा भाव मिलने पर समय से पहले ही अदरक को उखाड़ लेते हैं ऐसी स्थिति में उखाड़ा गया अदरक ज्यादा दिन तक अच्छी दशा में नहीं रहती हैं। अतः इसे तुरन्त बेच दें या इस्तेमाल कर लेना चाहिए। भण्डारण के लिये रखने वाला अदरक कभी भी समय से पहले नहीं निकालना चाहिए।

भण्डारण

ज्यादातर अदरक अगले वर्ष में रोपाई हेतु भण्डारित किये जाते हैं। इसके लिये स्वस्थ्य वा बीमार रहित गांठ को छांट करके इन्डोफिल एम-45 का 2.5 एवं स्ट्रेप्टो-साइक्लिन 1/4 ग्राम प्रति लीटर पानी के हिसाब से मिश्रित घोल में उपचारित करके 48 घंटे तक छाया में सुखाने के बाद गडढों में रखें। गडढों में गांठ को रखने के बाद पुआल या लकड़ी के तख्तों से ढ़ककर तख्तों को गोबर से लेप दें लेप करते समय छोटी मुँह हवा निकास के लिए अवश्य रखें। हवा निकास के लिये सुराख वाली पाईप या नाली का भी इस्तेमाल किया जाता है जिसका एक मुँह गडढों से बाहर होना चाहिए।

हल्दी की वैज्ञानिक खेती

भूमिका

हल्दी बिहार की प्रमुख मसाला फसल है। क्षेत्रफल एवं उत्पादन में इसका प्रथम स्थान है। हल्दी का उपयोग हमारे भोजन मेंनित्यदिन किया जाता है इसका सभी धार्मिक कार्यों में मुख्य स्थान प्राप्त है। हल्दी का काफी औषधीय गुण है। इसका उपयोग दवा एवं सौन्दर्य प्रसाधनों में भी होता है। हल्दी के निर्यात से भारत को करोड़ों रुपये की विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है।

जलवायु

हल्दी की खेती उष्ण और उप-शीतोष्ण जलवायु में की जाती है। फसल के विकास के समय गर्म एवं नम जलवायु उपयुक्त होती है परन्तु गांठ बनने के समय ठंड 25-30 डिग्री से. ग्रेड जलवायु की आवश्यकता होती है।

हल्दी की किस्म

राजेन्द्र सोनिया - इस किस्म के पौधे छोटे यानि 60-80 सेमी. ऊँची तथा 195 से 210 दिन में तैयार हो जाती है। इस किस्म की ऊपज  क्षमता 400 से 450 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तथा पीलापन 8 से 8.5 प्रतिशत है।

आर.एच. 5 -  इसके पौधे भी छोटे यानि 80 से 100 सेमी. ऊँची तथा 210 से 220 दिन में तैयार हो जाती है। इस किस्म की ऊपज  क्षमता 500 से 550 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तथा पीलापन 7.0 प्रतिशत है।

आर.एच. 9/90 - इसके पौधे मध्य ऊँचाई की यानि 110-120 सेमी. ऊँचाई की होती है तथा 210 से 220 दिन में तैयार हो जाती है। इस किस्म की ऊपज  क्षमता 500 से 550 क्विंटल प्रति हेक्टर है।

आर.एच. 13/90 - इसके पौधे मध्यम आकार यानि 110 से 120 सेमी. ऊँचाई की होती है इसके

तैयार होने में 200 से 210 दिन का समय लगता है। इस किस्म की ऊपज  क्षमता 450 से 500 क्विंटल प्रति हेक्टर है।

एन.डी.आर.-18 - इसके पौधे मध्यम आकार का यानि 115 से 120 सेमी. ऊँची होती है तथा इसको तैयार होने में 215 से 225 दिन का समय लगता है। इसकी ऊपज  क्षमता 350 से 375 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।

भूमि एवं तैयारी

हल्दी की अधिक ऊपज  के लिए जीवांशयुक्त जलनिकास वाली बलूई दोमट से हल्की दोमट भूमि उपयुक्त होती है। इसके गांठ जमीन के अन्दर बनते हैं इसलिए दो बार मिट्टी पलटने वाले हल से तथा तीन से चार बार देशी हल या कल्टीवेटर से जुताई करके एवं पाटा चलाकर मिट्टी को भूरभूरी तथा समतल बना लें।

खाद एवं उर्वरक

एक हेक्टर क्षेत्रफल के लिये निम्नलिखित मात्रा में खाद एवं उर्वरकों का व्यवहार करना लाभदायक होता है।

सड़ा हुआ कम्पोस्ट/गोबर की खाद - 250 से 300 क्विंटल

नेत्रोजन - 100 से 150 किलोग्राम

फास्फोरस (स्फुर) - 50 से 60 किलोग्राम

पोटाश - 100 से 120 किलोग्राम

जिक सल्फेट - 20 से 25 किलोग्राम

सड़ा हुआ गोबर की खाद या कम्पोस्ट से रोपाई 15 से 20 दिन पहले खेत में छींटकर जोताई करें। फास्फोरस, पोटाश एवं जिक सल्फेट को बोआई/रोपाई से एक दिन पहले खेत में अच्छी तरह मिला देना चाहिये। नेत्रजन खाद को तीन बराबर भागों में बाँट कर पहला भाग रोपाई से 40 से 45 दिन बाद, दूसरा भाग 80 से 90 दिन बाद तथा तीसरा भाग 100 से 120 दिन बाद देना चाहिये।

बोआई/रोपाई का समय

हल्दी बोआई या रोपाई 15 मई से 30 मई का समय उपयुक्त है लेकिन विशेष परिस्थिति में 10 जून तक इसकी रोपाई की जा सकती है।

रोपाई/बोआई विधि

हल्दी की रोपाई दो प्रकार से की जाती है -1. समतल विधि और 2. मेड़ विधि ।

समतल विधि में भूमि को तैयार कर समतल कर लेते हैं। कुदाल से पंक्ति से पंक्ति 30 सेमी. तथा गांठ से गांठ की दूरी 20 सेमी. पर रोपाई करते हैं।

मेड़ विधि में दो तरह से बोआई की जाती है। 1. एकल पंक्ति विधि तथा 20 दो पंक्ति विधि । एकल पंक्ति विधि में 30 सेमी. के मेड़ पर बीच में 20 सेमी. की दूरी पर गांठ को रख देते हैं तथा 40 सेमी मिट्टी चढ़ा देते हैं जबकि दो पंक्ति विधि में 50 सेमी. मेड़ पर दो लाईन, जो पंक्ति से पंक्ति 30 सेमी तथा गांठ से गांठ 20 सेमी. की दूरी पर रखकर 60 सेमी. कुढ़ से मिट्टी उठाकर चढ़ा देते हैं।

बोआई की दूरी तथा बीज की मात्रा

हल्दी के बोआई के लिये 30-35 ग्राम के गांठ उपयुक्त होती है। गांठ को पंक्ति से पंक्ति 30 सेमी. तथा कन्द से कन्द की दूरी 20 सेमी. एवं 5-6 सेमी गहराई पर रोपाई करनी चाहिये। कन्द को रोपने के पहले इन्डोफिल एम-45 का 25 ग्राम या वेभिस्टीन का 10 ग्राम के हिसाब से प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर कन्द को 30-45 मिनट तक उपचारित करक लगाना चाहिये ।

इमपर्नी

रोपाई या बोआई के बाद खेतों को हरी शीशम की पत्तियों से (5 सेमी. मोटी परत) ढँक दें। इससे खरपतवार नियंत्रण एवं गांठों का जमाव सामान्य रूप से होता है।

निकाई-गुड़ाई

हल्दी में तीन निकाई-गुड़ाई करें। पहला निकाई 35-40 दिन बाद, द्वितीय 60 से 70 दिन बाद तथा तीसरा 90 से 100 दिनों बाद करें। प्रत्येक निकाई-गुड़ाई के समय पौधों की जड़ों के चारों तरफ मिट्टी अवश्य चढ़ावें।

हल्दी की सिंचाई

हल्दी की पैदावार बरसात में होता है इसलिये इस फसल में सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है। जबकि समय पर नहीं वर्षा होने की स्थिति में, आवश्यकतानुसार सिंचाई अवश्य करनी चाहिये।

खोदाई

हल्दी की खोदाई दो प्रयोजन से किया जाता है-1. उबालने यानि सोंठ बनाने तथा 2 बीज के लिये। सोंठ के लिये हल्दी की खोदाई जब पौधे पीले पड़ने लगे तब खोदाई कर सकते हैं। जबकि बीज के लिये पौधे पूर्ण रूप से सुख जाते हैं तब खोदाई करते हैं।

हल्दी की ऊपज

हल्दी की ऊपज  किस्म एवं उत्पादन के तौर तरीकों पर निर्भर करता है। हल्दी की औसत ऊपज  250 से 300 क्विंटल प्रति हेक्टर है।

पौधा  संरक्षण

कीट

श्रीप्स - छोटे लाल, काला एवं उजले रंग कीड़े पत्तियों के रस चूसते हैं एवं पत्तियों मोड़कर पाईपनुमा बना देते हैं। इससे बचाव के लिए डाईमिथियोट का 1.5 मिली. प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर 15 दिन के अन्तराल पर तीन छिड़काव करें।

प्रकन्द विगलन रोग - पत्तियाँ पीली पड़कर सुखने लगती हैं तथा जमीन के ऊपर का तना गल जाता है। भूमि के भीतर का प्रकन्द भी सड़कर गोबर की खाद की तरह हो जाता है। यह बीमारी जल जमाव वाले क्षेत्रों में अधिक लगते हैं। इस रोग से बचाव के लिए इण्डोफिल एम-45 का 2.5 ग्राम एवं स्ट्रेप्से-साईक्लिन 1/4 ग्राम बनाकर प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर बीज उपचारित कर लगावें र खड़ी फसल पर 15 दिन के अन्तराल पर दो से तीन छिड़काव करें तथा रोग की अधिकता में पौधों के साथ-साथ जड़ की सिंचाई (ड्रेन्विंग) करें।

पर्ण धब्बा रोग - पत्तियों के बीच में या किनारे पर बड़े-बड़े धब्बे बन जाते हैं जिससे फसल की बाढ़ रुक जाती है ।

पर्ण चित्ती रोग

इस बीमारी के प्रकोप होने पर पत्तियों पर बहुत छोटी-छोटी चितियाँ बन जाती हैं। बाद में पत्तियाँ पीली पड़ने लगती है और सूख जाती है। पर्ण धब्बा रोग एवं चित्ती रोग से बचाव के लिये 15 दिन के अन्तराल दो से तीन छिड़काव इन्डोफिल एम-45 का 2.5 ग्राम एवं बेविस्टीन का 1 ग्राम का मिश्रण बनाकर प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।

तुलसी की खेती

परिचय

तुलसी के अनेक नाम हैं। सुलभा, ग्राम्या, पुरसा, बहुमंजरी तथा होली बेसिल के नाम से जाने वाले लेमिएसी कुल के पौधे कीविश्व में लगभग 150 प्रजातियाँ पायी जाती हैं। इस पौधे की मूल प्रकृति एक जैसे हैं किंतु इनकी रासायनिक संरचनाओं में काफी भिन्नता हे। धार्मिक महत्त्व के इस पौध को गैरपारम्परिक रूप में वाणिज्यिक कृषि के लिए अपनाया जा रहा है।

तुलसी की प्रजातियाँ निम्नानुसार हैं:

  1. ओसियम बेसीलिकम (O.Basilicum) अजंधिका अथवा स्वीट फ्रेंच बेसिल अथवा बोवई तुलसी
  2. ओसिमम किलिमण्डस्क्रिकम (O.Kilimandschricum)
  3. ओसिमम केनम/ओसिमम अमेरिकेनम (O.Americanum) काली तुलसी
  4. ओसिमम ग्रेटिसियम (O.Grattisimum) बन तुलसी या राम तुलसी
  5. ओसिमम विरडी (O. Virdi) जंगली तुलसी
  6. ओसिमम सैंकटम (O.Sanctum)

श्री तुलसी या श्यामा तुलसी उपर्युक्त में से प्रथम पाँच फ्रेंच बेसिल की श्रेणी में हैं जबकि अंतिम को होली बेसिल (Holi Basil) में रखा गया है। होली तुलसी का उपयोग औषधीय के से सुगंधीय है जबकि फेच बेसिल के मुख्यतया सुगंधीय उपयोग हैं।

सगंध उड़नशील के विभिन्न रसायनिक संगठन के कारण बाजार में इनके तेल की कीमत अलग-अलग हैं। खेती करने में प्रजाति का ज्ञान रहने से इसकी कीमत अधिक मिल सकती है। विश्व बाजार में विभिन्न प्रजाति के तेल की कीमत 2000/- से 8000/- किलो हैं।

तुलसी की ओसिमम बेसीलीकम प्रजाति को तेल उत्पादन के लिए उगाया जाता है। तुलसी की इस प्रजाति की भारत में बड़े पैमाने पर खेती होती है। उत्तर प्रदेश में बरेली, बदायूँ, मुरादाबाद और सीतापुर जिलों में इसकी खेती की जाती है। इसका प्रयोग परफ्यूम व कास्मेटिक इन्डस्ट्रीज में अधिक होता है । अपने बिहार राज्य में इसकी खेती लगभग 400 हे0 में हो रही है।

मृदा व जलवायु

इसकी खेती, कम उपजाऊ जमीन जिसमें पानी की निकासी का उचित प्रबन्ध हो, अच्छी होती है। बलुई दोमट जमीन इसके लिए बहुत उपयुक्त होती है। इसके लिए उष्ण कटिबंधीय एवम् उपोष्ण कटिबंधीय दोनों तरह की जलवायु उपयुक्त होती है।

जमीन की तैयारी

जमीन की तैयारी ठीक तरह से कर लेनी चाहिए। जमीन जून के दूसरे सप्ताह तक तैयार हो जानी चाहिए।

बुवाई/रोपाई

इसकी खेती बीज द्वारा होती है लेकिन खेत में बीज की बुवाई सीधे नहीं करनी चाहिए। पहले इसकी नर्सरी तैयार करनी चाहिए बाद में उसकी रोपाई करनी चाहिए।

पौध तैयार करना

जमीन की 15-20 से. मी. गहरी खुदाई कर के खरपतवार आदि निकाल कर तैयार कर लेना चाहिए। 15 टन प्रति हे० की दर से गोबर की सड़ी खाद अच्छी तरह मिला देना चाहिए। 1 मी. x 1 मी. आकार की जमीन सतह से उभरी हुयी क्यारियां बना कर 20 कि० फास्फोरस तथा इतना ही पोटाश प्रति है, की दर से मिला देना चाहिए। 750 ग्रा.- 1 किग्रा. बीज एक हेक्टेयर के लिए पर्याप्त होता है। बीज की बुवाई 1:10 के अनुपात में रेत या बालू मिला कर 8-10 से. मी. की दूरी पर पंक्तियों में करनी चाहिए। बीज की गहराई अधिक नहीं होनी चाहिए। जमाव के 15-20 दिन बाद 20 कि./हे. की दर से नत्राजन डालना उपयोगी होता है। पांच-छह सप्ताह में पौध रोपाई हेतु तैयार हो जाती है।

रोपाई

सूखे मौसम में रोपाई हमेशा दोपहर के बाद करनी चाहिए। रोपाई के बाद खेत को सिंचाई तुरन्त कर देनी चाहिए। बादल या हल्की वर्षा वाले दिन इसकी रोपाई के लिए बहुत उपयुक्त होते हैं। इसकी रोपाई लाइन से लाइन 60 से. मी. तथा पौधे से पौधे 30 से. मी. की दूरी पर करनी चाहिए।

सिंचाई

अगर वर्षा के दिनों में वर्षा होती रही तो सितम्बर तक इसके लिए सिंचाई की कोई आवश्यकता नही होती है उसके बाद सिंचाई की आवश्यकता हो सकती है।

खरपतवार नियंत्रण

इसकी पहली निराई-गुड़ाई रोपाई के एक माह बाद करनी चाहिए। दूसरी निराई-गुड़ाई पहली निराई के 3-4 सप्ताह बाद करनी चाहिए। बड़े क्षेत्रा में गुड़ाई ट्रेक्टर से की जा सकती है।

उर्वरक

इसके लिए 15 टन प्रति हेक्टेयर गोबर की खाद जमीन में डालना चाहिए। इसके अलावा 75-80 कि. ग्रा, नत्रजन 40-40 कि. ग्रा, फास्फोरस व पोटाश की आवश्यकता होती है। रोपाई से पहले एक तिहाई नत्रजन तथा फास्फोरस व पोटास की पूरी मात्रा खेत में डालकर जमीन में मिला देना चाहिए। शेष नत्रजन की मात्रा दो बार में खड़ी फसल में डालना चाहिए।

कटाई

जब पौधे में पूरी तरह से फुल आ जाये तथा नीचे के पत्ते पीले पड़ने लगे तो इसकी कटाई कर लेनी चाहिए । रोपाई के 10-12 सप्ताह के बाद यह कटाई के लिए तैयार हो जाती है।

आसवन

तुलसी का तेल पूरे पौधे के आसवन से प्राप्त होता है। इसका आसवन, जल तथा वाष्प आसवन, दोनों विधि से किया जा सकता है। लेकिन वाष्प आसवन सबसे ज्यादा उपयुक्त होता है। कटाई के बाद 4-5 घंटे छोड़ देना चाहिए। इससे आसवन में सुविधा होती है।

पैदावार

इसके फसल की औसत पैदावार 20-25 टन प्रति हेक्टेयर तथा तेल की पैदावार 80-100 कि. ग्रा. हेक्टेयर तक होता है।

तुलसी की खेती पर होने वाले आय तथा व्यय का विवरण (प्रति एकड़)

(क) लागत

विवरण

व्यय प्रति एकड़ (रूपये)

1. खेत तैयार करने की लागत

2000

2. खाद आदि की लागत

4000

3. नर्सरी तैयार करने पर खर्च

500

4. बीज की कीमत

500

5. मुख्य खेत में पौध की ट्रांसप्लांटिंग पर व्यय

2500

6. निंदाई-गुड़ाई की लागत

1000

7. भू-टॉनिकों की लागत

1000

8. सिंचाई व्यवस्था पर व्यय

2000

9. फसल कटाई, छंटाई तथा सुखाने आदि पर व्यय

3000

10. अन्य व्यय (पैकिंग, ट्रांसपोर्टेशन आदि सहित)

4000

11. आसवन पर व्यय

5000

कुल योग

26,000.00

(ख) प्राप्तियां

 

बेसिल/तुलसी तेल से आय (60 किलो ग्राम x1000.00 किलो)

60,000.00

शुद्ध लाभ = रू0 60,000–26,000 =34,000.00

अश्वगंधा की उन्नत खेती

भारत में अश्वगंधा की खेती-एक परिचय

भारत में अश्वगंधा अथवा असगंध जिसका वानस्पतिक नाम वीथानीयां सोमनीफेरा है, यह एक महत्वपूर्ण औषधीय फसल के साथ-साथ नकदी फसल भी है। यह पौधा ठंडे प्रदेशो को छोड़कर अन्य सभी भागों में पाया जाता है। मुख्य रूप से इसकी खेती मध्यप्रदेश के पश्चिमी भाग में मंदसौर, नीमच, मनासा, जावद, भानपुरा तहसील में व निकटवर्ती राज्य राजस्थान के नांगौर जिले में होती है। नागौरी अश्वगंधा की बाजार में एक अलग पहचान है। इस समय देश में अश्वगंधा की खेती लगभग 5000 हेक्टेयर में की जाती है जिसमें कुल 1600 टन प्रति वर्ष उत्पादन होता है जबकि इसकी मांग 7000 टन प्रति वर्ष है।

पादप विवरण

अश्वगंधा एक मध्यम लम्बाई (40 से. मी. से 150 से. मी.) वाला एक बहुवर्षीय पौधा है। इसका तना शाखाओं युक्त, सीधा, धूसर या श्वेत रोमिल होता है। इसकी जड़ लम्बी व अण्डाकार होती है। पुष्प छोटे हरे या पीले रंग के होते है। फल 6 मि. मी चौड़े, गोलाकार, चिकने व लाल रंग के होते हैं। फलों के अन्दर काफी संख्या में बीज होते हैं।

भूमि एवं जलवायु

अश्वगंधा खरीफ (गर्मी) के मौसम में वर्षा शुरू होने के समय लगाया जाता है। अच्छी फसल के लिए जमीन में अच्छी नमी व मौसम शुष्क होना चाहिए। फसल सिंचित व असिंचित दोनों दशाओं में की जा सकती है। रबी के मौसम में यदि वर्षा हो जाए तो फसल में गुणात्मक सुधार हो जाता है। इसकी खेती सभी प्रकार की जमीन में की जा सकती है। केन्द्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान, करनाल में किए गए परीक्षणों से पता चला है कि इसकी खेती लवणीय पानी से भी की जा सकती है।                                                                      

लवणीय पानी की सिंचाई से इसमें एल्केलोइड्‌स की मात्रा दो से ढाई गुणा बढ़ जाती है। इसकी खेती अपेक्षाकृत कम उपजाऊ व असिंचित भूमियों में करनी चाहिए। विशेष रूप से जहां पर अन्य लाभदायक फसलें लेना सम्भव न हो या कठिन हो। भूमि में जल निकास की अच्छी व्यवस्था होनी चाहिए। फसल की अच्छी बढ़वार के लिए शुष्क मौसम व तापमान 350 ब से अधिक नहीं होना चाहिए। इस फसल के लिए 500 से 700 मि.मी वर्षा वाले शुष्क व अर्धशुष्क क्षेत्र उपयुक्त हैं।

प्रजातियां

अनुपजाऊ एवं सूखे क्षेत्रों के लिए केन्द्रीय औषधीय एवं सुगंध अनुसंधान संस्थान, लखनऊ की पोशीता एवं रहितता नामक प्रजातियां उपयुक्त पायी गई हैं।

भूमि की तैयारी व बुआई

वर्षा होने से पहले खेत की 2-3 बार जुताई कर लें। बुआई के समय मिट्‌टी को भुरभुरी बना दें। बुआई के समय वर्षा न हो रही हो तथा बीजों में अकुंरण के लिए पर्याप्त नमी हो। वर्षा पर आधारित फसल को छिटकवां विधि से भी बोया जा सकता है। अगर सिचिंत फसल ली जाए तो बीज पंक्ति से पंक्ति 30 से. मी. व पौधे से पौधे की दूरी 5-10 से. मी. रखने पर अच्छी उपज मिलती है तथा उसकी निराई-गुडाई भी आसानी से की जा सकती है। बुआई के बाद बीज को मिट्‌टी से ढक देना चाहिए। अश्वगंधा की फसल को सीधे खेत में बीज द्वारा अथवा नर्सरी द्वारा रोपण करके उगाया जा सकता है। नर्सरी तैयार करने के लिए जून-जुलाई में बिजाई करनी चाहिए। वर्षा से पहले खेत को 2-3 बार जुताई करके मिट्‌टी को अच्छी तरह भुरभुरी बना देना चाहिए। बुआई के तुरन्त बाद फुआरे से हल्का पानी लगा दें। एक हेक्टेयर के लिए 5 किलो बीज की नर्सरी उपयुक्त होगी। बोने से पहले बीजों को थीरम या डाइथेन एम-45 से 3 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित कर लेना चाहिए। ऐसा करने से अकुंर बीज जनित रोगों से सुरक्षित रहते है। बीज 8-10 दिन में अंकुरित हो जाते है। अकुंरण के बाद उनकी छटाई कर लें। पौधों की ऊंचाई 4 से 6 सें. मी. होने पर पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30 से. मी. व पौधे से पौधे की दूरी 5-10 सें. मी. की कर देनी चाहिए।

उर्वरक व निराई गुडाई

अश्वगंधा की फसल में किसी प्रकार की रासायनिक खाद नही डालनी चाहिए क्योंकि इसका प्रयोग औषधि निर्माण में किया जाता है लेकिन बुआई से पहले 15 किलो नाईट्रोजन प्रति हैक्टर डालने से अधिक ऊपज मिलती है। बुआई के 20-25 दिन पश्चात्‌ पौधों की दूरी ठीक कर देनी चाहिए। खेत में समय-समय पर खरपतवार निकालते रहना चाहिए। अश्वगंधा जड़ वाली फसल है इसलिए समय-समय पर निराई-गुडाई करते रहने से जड़ को हवा मिलती रहती है जिसका उपज पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।

सिंचाई

सिंचित अवस्था में खेती करने पर पहली सिंचाई करने के 15-20 दिन बाद दूसरी सिंचाई करनी चाहिए। उसके बाद अगर नियमित वर्षा होती रहे तो पानी देने की आवश्यकता नही रहती। बाद में महीने में एक बार सिंचाई करते रहना चाहिए। अगर बीच में वर्षा हो जाए तो सिंचाई की आवश्यकता नही पड़ती। वर्षा न होने पर जीवन रक्षक सिंचाई करनी चाहिए। अधिक वर्षा या सिंचाई से फसल को हानि हो सकती है। 4 ई.सी. से 12 ई.सी. तक वाले खारे पानी से सिंचाई करने से इसकी पैदावार पर कोई असर नही पड़ता परन्तु गुणवत्ता 2 से 2.5 गुणा बढ़ जाती है।

फसल सुरक्षा

जड़ों को निमेटोड के प्रकोप से बचाने के लिए 5-6 कि.ग्रा ग्राम फ्यूराडान प्रति हैक्टर की दर से बुआई के समय खेत में मिला देना चाहिए। पत्ती की सड़न (सीडलीग ब्लास्ट) व लीफ स्पाट सामान्य बीमारियां हैं। जो खेत में पौधों की संखया कम कर देती हैं। अतः बीज को डायथीन एम-45 से उपचारित करके बोना चाहिए। एक माह पुरानी फसल को 3 ग्राम प्रति लीटर पानी में डायथीन एम-45 मिलाकर 7-10 दिन के अंतर पर छिड़काव करते रहना चाहिए जब तक बीमारी नियंत्रित न हो जाए। पत्ती भक्षक कीटों से फसल को सुरक्षित रखने के लिए रोगर या नुआन 0.6 प्रतिशत का छिड़काव 2-3 बार करना चाहिए।

खुदाई, सुखाई और भंडारण

अश्वगंधा की फसल 135 से 150 दिन के मध्य खुदाई के लिए तैयार हो जाती है। पौधे की पत्तियां व फल जब पीले हो जाए तो फसल खुदाई के लिए तैयार होती है। पूरे पौधे को जड़ समेत उखाड़ लेना चाहिए। जड़ें कटने न पाए इसलिए पौधों को उचित गहराई तक खोद लेना चाहिए। बाद में जड़ों को पौधो से काट कर पानी से धो लेना चाहिए व धूप में सूखने दें। जड़ों की छंटाई उनकी आकृति के अनुसार निम्न प्रकार से करनी चाहिए।

सर्वोतम या ए श्रेणी

जड़ें 7 सें. मी. लम्बी व तथा 1-1.5 सें. मी. व्यास वाली भरी हुई चमकदार और पूरी तरह से सफेद ए श्रेणी मानी जाती हैं।

उतम या बी श्रेणी

5 सें. मी. लम्बी व 1 सें. मी. व्यास वाली ठोस चमकदार व सफेद जड़ उत्तम श्रेणी की मानी जाती है।

मध्यम या सी श्रेणी

3-4 सें. मी. लम्बी, व्यास 1 सें. मी. वाली तथा ठोस संरचना वाली जड़ें मध्यम श्रेणी में आती हैं।

निम्न या डी श्रेणी

उपरोक्त के अतिरिक्त बची हुई कटी-फटी, पतली, छोटी व पीले रंग की जड़ें निम्न अथवा डी श्रेणी में रखी जाती हैं।

जड़ो को जूट के बोरों में भरकर हवादार जगह पर भडांरण करें। भडांरण की जगह दीमक रहित होनी चाहिए। इन्हें एक वर्ष तक गुणवत्ता सहित रुप में रखा जा सकता है।

उपज

आमतौर पर एक हैक्टर से 6.5-8.0 कुंतल ताजा जड़ें प्राप्त होती हैं जो सूखने पर 3-5 क्विंटल रह जाती है। इससे 50-60 किलो बीज प्राप्त होता है।

विपणन (मार्कटिंग)

नीमच मण्डी (मघ्य प्रदेश), अमृतसर (पंजाब), खारी बावली (दिल्ली), पंचकूला (हरियाणा), सीतामढ़ी (बिहार)

फसल चक्र

अश्वगंधा खरीफ फसल के रूप मे लगाई जा सकती है तथा फसल चक्र में गेहूं की फसल ली जा सकती है।

रासायनिक संगठन

अश्वगंधा की जड़ों में 13 एल्कलायड पाये जाते है जिनकी मात्रा 0.13 से 0.51 प्रतिशत होती है। जड़ों में प्रमुख अल्कलायड निकोटीन, सोम्नीफेरीन, विथेनीन, बिथेनेनीन, सोमिनीन, कोलीन, विथेफेरिन है। पत्तियों में विथेनीन, विथेफेरिन-ए अल्कलायड पाये जाते हैं इनके अतिरिक्त इनमे ग्लाइकोसाइड, विटानिआल, स्टार्च, शर्करा व अमीनो अम्ल भी पाये जाते है।

गुणवत्ता

खारे पानी से भी इस फसल को उगाया जा सकता है। इसकी लवण सहनशीलता 16 ई. सी. तक होती है। खारे पानी के उपयोग से इसकी गुणवता में 2 से 2) गुणा वृद्धि होती है। अल्कलायड की मात्रा 0.5 से बढ़कर 1.2 प्रतिशत हो जाती हैं।

उपयोग

अश्वगंधा की जड़ें व पत्तियां औषधि के रूप में काम में लाई जाती हैं जो कि निम्नलिखित बीमारियों में उपयोगी है।

विथेफेरिन : टयूमर प्रतिरोधी है।

विथेफेरिन-ए : जीवाणु प्रतिरोधक है।

विथेनीन : उपशामक व निद्रादायक होती है।

जड़ों का उपयोग

सूखी जड़ों से आयुर्वेदिक व यूनानी दवाइयां बनाई जाती हैं। इसकी जड़ों से गठिया रोग, त्वचा की बीमारियां, फेफड़े में सूजन, पेट के फोड़ों तथा मंदाग्निका उपचार किया जाता है। पंजाब में इसकी जड़ों का उपयोग कमर व कूल्हों के दर्द निवारण हेतु किया जाता है।

पत्तियों का उपयोग

पत्तियों से पेट के कीड़े मारने तथा गर्म पत्तियों से दुखती आँखों का इलाज किया जाता है। हरी पत्तियों का लेप घुटनों की सूजन तथा क्षय (टी.बी.) रोग के इलाज के लिए किया जाता है। इसके प्रयोग से रुके हुए पेशाब के मरीज को आराम मिलता है। इसे भारतीय जिनसेंग की संज्ञा दी गई है जिसका उपयोग शक्तिवर्धक के रूप में किया जा रहा है। इसके नियमित सेवन से मानव में रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ती है। इसकी निरन्तर बढ़ती मांग को देखते हुए इसके उत्पादन की अपार संभावनाएं हैं।

अश्वगंधा की खेती के लिए आय-व्यय का ब्यौरा

एक हेक्टेयर में अश्वगंधा पर अनुमानित व्यय रु. 10000/- आता है जबकि लगभग 5 क्विंटल जड़ों तथा बीज का वर्तमान विक्रय मूल्य लगभग 78,750 रुपये होता है। इसलिए शुद्ध-लाभ 68,750 रुपये प्रति हेक्टेयर प्राप्त होता है। उन्नत प्रजातियों में यह लाभ और अधिक हो सकता है।

सारणी-1. अश्वगंधा की खेती का प्रति हेक्टेयर आय-व्यय का विवरण

 

व्यय

रु.*

1.

खेत की तैयारी

2000.00

2.

बीज की कीमत

1000.00

3.

नर्सरी तैयार करना

500.00

4.

पौध रोपण

2000.00

5.

निराई, गुडाई

1000.00

6.

सिंचाई

500.00

7.

खाद, उर्वरक और उनका प्रयोग

1000.00

8.

जड़ की खुदाई और उनकी सफाई

2000.00

 

योग

10000.00*

 

* दिये गये कुल योग में स्थान अनुसार और वर्तमान मुद्रास्फीति की दर के अनुसार परिवर्तन हो सकता है। अत: दिया गया आय-व्यय का विवरण रुपये मूल्यों में परिवर्तनीय है। यह केवल अनुमान पर आधारित है।

 

आय**

 

उपज

मूल्य प्रति किलो ग्राम

कुल आय

जड़ें 5 क्विंटल

145/-

72,500.00

बीज 50 किलोग्राम

125/-

6,250.00

 

योग

78,750.00**

शुद्ध-लाभ प्रति हेक्टेयर : 78,750-10,000 = 68,750 रुपये**

** दी गई कुल आय में स्थान अनुसार खर्च और वर्तमान मुद्रास्फीति की दर के अनुसार परिवर्तन हो सकता है। अत: दिया गया आय (लाभ) का विवरण रुपये मूल्यों में परिवर्तनीय।यह केवल अनुमान पर आधारित है।

आंवला की खेती

आँवला

आँवला युफ़ोरबिएसी परिवार का पौधा है। यह भारतीय मूल का एक महत्वपूर्ण फल है। भारत केविभिन्न क्षेत्रों में इसे विभिन्न नामों, जैसे, हिंदी में ‘आँवला’, संस्कृत में ‘धात्री’ या ‘आमलकी’, बंगाली एवं उड़ीया में, ‘अमला’ या ‘आमलकी’, तमिल एवं मलयालम में, ‘नेल्ली’, तेलगु में ‘अमलाकामू, गुरुमुखी में, ‘अमोलफल’, तथा अंग्रेजी में ‘ऐम्बलिक’, ‘माइरोबालान’ या इंडियन गूजबेरी के नाम से जाना जाता है। अपने अद्वितीय औषधीय एवं पोषक गुणों के कारण, भारतीय पौराणिक साहित्य जैसे वेद, स्कन्दपुराण, शिवपुराण, पदमपुराण, रामायण, कादम्बरी, चरक संहिता, सुश्रुत संहिता में इसका वर्णन मिलता है। महर्षि चरक ने इस फल को जीवन दात्री अथवा अमृतफल के समान लाभकारी माना है। अत: इसे अमृत फल तथा कल्प वृक्ष के नाम से भी जाना जाता है। आँवले की विशेषतायें हैं, प्रति इकाई उच्च उत्पादकता (15-20 टन/हेक्टेयर), विभिन्न प्रकार की भूमि (ऊसर, बीहड़, खादर, शुष्क, अर्धशुष्क, कांडी, घाड़) हेतु उपयुक्तता, पोषण एवं औषधीय (विटामिन सी, खनिज, फिनॉल, टैनिन) गुणों से भरपूर तथा विभिन्न रूपों में (खाद्य, प्रसाधन, आयुर्वेदिक) उपयोग के कारण आँवला 21वी सदी का प्रमुख फल हो सकता है। धर्म परायण हिन्दू इसके फलों एवं वृक्ष को अत्यंत पवित्र मानते हैं तथा इसका पौराणिक महत्व भी है। ऐसा कहा जाता है कि यदि कार्तिक मास में इसके वृक्ष के नीचे बैठ कर विष्णु की पूजा की जाये तो स्वर्ग की प्राप्ति होती है। यदि तुलसी का पौधा नहीं मिले तो भगवान विष्णु की पूजा आँवले के वृक्ष के नीचे बैठ कर की जा सकती है। हिन्दू धर्म में ऐसी मान्यता है कि आँवले के वृक्ष के नीचे पिण्ड दान करने से पितरों को मुक्ति प्राप्त होती है। हिन्दू धर्म के अनुसार कार्तिक मास में कम से कम एक दिन आँवले के वृक्ष के नीचे भोजन करना अत्यंत शुभ माना जाता है, जब इसके फल परिपक्व होते है। हिन्दू धर्म के अनुसार आँवले के फल का लगातार 40 दिनों तक सेवन करते रहने वाले व्यक्ति में नई शारीरिक स्फूर्ति आती है तथा कायाकल्प हो जाता है।

क्षेत्र एवं वितरण

आँवले के प्राकृतिक रूप से उगे वृक्ष भारत, श्रीलंका, क्यूबा, पोर्ट रिको, हवाई, फ्लोरिडा, ईरान, इराक, जावा, ट्रिनिडाड, पाकिस्तान, मलाया, चीन, और पनामा में पाये जाते हैं। परन्तु इसकी खेती भारतवर्ष के उत्तर प्रदेश प्रांत में ज्यादा प्रचलित है। आज कल आँवले का सघन वृक्षारोपण उत्तर प्रदेश के लवणीय एवं क्षारीय मृदाओं वाले बीहड़ एवं खादर वाले जिलों, जैसे आगरा, मथुरा, इटावा एवं फतेहपुर एवं बुन्देलखण्ड के अर्ध शुष्क क्षेत्रों में सफलतापूर्वक किया जा रहा है। इसके अलावा आँवले के क्षेत्र अन्य प्रदेशों जैसे, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु के अर्ध शुष्क क्षेत्रों में, हरियाणा के अरावली क्षेत्रों में, पंजाब, उत्तरांचल एवं हिमाचल में तेजी से बढ़ रहे हैं। एक नये आंकड़े के अनुसार भारतवर्ष में आँवले का क्षेत्रफल लगभग 50,000 हेक्टेयर तथा कुल उत्पादन लगभग 1.5 लाख टन आँका गया है। झारखंड राज्य के शुष्क एवं अर्धशुष्क जिलों जैसे – लातेहार, डाल्टनगंज, चतरा, कोडरमा, गिरिडीह, देवघर आदि में आँवला उत्पादन की अपार संभावनाएं मौजूद हैं।

उपयोग

आँवले के पौधों के प्रत्येक भाग का आर्थिक महत्व है। इसके फलों में विटामिन ‘सी’ की अत्यधिक मात्रा पायी जाती है। इसके अतिरिक्त इसके फल लवण, कार्बोहाइड्रेट, फास्फोरस, कैल्शियम, लोहा, रेशा एवं अन्य विटामिनों के भी धनी होते हैं। इसमें पानी 81.2%, प्रोटीन 0.50%, वसा 0.10%, रेशा 3.40%, कार्बोहाइड्रेट 14.00%, कैल्शियम 0.05%, फोस्फोरस 0.02%, लोहा 1.20 (मिली ग्रा./100 ग्रा.), विटामिन ‘सी’ 400-1300 (मिली ग्रा./100 ग्रा.), विटामिन ‘बी’ 30.00 (माइक्रो ग्रा./100 ग्रा.) पाये जाते है। भारत में औषधीय गुणों से युक्त फलों में आँवले का अत्यंत महत्व है। शायद यह फल ही एक ऐसा फल है जो आयुर्वेदिक औषधि के रूप में पूर्ण स्वास्थ्य के लिए प्रयुक्त होता है। हिन्दू शास्त्र के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि तुलसी एवं आँवले के फलों से सिक्त जल से स्नान करना गंगा जल से स्नान करने के तुल्य है।

इसका फल तीक्ष्ण शीतलता दायक एवं मूत्रक और मृदुरेचक होता है। एक चम्मच आँवले के रस को यदि शहद के साथ मिला कर सेवन किया जाय तो इससे कई प्रकार के विकार जैसे क्षय रोग, दमा, खून का बहना, स्कर्वी, मधुमेह, खून की कमी, स्मरण शक्ति की दुर्बलता, कैंसर अवसाद एवं अन्य मस्तिष्क विकार एन्फ़्जलुएन्जा, ठंडक, समय से पहले बुढ़ापा एवं बालों का झड़ना एवं सफेद होने से बचा जा सकता है। प्राय: ऐसा देखा गया है कि यदि एक चम्मच ताजे आँवले का रस, एक कप करेले के रस में मिश्रित करके दो महीने तक प्राय: काल सेवन किया जाय तो प्राकृतिक इन्सुलिन का श्राव बढ़ जाता है। इस प्रकार यह मधुमेह रोग में रक्त मधु को नियंत्रित करके शरीर को स्वस्थ करता है। साथ ही रक्त की कमी, सामान्य दुर्बलता तथा अन्य कई परेशानियों से मुक्ति दिलाता है। इसका प्रतिदिन प्रात: सेवन करने से कुछ ही दिनों में शरीर में नई स्फूर्ति आती है। यदि ताजे फल प्राप्त न हों तो इसके सूखे चूर्ण को शहद के साथ मिश्रित करके सेवन किया जा सकता है। त्रिफला, च्यवनप्राश, अमृतकलश ख्याति प्राप्त स्वदेशी आयुर्वेदिक औषधियाँ हैं, जो मुख्यत: आँवले के फलों से बनायी जाती हैं। आँवला के इन्हीं गुणों के कारण इसे ‘रसायन’ एवं ‘मेखा रसायन’ (बुद्धि का विकास करने वाला) की श्रेणी में रखा गया है। आँवले के फलों का प्रयोग लिखने की स्याही एवं बाल रंगने के द्रव्य में भी किया जाता है। इसकी पत्तियों को पानी में उबालने के पश्चात उस पानी से कुल्ला करने पर मुँह के छाले ठीक हो जाते हैं। ऐसा इसकी पत्तियों में विद्यमान टैनिन एवं फिनोल की अधिकता के कारण होता है। यही नहीं, आँवले के फल को यदि खाया जाय तो वह मृदुरेंचक (पेट साफ़) का कार्य करता है एवं इसकी जड़ का सेवन पीलिया रोग को दूर करने में सहायक होता है। हिन्दू पौराणिक साहित्य में आँवले एवं तुलसी की लकड़ी की माला पहनना काफी शुभ माना गया है। इस प्रकार आँवला की लकड़ी भी उपयोगी है।

जलवायु

आँवला एक शुष्क उपोष्ण (जहाँ जाड़ा एवं गर्मी स्पष्ट रूप से पड़ती है) क्षेत्र का पौधा है परन्तु इसकी खेती उष्ण जलवायु में भी सफलतापूर्वक की जा सकती है। भारत में इसकी खेती समुद्र तटीय क्षेत्रों से 1800 मीटर ऊँचाई वाले क्षेत्रों में सफलतापूर्वक की जा सकती है। जाड़े में आँवले के नये बगीचों में पाले का हानिकारक प्रभाव पड़ता है परन्तु एक पूर्ण विकसित आँवले का वृक्ष 0-460 सेंटीग्रेट तापमान तक सहन करने की क्षमता रखता है। गर्म वातावरण, पुष्प कलिकाओं के निकलने हेतु सहायक होता है जबकि जुलाई-अगस्त माह में अधिक आर्द्रता का वातावरण सुसुप्त छोटे फलों की वृद्धि हेतु सहायक होता है। वर्षा ऋतु में शुष्क काल में छोटे फल अधिकता में गिरते हैं तथा नए छोटे फलों के निकलने में देरी होती है।

भूमि

आँवला एक सहिष्णु फल है और बलुई भूमि से लेकर चिकनी मिट्टी तक में सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। गहरी उर्वर बलुई दोमट मिट्टी इसकी खेती हेतु सर्वोत्तम पायी जाती है। बंजर, कम अम्लीय एवं ऊसर भूमि (पी.एच. मान 6.5-9.5, विनियम शील सोडियम 30-35 प्रतिशत एवं विद्युत् चालकता 9.0 म्होज प्रति सें.मी. तक) में भी इसकी खेती सम्भव है। भारी मृदायें तथा ऐसी मृदायें जिनमें पानी का स्तर काफी ऊँचा हो, इसकी खेती हेतु अनुपयुक्त पायी गई हैं।

विभिन्न किस्में

पूर्व में आँवला की तीन प्रमुख किस्में यथा बनारसी, फ्रांसिस (हाथी झूल) एवं चकैइया हुआ करती थी। इन किस्मों की अपनी खूबियाँ एवं कमियाँ रही हैं। बनारसी किस्म में फलों का गिरना एवं फलों का कम भंडारण क्षमता, फ्रान्सिस किस्म में यद्यपि बड़े आकार के फल लगते हैं परन्तु उत्तक क्षय रोग अधिक होता है। चकैइया के फलों में अधिक रेशा एवं एकान्तर फलन की समस्या के कारण इन किस्मों के रोपण को प्रोत्साहित नहीं करना चाहिए। पारम्परिक किस्मों की इन सब समस्याओं के निदान हेतु नरेन्द्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कुमारगंज, फैजाबाद ने कुछ नयी किस्मों का चयन किया है जिनका संक्षिप्त विवरण निम्न है:

कंचन (एन ए-4)

यह चकइया किस्म से चयनित किस्म है। इस किस्म में मादा फूलों की संख्या अधिक (4-7 मादा फूल प्रति शाखा) होने के कारण यह अधिक फलत नियमित रूप से देती है। फल मध्यम आकार के गोल एवं हल्के पीले रंग के व अधिक गुदायुक्त होते है। रेशेयुक्त होने के कारण यह किस्म गूदा निकालने हेतु एवं अन्य परिरक्षित पदार्थ बनने हेतु औद्योगिक इकाईयों द्वारा पसंद की जाती है। यह मध्यम समय में परिपक्व होने वाले किस्म हैं (मध्य नवम्बर से मध्य दिसम्बर) तथा महाराष्ट्र एवं गुजरात के शुष्क एवं अर्धशुष्क क्षेत्रों में सफलतापूर्वक उगायी जा रही है।

कृष्णा (एन.ए.-5)

यह बनारसी किस्म से चयनित एक अगेती किस्म है जो अक्टूबर से मध्य नवम्बर में पक कर तैयार हो जाती है। इस किस्म के फल बड़े ऊपर से तिकोने, फल की सतह चिकनी, सफेद हरी पीली तथा लाल धब्बेदार होती है। फल का गूदा गुलाबी हरे रंग का, कम रेशायुक्त तथा अत्यधिक कसैला होता है। फल मध्यम भंडारण क्षमता वाले होते हैं। अपेक्षाकृत अधिक मादा फूल आने के कारण, इस किस्म की उत्पादन क्षमता बनारसी किस्म की अपेक्षा अधिक होती है। यह किस्म मुरब्बा, कैन्डी एवं जूस बनाने हेतु अत्यंत उपयुक्त पायी गयी है।

नरेन्द्र आँवला-6

यह चकैइया किस्म से चयनित किस्म है जो मध्यम समय (मध्य नवम्बर से मध्य दिसम्बर) में पक कर तैयार हो जाती है। पेड़ फैलाव लिए अधिक उत्पादन देने वाले होते हैं। (फलों का आकार मध्यम से बड़ा गोल, सतह चिकनी, हरी पीली, चमकदार, आकर्षक) गूदा रेशाहीन एवं मुलायम होता है। यह किस्म मुरब्बा, जैम एवं कैन्डी बनाने हेतु उपयुक्त पायी जाती है।

नरेन्द्र आँवला-7

यह फ्रांसिस (हाथी झूल) किस्म के बीजू पौधों से चयनित किस्म है। यह शीघ्र फलने वाली, नियमित एवं अत्यधिक फलन देने वाली किस्म है। इस किस्म में प्रति शाखा में औसत मादा फूलों की संख्या 9.7 तक पायी जाती है। यह मध्यम समय (मध्य नवम्बर से मध्य दिसम्बर) तक पक कर तैयार हो जाती है। यह किस्म उत्तक क्षय रोग से मुक्त है। फल मध्यम से बड़े आकार, के ऊपर तिकोने, चिकनी सतह तथा हल्के पीले रंग वाले होते हैं। गूदे में रेशे की मात्रा एन ए-6 किस्म से थोड़ी अधिक होती है। इस किस्म की प्रमुख समस्या अधिक फलत के कारण इसकी शाखाओं को टूटना है। अत: फल वृद्धि के समय शाखाओं में सहारा देना उचित होता है यह किस्म च्यवनप्राश, चटनी, अचार, जैम एवं स्क्वैश बनाने हेतु अच्छी पायी गयी है। इस किस्म को राजस्थान, बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तरांचल तथा तमिलनाडु के क्षेत्रों में अच्छी तरह अपनाया गया है।

नरेन्द्र आँवला-10

यह किस्म बनारसी किस्म के बीजू पौधों से चयनित अधिक फलन देने वाली किस्म है। फल देखने में आकर्षक, मध्यम से बड़े आकार वाले, चपटे गोल होते हैं। सतह कम चिकनी, हल्के पीले रंग वाली गुलाबी रंग लिए होती है। फलों का गूदा सफेद हरा, रेशे की मात्रा अधिक एवं फिनाल की मात्रा कम होती है। अधिक उत्पादन क्षमता, शीघ्र पकने के कारण एवं सुखाने एवं अचार बनाने हेतु उपयुक्तता के कारण यह व्यवसायिक खेती हेतु उपयुक्त किस्म हैं, परन्तु इस किस्म में एकान्तर फलन की समस्या पायी जाती है।

इन सब किस्मों के अलावा लक्ष्मी-52, किसान चकला, हार्प-5, भवनी सागर आनंद-1, आनंद-2, एवं आनंद-3 किस्में विभिन्न शोध संस्थाओं से विकसित की गयी हैं परन्तु इनकी श्रेष्ठता देश के अन्य भागों में अभी सिद्ध नहीं हो पाई है।

प्रवर्धन एवं मूलवृंत

आँवले के बाग़ स्थापना में सबसे बड़ी समस्या सही किस्मों के पौधों का न मिलना है। हाल के वर्षो में आँवले के पौधों की मांग में कई गुना वृद्धि हुई है। अत: कायिक प्रवर्धन की व्यवसायिक विधि का मानकीकरण आवश्यक हो गया है।

पारम्परिक रूप से आँवले के पौधों के बीज द्वारा भेंट कलम बंधन द्वारा तैयार किये जाते थे। बीज द्वारा प्रवर्धन आसान एवं सस्ता होता है, परन्तु परपरागित होने के कारण बीज द्वारा तैयार पौधे अधिक समय में फलत देते हैं एवं गुण, आकार में भी मातृ पौधों के समान नहीं पाये जाते हैं। आँवले के पौधे ऊपर की तरफ बढ़ने वाले होते हैं। अत: निचली सतह से बहुत कम शाख निकलती हैं, जिससे भेंट कलम बंधन अधिक सफल नहीं हैं। हाल के वर्षो में आँवले के प्रवर्धन हेतु कई कायिक विधियों का मानकीकरण किया गया है। अब इसका सफल प्रवर्धन पैबंदी चश्मा, विरूपित छल्ला विधि, विनियर कलम एवं कोमल शाखा बंधन द्वारा सफलतापूर्वक किया जा सकता है।

बीज निकालना

उत्तर भारत में बीज निकालने हेतु चकैइया या देशी किस्मों के फलों को जनवरी या फरवरी माह में एकत्र कर लेते हैं। फलों को धूप में सूखा लिया जाता है। पूरी तरह से सूखने के बाद फल अपने आप फट जाते हैं और उनके अंतर से बीज बाहर आ जाते हैं। यदि बीज अपे आप फल से नहीं निकल रहें हों तो हल्का सा दबाव दिया जा सकता है। एक फल से प्राय: छह बीज प्राप्त होते हैं। लगभग एक क्विंटल फल से एक किलोग्राम बीज प्राप्त होता है।

बीज का जमना

बीज को बोने से 12 घंटे पहले पानी में भिगो देना चाहिए। जो बीज पानी में तैरने लगे उन बीजों को फेंक देना चाहिए। मार्च-अप्रैल के महीने में बीजों को जमीन की सतह से थोड़ी उठी हुई क्यारियों में बोना चाहिए। पाली हाउस में बीजों को जल्दी (फरवरी माह में) भी बोया जा सकता है। देर (मई एवं जून माह में) से बोये गये बीजों से उत्पन्न पौधे कलिकायन हेतु उपयुक्त होते हैं। मार्च-अप्रैल में बोये गये बीजों का जमाव करीब दो सप्ताह में हो जाता है तथा बुवाई के बाद 10 से.मी. ऊँची पौध करीब 35-40 दिनों में तैयार हो जाती है। इस प्रकार की पौध को खोद कर तीन दिनों तक छाया में रख कर पुन: लगाने से अधिकांश पौधे स्थापित हो जाते हैं।

कलिकायन

छह मास से एक वर्ष तक की पौध (मूलवृंत) कलिकायन के लिए उपयुक्त होती हैं। शाँकुर शाखा का चुनाव ऐसे मातृवृक्ष से करना चाहिए जो अधिक फलत देने वाला हो तथा कीड़ों एवं व्याधियों के प्रकोप से मुक्त हो। उत्तर भारतीय दशाओं में पैबंदी चश्मा तथा विरूपित छल्ला विधि से मई से सितम्बर माह तक चश्मा करने से 60 से 90 प्रतिशत तक सफलता प्राप्त होती है, जबकि दक्षिण भारतीय दशाओं में ग्रीन हाउस एवं नेट हाउस की सहायता से आँवले का प्रवर्धन साल के आठ से दस माह तक किया जा रहा है। कलिकायन के अतिरिक्त आँवला का प्रवर्धन विनियर कलम, कोमल शाखा बंधन के द्वारा 70 प्रतिशत सफलता के साथ किया जा सकता है, लेकिन कलिकायन की सफलता एवं क्षमता को देखते हुए आँवला प्रवर्धन हेतु यह विधि सर्वोत्तम पायी गयी है।

आँवले के प्रवर्धन के लिए पालीथीन के थैले, पाली ट्यूब्स, रूट ट्रेनर या स्व-स्थाने बाग स्थापन (मूल रूप से सूखा ग्रस्त क्षेत्र हेतु) आदि विधियों का भी मानकीकरण किया गया है, परन्तु उनके व्यापक प्रसार की आवश्यकता है। आँवले की शाँकुल शाखों को भीगी हुई मॉस घास या अखदार के टुकड़ों में लपेट कर 5-7 दिनों तक परिवहन/भंडारण किया जा सकता है।

पौध रोपण

कलम बंधन या कलिकायन के द्वारा तैयार पौधों को जुलाई-अगस्त या फरवरी के महीने में 8-10 मीटर की दूरी पर रोपाई करते हैं। पौधों की रोपाई वर्गाकार विधि से करते हैं, जिसमें पौधों से पौधों एवं पंक्ति से पंक्ति की दूरी बराबर रखी जाती है। प्रत्येक पौधों के वर्ग के बीच में एक अन्य पौधा भी लगाया जा सकता है। इस विधि को पूरक विधि या क्विनकन्स भी कहते है। इससे बागवान अधिक लाभ के अलावा खाली पड़े क्षेत्र का भी सही उपयोग कर सकते है। इस विधि हेतु अन्य फलों में बेर, अमरुद, नींबू, करौंदा एवं सहजन को पूरक पौधों के रूप में लगाना काफी अच्छा साबित हुआ है। कई स्थानों का पौधा रोपण झाड़ीनुमा पंक्ति में भी किया गया है। इस विधि में पंक्ति से पंक्ति की दूरी 8 मीटर एवं पौधों से पौधों की दूरी घटा कर 4-5 मीटर तक रखते हैं। परती (खाली) भूमि में पौध रोपण से दो मास पूर्व एक घन मीटर का गड्ढा खोद लेते हैं। गड्ढे से निकली मिट्टी को दो भागों में बाँट देते हैं। ऊपरी आधे भाग को एक जगह तथा निचली आधी मिट्टी को दूसरी जगह रख देते हैं। ऊपरी आधी मिट्टी में तीन से चार टोकरी (25-40 किलोग्राम) सड़ी गोबर की खाद एवं एक किलोग्राम नीम की खली या 500 ग्राम हड्डी का चूरा मिला मिश्रण कर लेते हैं। इस प्रकार से तैयार मिश्रण को गड्ढे में इस प्रकार भरते हैं कि भरा हुआ गड्ढा 6 से 10 सें.मी. सतह से उठा रहे। क्षारीय मृदाओं में यदि पौध रोपण करना है तो उपरोक्त मिश्रण में जिप्सम आवश्यकतानुसार 5 से 8 किलोग्राम या पाइराइट या ऊसर तोड़ खाद एवं 20 किलोग्राम बालू मिला कर गड्ढे की भराई करनी चाहिए। यदि वर्षा न हो तो इस प्रकार से भरे गड्ढों के मध्य में कलमी पौधों को पिण्डी के साथ रोपित कर देना चाहिए एवं चारों तरफ की मिट्टी को अच्छी तरह से दबा देना चाहिए। तत्पश्चात, हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए। ऊसर भूमि का रेखांकन करके बीजू पौधों को सीधा लगाना चाहिए तथा उपयुक्त आयु आने पर एक निश्चित ऊँचाई पर इन पर चश्मा चढ़ा देना चाहिए। इस विधि को स्व-स्थाने कलिकायन भी कहते हैं। आँवले की विभिन्न किस्मों में स्व-बन्ध्यता पायी जाती है। अत: अधिक उत्पादन हेतु एकान्तर पंक्ति में दो किस्मों को लगाना चाहिए। इसके लिए सबसे उत्तम संयोग एन ए-6 एवं ए-7 एवं एन ए-10 या कंचन एवं कृष्णा को पाया गया है।

संधायी एवं छंटाई

आँवले के पौधों को मध्यम ऊँचाई तक विकसित करने हेतु प्रोत्साहित करना चाहिए। नये पौधों को जमीन की सतह से लगभग 75 सें.मी. से एक मीटर तक अकेले बढ़ने देना चाहिए। तदुपरान्त शाखाओं को निकलने देना चाहिए जिससे पौधों के ढाँचे का भली प्रकार से विकास हो सके। पौधों को रूपांतरित प्ररोह प्रणाली के अनुसार साधना चाहिए। शुरू में अधिक कोण वाली दो से चार शाखाएं विपरीत दिशाओं में निकलने देना चाहिए। अनावश्यक शाखाओं को शुरू में निरंतर हटाते रहना चाहिए। इसके बाद चार से छह शाखाओं को चारों दिशाओं में बढ़ने देना चाहिए।आँवले के फलत वाले वृक्षों में नियमित काट-छांट की आवश्यकता नहीं होती है। आँवला अपने वृद्धि के अनुसार सारे सीमित प्ररोहों को गिरा देता है जो अगले साल की वृद्धि को प्रोत्साहित करते हैं। कमजोर, सूखी, रोग ग्रस्त, टूटी हुई, आपस में मिली हुई शाखाओं एवं मृलवृत्त से निकली हुई कलिकाओं को समय-समय

नींबू घास की खेती

परिचय

नींबू घास सगंधीय पौधों में एक महत्वपूर्ण पौधा है जिसके पत्तों से तेल निकाला जाता है। इस तेल का उपयोग औषधियों के निर्माण, उच्च कोटि के इत्र बनाने एवं विभिन्न सौंदर्य प्रसाधनों में किया जाता है। साबुन निर्माण में भी इसे काम में लाया जाता है। इस तेल का उत्पादन करने का मुख्य कारण इसमें पाया जाने वाला साईंट्रल सांद्रण है। देश में ‘विटामिन ए’ के संश्लेषण के लिए नींबू तेल की मांग काफी है। झारखंड में भी इसकी खेती की जा रही है और तेल के साथ-साथ इसके डंठल का भी निर्यात किया जा रहा है।

मिट्टी एवं जलवायु

लेमन घास की खेती के लिए गर्म और आर्द्र जलवायु उपयुक्त है। उच्च ताप तथा धूप की उपस्थिति से पौधे में तेल की मात्रा बढ़ती है।लगभग सभी प्रकार की भूमि में इसकी खेती की जा सकती है। दोमट उपजाऊ मिट्टी अधिक अच्छी होती है, पर बालू युक्त चिकनी मिट्टी, लेटेराईट एवं बारानी क्षेत्रों में भी उपजाई जा सकती है। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी इसकी खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है।

प्रसार विधि

बीज: बीज को नर्सरी बनाकर बोया जाता है। पौधों के कुछ बड़े होने पर इन्हें पौधशाला से उखाड़ कर अन्य जगह या खेत में रोपाई करते हैं। एक हेक्टेयर के लिए 4 किलो बीज की जरूरत होती है। पौधे 2 महीने के बाद लगाने लायक हो जाते हैं।

स्लिप

पौधों के ऊपरी भाग को जड़ से 15 सें.मी. छोड़कर काट लेते हैं। जड़ों के भाग को अलग कर लेते हैं। लगभग 15 से.मी. गहरे छेदों में 45 सें.मी. x 45 सें.मी. या 45 से.मी. x 30 सें.मी. की दूरी पर लगाया जाता है। लगाने का उत्तम समय वर्षा ऋतु के प्रारंभ में है। पौधों को सिंचाई का साधन रहने पर फरवरी माह में भी रोपाई की जाती है। एक हेक्टेयर के लिए 500000-75000 स्लिप की आवश्यकता होती है।

किस्म: ओ. डी. – 19, ओ. डी. – 40, प्रगति, आर.आर.एल-16, प्रमाण, सुगंधी।

खाद एवं उर्वरक

खेत की तैयारी के समय कम्पोस्ट या गोबर की सड़ी खाद 200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर देकर अच्छी तरह मिला दें। साथ ही नत्रजन, फास्फोरस एवं पोटाश भी 150:40:40 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर दें। नत्रजन की आधी मात्रा रोपाई समय एवं शेष मात्रा दो किस्तों में 2-2 माह बाद दें।

जैविक विधि में रसायनिक खाद के बदले में केंचुआँ खाद/नादेप कम्पोस्ट, एजोटोबैक्टर, पी.एस.बी., करंज खल्ली दिया जाता है।

निकाई-गुड़ाई

रोपाई के एक माह पश्चात खरपतवार की निकाई-गुड़ाई कर निकाल दें। इस तरह 2-3 बार निकाई-गुड़ाई के बाद घास-पात नहीं रहते तथा खेत साफ़ रहता है। नींबू घास पाँच वर्षीय फसल है अत: हर कटाई के बाद खाद या उर्वरक देना आवश्यक है।

जल प्रबंधन

लेमन ग्रास के लिए जल की अधिक मात्रा की आवश्यकता नहीं होती है। बरसात में सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती। रोपाई के पश्चात भूमि में नमी होना जरूरी है। गर्मियों में 10 दिनों के अंतराल पर एवं सर्दियों में 15 दिनों के अंतर पर सिंचाई करनी चाहिए।

फसल चक्र

नींबू घास पाँच वर्षीय फसल है। एक बार लगाने के बाद पाँच वर्ष तक कटाई समय-समय पर की जाती है। अनुपजाऊ भूमि पर फसल 3 साल के बाद बदलना चाहिए।

कटाई

फसल लगाने के बाद 5 वर्ष तक 2.5-3.0 महीने के अंतराल पर कटाई की जाती है। प्रति वर्ष 4-5 कटाई की जा सकती है। पौधों की कटाई भूमि से 10-15 सेंटीमीटर ऊपर से करना चाहिए।

एक हेक्टेयर भूमि से 4 कटाईयों में 150-180 लीटर तेल प्रति वर्ष प्राप्त किया जा सकता है, जो आने वाले वर्षो में बढ़ता है।

बीज संग्रह

लेमन ग्रास में नवम्बर-दिसम्बर में फूल खिलते है और जनवरी-फरवरी में बीज इक्ट्ठा किया जाता है। एक पौधे से 100-200 ग्राम बीज प्राप्त होते है।

पत्तियों का आसवन

लेमन ग्रास को काटने के बाद तेल निकाला जा सकता है या फिर 24 घंटे तक सूखने के लिए छोड़ देते हैं। वाष्प आसवन या जलो आसवन विधि में फसल को काटकर छोटे टुकड़ों में कर आसवन टैंक में डाला जाता है। आसवन की क्रिया प्रारंभ होने के साथ ही सपेरेटर में तेल एकत्र होने लगता है। पानी में अघुलनशील तथा हल्का होने के कारण तेल पानी के ऊपर तैरता रहता है जिसे अलग कर लिया जाता है।

कीट एवं रोग

  1. शुट फ्लाई
  • प्ररोह में छेद कर देता है जिससे तने की पत्तियाँ सूख जाती है।
  • फोरेट 10 जी/कार्बोफुरान 3 जी की 10-12 किलो/हे. की दर से मिट्टी में मिलाएं।
  1. दीमक
  • नीम/करंज की खल्ली, का उपयोग करें। क्लोरोपाइरीफ़ॉस (0.1 प्रतिशत) से उपचारित कर स्लिप को लगाना चाहिए।
  1. श्वेत मख्खी
  • मोनोक्रोटोफ़ॉस 0.05 प्रतिशत का छिड़काव करें।
  1. चूहा का प्रकोप
  • जिंक फास्फाईड/बेरियम क्लोराईड का प्रयोग करें।

नोट: तेल निकालने के बाद बचा हुआ लेमन ग्रास कागज बनाने, ईधन के रूप में उपयोग करने तथा उर्वरक के रूप में प्रयोग हेतु एक अच्छा श्रोत है। इसकी फसल भूमि संरक्षण के लिए भी उपयोगी सिद्ध हुई है। सिंचित अवस्था में कटाई ज्यादा होती है और असिंचित अवस्था में कटाई की अवधि ज्यादा होती है। इसका परिणाम उत्पादन पर होता है। सिंचित भूमि में तेल अधिक निकलता है जबकि असिंचित अवस्था में उत्पादन कम प्राप्त होता है। हाल के वर्षो में इसके ताजे डंठल की मांग बढ़ी है और राज्य से इसके ताजे डंठल को पैक कर निर्यात किया जा रहा है।

लेमन ग्रास की खेती में आय-व्यय (प्रति हें.)

व्यय

बीज (4 किलो)

4000.00

नर्सरी की तैयारी, बीज बोना

2000.00

खेत के जुताई तथा क्यारी बनाना

3000.00

रसायनिक खाद

2000.00

गोबर खाद एवं केंचुआँ खाद

5000.00

निकाई-गुड़ाई

2000.00

सिंचाई

2000.00

पौधा संरक्षण

1000.00

कटाई एवं तेल आसवन

6000.00

अन्यान्य (परिवहन आदि)

2000.00

कुल व्यय (रु.)

30000.00

 

आय (प्रथम वर्ष)/हे.

100 लीटर तेल रु. 500/- लीटर – रु. 50000.00

प्रथम वर्ष आय – रु.20000/-

द्वितीय वर्ष से पंचम वर्ष तक

व्यय: रु. 20000.00 प्रति वर्ष

आय: 150 लीटर तेल/वर्ष/500/-लीटर रु. 75000/-

शुद्ध आय प्रति वर्ष (दो से पांचवें वर्ष तक) रु. 55000/- प्रति हेक्टेयर

 

शंखपुष्पी की खेती कैसे करें

शंखपुष्पी की खेती पहले मरुस्थलीय भू-भागों में ऊंट के चारे के लिए की जाती थी. लेकिन जब से इसके औषधीय गुणों के बारें में पता चला हैं तब से इसकी खेती व्यापक रूप से की जाने लगी है. वर्तमान में किसान भाई इसकी खेती से अच्छा लाभ कमा रहे हैं. शंखपुष्पी की खेती उत्तर और दक्षिण पूर्वी भारत में अधिक की जाती हैं. वर्तमान में आयुर्वेदिक औषधियों में इसका इस्तेमाल काफी ज्यादा किया जाता है. शंखपुष्पी का पौधा एक से डेढ़ फिट के आसपास की लम्बाई का होता है. जिस पर रक्त के समान लाल, सफ़ेद और नीले फूल खिलते हैं. इसका पौधा एक बार लगाने के बाद कई साल तक पैदावार देता हैं. शंखपुष्पी के बीज काले रंग के पाए जाते हैं. जिनमें एक से लेकर तीन धारी पाई जाती हैं. शंखपुष्पी के फूल शंख के जैसे दिखाई देते हैं.

Table of Contents

शंखपुष्पी की खेती

शंखपुष्पी का पौधा बहुवर्षीय होता है. इसकी की खेती भारत में किसी भी तरह के मौसम में की जा सकती हैं. लेकिन इसके पौधे पैदावार दिसम्बर माह के बाद ही देते हैं. इसकी खेती के लिए समशीतोष्ण जलवायु को उपयुक्त माना जाता है. इसकी खेती समुद्र तल से 1200 से 1300 मीटर उंचाई वाली भूमि में आसानी से की जा सकता है. इसकी खेती के लिए बारिश की अधिक आवश्यकता नही होती. शंखपुष्पी का सम्पूर्ण पौधा उपयोगी होता है. और इसका बाज़ार भाव काफी अच्छा मिलता हैं. जिस कारण किसान भाई इसकी खेती की तरफ ज्यादा आकर्षित हो रहे हैं.

अगर आप भी इसकी खेती के माध्यम से अच्छा लाभ कमाना चाहते हैं तो आज हम आपको इसकी खेती के बारें में सम्पूर्ण जानकारी देने वाले हैं.

उपयुक्त मिट्टी

शंखपुष्पी की खेती के लिए उचित जल निकासी वाली उपजाऊ भूमि की जरूरत होती है. लेकिन अधिक उत्तम पैदावार लेने के लिए इसे हल्की लाल रेतीली दोमट मिट्टी में उगाना चाहिए. इसकी खेती के लिए भूमि का पी.एच. मान 5.5 से 7 के बीच होना चाहिए.

जलवायु और तापमान

शंखपुष्पी की खेती के लिए जलवायु और तापमान दोनों मुख्य कारक के रूप में काम करते हैं. शंखपुष्पी की खेती के लिए समशीतोष्ण जलवायु को काफी अच्छा माना जाता है. इसकी खेती के लिए बारिश के बाद का मौसम सबसे उपयुक्त होता है. इसकी खेती के लिए अधिक गर्मी और बरसात दोनों ही उपयोगी नही माने जाते. अधिक तेज़ गर्मी और सर्दी में इसके पौधे विकास नही करते. इसकी खेती के लिए अधिक बारिश की भी जरूरत नही होती.

शंखपुष्पी की खेती के लिए शुरुआत में बीजों के अंकुरण के वक्त 20 डिग्री के आसपास तापमान की जरूरत होती हैं. बीज और पौधों के अंकुरण के बाद इसके पौधों को विकास करने के लिए 25 से 30 डिग्री तापमान की जरूरत होती हैं. इसका पौधा अधिकतम 35 और न्यूनतम 10 डिग्री तापमान को सहन कर सकता हैं. इसे कम या ज्यादा तापमान होने पर इसके पौधे विकास करना बंद कर देते हैं.

उन्नत किस्में

शंखपुष्पी की कई उन्नत किस्में पाई जाती हैं जिन्हें उनकी पैदावार और फूलों के रंगों के आधार पर तैयार किया गया है. फूलों के रंग के आधार पर शंखपुष्पी की तीन प्रजातियां ही पाई जाती है. जिन्हें सफ़ेद, नीली और लाल फूलों वाली किस्मों में शामिल किया गया हैं.

आई के ए 62842

शंखपुष्पी की इस किस्म का पौधा झाड़ीनुमा दिखाई देता हैं. इसके पौधे पर नीले रंग के फूल दिखाई देते हैं. इसके हरे पेड़ो का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 160 से 200 क्विंटल तक पाया जाता हैं. इसका पौधा सामान्य ऊंचाई का होता है, जिस पर छोटे आकार की पत्तियां पाई जाती हैं. इसकी शाखाओं पर हल्की मात्रा में रोएं पाए जाते हैं.

सोढाला

उन्नत किस्म का पौधा

शंखपुष्पी की इस किस्म के पौधों का तना एक फिट के आसपास लम्बाई का पाया जाता हैं. इस किस्म के पौधे की शखाएं चारों तरफ फैली होती हैं. इसके पौधे की छाल में से दूध जैसा पदार्थ निकलता हैं. इस किस्म के पौधों पर सफ़ेद और नीले रंग के फूल दिखाई देते हैं. और इसके बीजों का रंग काल पाया जाता हैं. इस किस्म के हरे पेड़ो का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 180 क्विंटल के आसपास पाया जाता हैं.

विष्णुक्रान्ता

शंखपुष्पी की इस किस्म के पौधों पर नीले रंग के फूल पाए जाते हैं. और इसके पौधे सामान्य ऊंचाई के पाए जाते हैं. जिनकी शखाएं फैली हुई होती हैं. जो सुतली के सामान मोटाई की पाई जाती हैं. इसकी शखाओं पर रोएं काफी ज्यादा मात्रा में पाए जाते हैं. इस किस्म के पौधों का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 200 क्विंटल तक पाया जाता हैं.

इनके अलावा और भी कुछ किस्में हैं. जिन्हें अलग अलग जगहों पर उगाया जाता हैं. जिनमें सी-15, डी-121, उदय और क्रांति जैसी किस्में मौजूद हैं.

खेत की तैयारी

शंखपुष्पी की खेती के लिए कार्बनिक पदार्थों से युक्त भुरभुरी मिट्टी का होना जरूरी होता हैं. इसके लिए शुरुआत में खेत में मौजूद पुरानी फसलों के अवशेषों को नष्ट कर खेत की मिट्टी पलटने वाले हलों से गहरी जुताई कर दें. खेत की जुताई करने के बाद कुछ दिन के लिए खेत को खुला छोड़ दें. ताकि मिट्टी में मौजूद हानिकारक कीट तेज़ धूप की वजह से नष्ट हो जाएँ.

खेत की जुताई के बाद खेत में पुरानी गोबर की खाद डालकर उसे अच्छे से मिट्टी में मिला दें. खाद को मिट्टी में मिलाने के लिए खेत की दो से तीन बार तिरछी जुताई कर दें. उसके बाद खेत में पानी चलाकर उसका पलेव कर दें. पलेव करने के बाद जब मिट्टी की ऊपरी सतह हल्की सूखी हुई दिखाई देने लगे तब खेत की फिर से जुताई कर खेत में रोटावेटर चला दें. इससे खेत की मिट्टी भुरभुरी दिखाई देने लगती हैं. उसके बाद खेत में पाटा लगाकर खेत को समतल बना दें. ताकि बारिश के वक्त खेत में जलभराव जैसी समस्याओं का सामना ना करना पड़ें.

पौध तैयार करना

शंखपुष्पी की खेती बीज और पौध दोनों तरीके से की जाती हैं. लेकिन पौध के रूप में इसकी खेती करना ज्यादा लाभकारी और अच्छा होता है. क्योंकि बीज के माध्यम से खेती करने पर इसके पौधे लगभग 50 दिन की देरी से पककर तैयार होते हैं और इनका उत्पादन भी कम मिलता हैं.

इसकी पौध किसान भाई नर्सरी में तैयार कर सकते हैं. इसकी पौध रोपाई के लगभग 20 दिन पहले प्रो-ट्रे में तैयारी की जाती हैं. इसके अलावा कई ऐसी नर्सरियां हैं जो इसकी पौध सस्ते दामों पर किसान भाइयों को देती हैं. जिनसे किसान भाई अपने लिए पौध खरीद सकता हैं. लेकिन पौध खरीदते वक्त ध्यान रखे कि पौध रोग रहित और अच्छे से विकास करने वाली होनी चाहिए.

पौधा रोपाई का तरीका और टाइम

शंखपुष्पी की खेती बीज और पौध दोनों तरीकों से की जाती हैं. जिसमें इसके पौधों की रोपाई समतल और मेड़ों दोनों तरीकों से की जाती हैं. साधारण रूप से समतल भूमि में इसकी पौधों की रोपाई क्यारियाँ बनाकर पंक्तियों में की जाती हैं. इसके लिए प्रत्येक पौधों के बीच एक फिट की दूरी होनी चाहिए.

लेकिन इसकी खेती से उत्तम पैदावार लेने के लिए इसे मेड़ों पर उगाना चाहिए. मेड़ों पर उगाने के दौरान इसके पौधों को आपस में 20 से 25 सेंटीमीटर की दूरी पर उगाना चाहिए. इस दौरान मेड़ों के बीच की दूरी एक फिट के आसपास होनी चाहिए. दोनों तरीके से पौध रोपाई के दौरान इसके पौधों की जड़ों को बाविस्टीन से उपचारित कर जमीन में तीन सेंटीमीटर की गहराई में लगाना चाहिए. इसकी पौध रोपाई शाम के वक्त करनी चाहिए. इससे पौधों का अंकुरण अच्छे से होता हैं.

बीज के रूप में इसकी रोपाई मेड़ों पर की जाती हैं. इसके लिए इसके बीजों को जमीन में तीन से चार सेंटीमीटर की गहराई में लगाना चाहिए. एक हेक्टेयर में इसकी रोपाई के लिए 5 से 7 किलो बीज की जरूरत होती हैं. जिन्हें मशीन की सहायता से एक फिट दूरी पर पंक्तियों में उगाना चाहिए.

शंखपुष्पी के बीज और पौध दोनों की रोपाई बारिश के मौसम में की जाती है. इस दौरान इन्हें जून या जुलाई माह में मौसम की पहली बारिश के बाद ही उगा देना चाहिए. और जिन किसान भाइयों के पास सिंचाई की उचित व्यवस्था हो वो इसके बीजों को बारिश से पहले भी उगा सकता हैं.

पौधों की सिंचाई

शंखपुष्पी के पौधों की रोपाई के तुरंत बाद उन्हें पानी दे देना चाहिए. ताकि पौधों का अंकुरण अच्छे से हो सके. जबकि बीज के रूप में खेती के दौरान इसके बीजों की रोपाई नम भूमि में की जाती हैं. इसलिए इसके बीजों की रोपाई के तुरंत बाद उन्हें सिंचाई की जरूरत नही होती.

शंखपुष्पी के पौधों की खेती बारिश के मौसम में की जाती हैं. इस दौरान इसके पौधों को शुरूआती सिंचाई की जरूरत नही होती. लेकिन बारिश वक्त पर ना हो तो पौधों को सिंचाई आवश्यकता के अनुसार कर देनी चाहिए. शंखपुष्पी के पौधों को सिंचाई की ज्यादा जरूरत पौधों पर फूल बनने के बाद बीज बनने के दौरान होती हैं. इस दौरान खेत में नमी की उचित मात्रा बनाए रखने के लिए हल्की सिंचाई करते रहना चाहिए.

उर्वरक की मात्रा

शंखपुष्पी की खेती औषधीय फसल के रूप में की जाती हैं. इसलिए इसकी खेती में रासायनिक खाद की जगह सिर्फ जैविक खाद का ही इस्तेमाल करना चाहिए. जैविक खाद के रूप में शुरुआत में खेत की तैयारी के वक्त लगभग 15 से 17 गाड़ी पुरानी गोबर की खाद को प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में डालकर अच्छे से मिट्टी में मिला दें. इसके अलावा FYM (यार्ड खाद) खाद की उचित मात्रा का छिडकाव खेत में पौध रोपाई के बाद सिंचाई के दौरान करना चाहिए, जो पौधों के विकास में सहायक होती हैं.

खरपतवार नियंत्रण

शंखपुष्पी की खेती में खरपतवार नियंत्रण प्राकृतिक तरीके से किया जाता हैं. प्राकृतिक तरीके से खरपतवार नियंत्रण के दौरान इसके पौधों की दो से तीन गुड़ाई काफी होती हैं. इसके पौधों की पहली गुड़ाई पौध या बीज रोपाई के लगभग 20 से 25 दिन बाद कर देनी चाहिए. उसके बाद बाकी की दोनों गुड़ाई एक एक महीने के अंतराल में करनी चाहिए.

पौधों में लगने वाले रोग और उनकी रोकथाम

शंखपुष्पी के पौधों में सामान्य तौर पर काफी कम ही रोग देखने को मिलते हैं. लेकिन फिर भी पौधों में कोई कीट रोग दिखाई दे तो उनका जैविक तरीके से नियंत्रण करना चाहिए. जैविक तरीके से नियंत्रण के लिए जैविक तरल कीटनाशकों का छिडकाव करना चाहिए. इसके लिए नीम का काढा, नीम के तेल या अन्य जैविक कीटनाशक का इस्तेमाल करना चाहिए.

फसल की कटाई

शंखपुष्पी के पौधों में रोपाई के लगभग चार से पांच महीने बाद फूल खिलने लग जाते हैं. और उसके एक महीने बाद यानी दिसम्बर माह में इसके पौधों की फलियों में दाने बन जाते हैं. पौधे के विकसित होने के बाद इसकी कटाई जनवरी से मई माह तक चलती हैं. इसके पौधों की कटाई के दौरान इन्हें जड़ सहित उखाड़ा जाता हैं.

इसके पौधों को उखाड़ने से पहले खेत में पानी चला दें. ताकि पौधों को उखाड़ते वक्त किसी भी तरह की परेशानी का सामना ना करना पड़े. पौधों को उखाड़ने के बाद उन्हें छायादार जगह में सुखाया जाता हैं. जब पौधे अच्छे से सुख जाते हैं तब उन्हें नमी से बचाने के लिए वायुरोधी थैले में डालकर पैक कर दिया जाता हैं. पेकिंग करने के बाद उन्हें बाज़ार में बेचने के लिए भेज दिया जाता हैं.

पैदावार और लाभ

शंखपुष्पी की खेती किसानों के लिए लाभकारी पैदावार मानी जाती हैं. क्योंकि इसका बाज़ार भाव काफी अच्छा मिलता हैं. साधारण रूप से इसके बीजों का बाज़ार भाव 3 हज़ार के आसपास पाया जाता हैं. जिससे किसान भाइयों की एक बार में ही अच्छी कमाई हो जाती हैं. इसके अलावा इसकी पैदावार को किसान भाई किसी भी ऑनलाइन वेबसाइट पर अपने उत्पाद का उचित भाव बताकर बेच सकता हैं.